Monday, 2 February 2015

मेरी दादी - मेरी अम्मा

मेरी दादी - मेरी अम्मा

माता तो कुमाता हो सकती है, लेकिन दादी कभी कुदादी नहीं हो सकती।
यह बात मैंने 12-13 वर्ष की उम्र हो जाने के बाद सुनी थी कि जब मैं 2 महीने की थी, तब मेरी माँ बीमार हो गई और मेरे नाना उन्हें इलाज के लिए अपने शहर मेरठ ले गए. मेरे दादा-दादी ने मुझे पाला। मैं दादी को ही अपनी माँ समझती थी और उन्हें अम्मा कहती थी. लेकिन पिता मैं अपने पिता को ही समझती थी. (अम्मा से मुझे इतना प्यार था कि मैंने अपने ग्रैंड किड्स से अपने को अम्मा कहलवाया, हालाँकि मेरी मॉडर्न पुत्रवधु चाहती थी कि ग्रैंड मॉम जैसा कुछ कहा जाए.) खैर.
ये सब बातें मुझे बताई गईं कि मेरी अम्मा मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती थी. सर्दी, गर्मी, बरसात, कोई भी मौसम हो, अम्मा सुबह चार बजे उठ कर यमुना नदी में नहाने जाती थी, (रिक्शा वाला बाँधा हुआ था), और मुझ 2 महीने की बच्ची को अपने साथ ज़रूर लेकर जाती थी. यमुना नदी के किनारे बनी सीढ़ियों पर वह मुझे लिटा देती थी और जल्दी से यमुना नदी में डुबकी लगा कर मेरे पास आ जाती थी. (उस समय यमुना नदी में पानी रहता होगा?)
मेरे दो वर्ष की होने के बाद मेरी माँ लौटी थी लेकिन मैं दादी के पास ही रही. वैसे घर एक ही था, आमने-सामने कमरे थे, (एक बहुत बड़े हवेलीनुमा मकान में (साथ-साथ दो घर और थे) मेरी दादी, पिता, ताऊ आदि सबके परिवार साथ रहते थे.) लेकिन मैंने कभी माँ नाम की  'उस औरत' को अपनी माँ नहीं समझा। वह अपने कमरे की खिड़की से हाथ से इशारा करके मुझे बुलाया करती थी और मैं उसकी शिकायत अपनी अम्मा से कर देती थी कि वह औरत मुझे बुलाती है, मुझे उसके पास नहीं जाना। अब याद नहीं कि अम्मा क्या जवाब देती थी? (इस पर मैंने एक कहानी लिखी थी, जिसमे 'उस औरत' पर तरस खाया था.)
जब मैं 12-13 साल की हुई तो मुझसे कहा जाने लगा कि 'वह औरत' मेरी सगी माँ है और उसके बच्चे मेरे सगे भाई-बहन. मुझे यकीन ही नहीं आता था. मैं अपने को अपनी अम्मा की अकेली बेटी समझती थी. (मेरी दादी के कोई बेटी नहीं थी.) अम्मा से मुझे जो प्रेम और अपनापन मिला, वह अद्भुत था. यदि मेरे पिता कभी मुझे डाँटते तो अम्मा मेरा सहारा बन कर मेरे साथ खड़ी होती। मेरी कोई इच्छा ऐसी नहीं जो अम्मा ने पूरी न की हो. इसलिए मेरे मन में आज तक माँ का कोई अहसास नहीं है।
मेरी अम्मा ने जो संस्कार मेरे मन में बोए, वे आज तक जीवित हैं. मेरी अम्मा हमेशा कहावतों में बात करती थी. जहाँ नीयत, वहाँ बरकत. भागवान की कमाई में सबका साझा जैसी कहावतें वह खाना खाने से पहले रोटी के टुकड़े तोड़ कर खाने की थाली के बराबर रखते हुए कहती जाती। मेरी दादी बहुत ही दयालु और सहनशील महिला थी. मैं जैसे बरकतों में पल रही थी.
जब से मुझे बताया गया था कि 'वह औरत' मेरी सगी माँ है और उसके बच्चे मेरे सगे भाई-बहन, तब से मैं उनके कमरे में जाने लगी थी. पर मुझे लगता, मैं उन जैसी नहीं हूँ, मैं सबसे अलग हूँ. कई बार मुझे सब चिढ़ाते, कि 'तुझे जब अम्मा जमना नदी ले जाती थी और वहाँ सीढ़ियों पर लिटा कर नहाने चली जाती थी, तब तू किसी और बच्चे से बदल गई थी.' बहुत सालों तक मेरे मन में यह उथल-पुथल रही कि शायद यह सच हो कि मैं बदल गई होऊँ, तभी तो किसी से मेरा दिमाग नहीं मिलता। लेकिन एक तसल्ली की बात थी कि मेरी शक्ल मेरे पिता से डिट्टो मिलती थी. बाद में घर में सबने मुझे अपने से लिपटा-लिपटा कर कहा था, 'अरे, हम तो मज़ाक कर रहे थे, तू सच समझ बैठी? नहीं, नहीं, तू बदली नहीं है, तू हमारी ही है.... मोहिनी।' कुछ दादी ने भी सबको चेतावनी ने दी थी, 'खबरदार, जो मेरी बिटिया से कुछ उल्टा-सीधा कहा तो.'
लोग कहते हैं कि वो बड़े बदनसीब होते हैं, जिनके माँ नहीं होती। मुझे बड़े होने पर पता चल गया था कि मुझे मेरी दादी ने पाला था. मुझे अपनी सगी माँ का कभी कोई अनुभव नहीं रहा. लेकिन मैंने कभी इस संदर्भ में अपने को बदनसीब नहीं समझा। मुझे आज तक लगता है कि मैं बड़ी नसीब वाली हूँ, जो मेरी दादी मेरी अम्मा थी.
मैंने अम्मा की मृत्यु के बाद उन पर कई कहानियाँ और कविताएँ लिखीं. लेकिन अम्मा के अंतिम दिनों में मैं अम्मा के साथ ज़्यादा वक़्त नहीं बिता सकी. उस समय मैं कॉलेज में थी, सखी-सहेलियों के बीच मौज-मस्ती में थी. आज तक इस मलाल को अपने से दूर नहीं कर पाई. काश .... 
और हाँ, एक बात और, मैंने अनेक माँओं को जाने-अनजाने अपने बच्चों को गलत शिक्षा, गलत संस्कार देते देखा है, इसलिए मैं दावे से कह सकती हूँ कि माता तो कुमाता हो सकती है, लेकिन दादी कभी कु-दादी नहीं हो सकती।

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