Thursday, 12 February 2015

नैतिक प्रशिक्षण

नैतिक प्रशिक्षण

माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूली शिक्षा के अलावा महँगी-महँगी ट्यूशन्स लगाते हैं ताकि बच्चा सर्वोच्च अंक लेकर पास हो. क्या किसी माता-पिता ने कभी यह ध्यान दिया है कि बच्चों को मॉरल ट्रेनिंग (नैतिक प्रशिक्षण) देने के लिए कोई ट्यूटर रखा जाए?
आजकल स्कूलों में भी इस तरह का कोई ज्ञान नहीं दिया जाता। आजकल के माता-पिता भी अपनी मौज-मस्ती के चलते बच्चों के आगे कोई आदर्श नहीं पेश करते। पहले यानि जब हम छोटे थे, स्कूलों में महापुरुषों के वचन, सूक्तियाँ, कहावतें, इन सब के ज़रिये हमें पढ़ाया जाता था कि अपने से बड़ों का, गुरुजनों का आदर करो, हमेशा सत्य बोलो, हमेशा मधुर वचन बोलो। हमारे मन में कभी यह सवाल नहीं उठा था कि हम ऐसा क्यों करें?
हाल ही में जब मैंने कुछ टीनेजर बच्चों से बात की तो यह जान कर दंग रह गई कि आजकल के बच्चों के मन में यह सवाल उठता है कि "हम अपने से बड़ों का आदर क्यों करें? उनका कहना क्यों मानें? यह तो कोई तर्क न हुआ कि वे बड़े हैं, इसलिए हम उनका कहना मानें। बड़े होने से ही कोई अक्लमंद और सही नहीं हो जाता। हमें तर्क से समझाओ कि हम बड़ों का आदर क्यों करें?"
ऐसे प्रश्नों को जन्म देने के पीछे उन बच्चों द्वारा नेट पर निम्नलिखित खबर देख और पढ़ लेना था कि....
युगांडा (अफ्रीका) में वर्षों से सिविल वॉर चल रही है। उनके पास सोल्जर (सिपाही) कम हैं, इसलिए वे छोटे बच्चों का अपहरण करके उनके हाथों में बंदूक थमा देते हैं, इस आदेश के साथ कि जाओ, दुश्मन को ख़त्म कर दो। ऐसे हालात में बच्चे दहशत के दौर से गुज़रते हैं और या तो बिन आई मौत मरते हैं या खूँखार दानव बन जाते हैं।
"बच्चों के खेलने और पढ़ने की उम्र में उनके हाथों में बड़ों के द्वारा बंदूकें थमा देना क्या सही है?" मुझसे बात करने वाले बच्चों का प्रश्न था। मेरा यह तर्क उन्हें समझ में नहीं आया कि "यह उस देश के हालात हैं, उस देश की समस्या है, हमारे देश में ऐसी कोई समस्या नहीं है।" उनके मन पर युगांडा के बच्चों की दहशत हावी थी।
इस बात के लिए यह आधुनिक तकनीक ज़िम्मेदार है कि वह हर उम्र के सामने उस उम्र द्वारा न देखने योग्य चीज़ें भी प्रस्तुत कर रही है। चाहे बच्चे पोर्न वीडियो देखें या इस तरह के दहशतजदा समाचार पढ़ें। अब यह स्कूलों और पैरेंट्स का कर्तव्य हो जाता है कि वे इस नए युग के विकास में छुपी बुराइयों के हिसाब से अपनी शिक्षा की दिशा में परिवर्तन लाएँ और बच्चों को सकारात्मक दृष्टिकोण मुहैया कराएँ। स्कूल के साथ-साथ माता-पिता भी ज़िम्मेदार हैं. बच्चों की नकारात्मक सोच बनने में।
हम बचपन में खेल-खेल में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे, "हम देश के भावी रक्षक हैं, हम देश का गौरव बढ़ाएँगे" आदि आदि. यह नई पीढ़ी जब बड़ी होगी, तो देश में क्या-क्या गुल खिलाएगी, कितने अपराधों को जन्म देगी, यह देखने के लिए हमारी पीढ़ी जीवित नहीं होगी लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि आज की शिक्षा प्रणाली अच्छे इंसान तैयार नहीं कर रही, बल्कि अपराधी प्रवृत्ति की नई पौध तैयार कर रही है.

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