Tuesday, 17 February 2015

Car Accident

Car Accident

मुझे लगता है, किसी की बद्दुआएँ और दुआएँ मेरे साथ-साथ चल रही हैं. बुरा वक़्त मुझे मारने आता है लेकिन किसी की दुआएँ मुझे ज़िन्दा रखे रहती हैं. (सच कहूँ मित्रों, मुझे दिल से लगता है कि आप सब की दुआएँ मेरे काम आ रही हैं, क्योंकि आपका मेरे प्रति सख्य भाव निःस्वार्थ है.)

आज शाम मैं शॉप्रिक्स मॉल से घर वापस लौट रही थी थी. एक चौराहे पर एक टैक्सी ने मेरी कार को इतने ज़ोर की टक्कर मारी कि मेरी गाडी एक-दो अन्य वाहनों से रगड़ती हुई, जैसे कूदती हुई आगे जाकर दाहिनी ओर के सिग्नल पर उस बूथ से जा टकराई जिस पर ट्रैफिक कंट्रोल करने के लिए सिपाही खड़ा होता है, बूथ गिर गया. (उस समय वहाँ सिपाही नहीं था.) दाहिनी ओर से तेज़ी से आ रही बस उस गिरे हुए बूथ की वजह से वहीँ रुक गई अन्यथा मेरी कार को मेरी तरफ बस की टक्कर लगती और मेरा काम तमाम था. मैं सचमुच में दहल गई. मैंने उतर कर देखा, मेरी कार का हाल बुरा था, बोनट अंदर घुस गया. पीछे और दोनों तरफ के दरवाज़ों पर भयंकर खरोंचों के साथ बड़े-बड़े डेंट पड़ गए, एक दरवाज़े का हैंडल टूट कर वहीँ लटका हुआ था. पीछे का बम्पर दो टुकड़े हुआ पड़ा था. कार बस चार पहियों पर खड़ी थी और चल सकती थी. सड़क की बेतहाशा तमाशबीन भीड़, पुलिस की गाडी, फिर पुलिस चौकी, इन सबको झेलते हुए मैं घर पहुँची। शायद मेरी शक्ल पर दहशत  थी, इसीलिए बच्चों ने पूछा, "इतनी डरी हुई क्यों हो?" मैंने उन्हें बाहर जाकर कार के दर्शन करने को कहा. बेटा मुझसे नाराज़ कि "इतना सब हो गया, आपने फ़ोन करके मुझे बुलाया तक नहीं, और यह कार को चारों तरफ चोट कैसे लगी?" मुझे सिलसिलेवार कुछ बताना नहीं आया. मैं खुद भी हैरान थी कि आखिर मेरी गाड़ी चारों तरफ से कैसे ठुकी? और मेरे कार चलाने पर पाबन्दी लगा दी गई. संयोग देखिए, जबकि आज ही सुबह कह रहा था, "नई गाड़ी कौन सी लेनी है, मॉम? इसे बदलो, तीन साल हो गए."



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