Sunday, 1 February 2015

दोस्त द्वारा भेंट

दोस्त द्वारा भेंट

नीचे दी गई गणेश जी की पीतल की मूर्ति (जो एक ऐन्टीक पीस है), कुछ साल पूर्व मुझे मेरे एक दोस्त द्वारा भेंट की गई थी. शायद मेरा Handicrafts का काम देख कर उसने यह सोचा हो. लेकिन उसने कहा था, 'वह मुझे कुछ गिफ्ट देना चाहता था, उसके पास पैसे नहीं थे कि कुछ नया ला सके, यह मूर्ति उसके घर में पड़ी थी, जो उसके कथनानुसार उसके किसी काम की नहीं थी, इसलिए उसने मुझे दी ताकि मैं इसे अपने घर में सजा लूँ, बतौर उसकी निशानी।' मूर्ति का वज़न 25-30 किलो अवश्य होगा। मैं चूँकि इस लाइन में काम कर रही हूँ, इसलिए मुझे उसकी कीमत मालूम थी. बेचारे की साफगोई सुन कर मैंने उससे कहा था, 'तुम्हें मालूम है, इसकी क्या कीमत होगी?'

'अब मैं गिफ्ट की कीमत बताऊँ क्या? मुझे खुद नहीं याद, मैंने कितने की खरीदी थी,' उसने कहा.

'मैं इतना महँगा गिफ्ट नहीं लूँगी। मैं इसे अच्छे दाम पर बेच कर रुपये तुम्हें दे दूँगी। कबाड़ी को भी बेचूँ तो दस हज़ार के आसपास मिलेंगे। और अपनी दूकान पर रख कर बेचूँ तो 50-60 हज़ार तक. लेकिन महँगे कस्टमर का इंतज़ार करना पड़ता है,' मैंने कहा.

'मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैंने तुम्हें दे दिया, तुम्हारी मर्ज़ी, इसे रखो या बेचो,' वह बोला।

तो तब से यह मूर्ति मेरे घर की शोभा बढ़ा रही है. हम भी अहसान फरामोश नहीं जी, जो इसका गाना न गाएँ।

कुछ पुरानी चीज़ें कभी बेकार नहीं होतीं। जैसे सोना-चाँदी, जायदाद, और इसी तरह आजकल पीतल भी.

और हाँ, पुराने रिश्ते भी.


No comments:

Post a Comment