Friday, 13 February 2015

संयुक्त परिवार बनाम खदेड़े हुए बुजुर्ग

संयुक्त परिवार बनाम खदेड़े हुए बुजुर्ग

बहुत साल पहले मैंने औरंगाबाद में एक हिन्दी प्रवक्ता प्रौढ़ महिला (उनका नाम भूल रही हूँ) के परिवार में अच्छा तारतम्य देखा था. उन प्रवक्ता ने विवाह नहीं किया था, अपने पिता के घर रहती थीं, उनके भाई-भाभियाँ उनका अत्यंत सम्मान करते थे. अपनी भाभियों से उन्हें पूरा सहयोग प्राप्त था. घर के सारे सदस्य उन्हें सर-आँखों पर रखते थे.

इसी तरह एक अन्य अविवाहित प्रौढ़ महिला लेखिका याद आ रही हैं जो स्पैस्टिक थीं, शरीर अपंग था, मुश्किल से चल पाती थीं, उनके शरीर में सिर्फ उनकी उंगलियाँ सही थीं, जिनमे कलम पकड़ कर वह लिखने में समर्थ थीं. और सही थी उनकी बुलंद आवाज़, जिससे वह धुरंधर बोलने में सक्षम थीं. उनमे जिजीविषा इतनी थी कि हर साहित्यिक सभा-गोष्ठी में जाना पसंद करती थी, दूसरे शहरों में भी. और उनकी इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सहयोग देती थीं उनकी दो युवा भाभियाँ। उन्हें शहर-शहर ले जाकर गोष्ठियाँ अटेंड करवाती थीं.

ज़ाहिर है, ये भाभियाँ अच्छे सुसंस्कृत परिवारों की बेटियां थीं, और सुसंस्कृत परिवारों में ही ब्याही थीं. भाई भी बहनों के प्रति संवेदनशील थे. आजकल कहाँ हैं ऐसे सुसंस्कारित लड़के-लड़कियाँ?

मेरे विचार में संयुक्त परिवार की बहुत उपयोगी होता है. जॉइंट फैमिली में बच्चे अच्छे संस्कार पा सकते हैं. मैं भी सोचती हूँ कि संयुक्त परिवार बहुत मायनों में एकल परिवार की तुलना में बेहतर होता है. सबसे बड़ी बेहतरी तो यही कि युवा नौकरी पर जाएँ तो उनके बच्चों को सँभालने के लिए बुजुर्ग घर पर रहते हैं, नौकरों से काम करवाने के लिए भी. साथ ही एक-दूसरे का सहयोग हर कदम पर बना रहता है. लेकिन संयुक्त परिवारों में ख़ुशी तब ही होती है, जब बहु और ससुरालियों के बीच अच्छा तारतम्य हो.

मैंने अच्छे लोग देखे हैं तो बुरे लोग भी देखे हैं. बल्कि बुरे लोग ज़्यादा देखे हैं. कई परिवारों में मैंने खुद देखा है कि बहुएँ इतने गैरसंस्कारी परिवारों से आती हैं कि वे अपने बच्चों को दादा-दादी से बात नहीं करने देतीं। दादा-दादी अपने पोते-पोती से बोलने को तरसते हैं लेकिन ज़ालिम बहुएँ उन्हें आपस में मिलने तक नहीं देतीं। बुजुर्ग अपने पोता-पोती के लिए केयर टेकर का काम करें तो बहुएँ खुश, अन्यथा बच्चों को संस्कार देने के नाम पर उनकी कुत्सित भावनाएँ आड़े आती हैं. जो बुजुर्ग भले होते हैं, उनके पुत्र भी भले होते हैं, जिनके लिए बुरी पत्नियों को बर्दाश्त करना ही एकमात्र विकल्प होता है. कई बार हालात ऐसे होते हैं कि अलग होना संभव नहीं होता। तो बुजुर्गों को खदेड़ दिया जाता है एक कमरे में. अब ऐसे संयुक्त परिवारों में बच्चे क्या अच्छा सीखेंगे?

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