Sunday, 1 February 2015

Film एक हसीना थी

Film एक हसीना थी

मुझे आज फिर फ़िल्म 'एक हसीना थी' याद आई। पहले भी याद आती रही है। जब-जब मुझे अपना 'मूर्ख प्रेमिका' वाला रूप और अंततः चण्डी के रूप में दूसरे को मात देकर विजय प्राप्त करने वाला रूप याद आता है, तब-तब यह फ़िल्म मेरी रगों में हलचल मचा देती है। इस फ़िल्म का खासकर वह दृश्य जब नायक सैफ अली खान जेल में कैद नायिका उर्मिला मंतोडकर से मिलने अपने वकील के साथ जाता है, मोहासिक्त नायिका उसकी बातों में आकर उसके गले से लग जाती है और नायक वकील की ओर इस गरूर से देखता है कि देखो, यह फिर मेरे झाँसे में आ गई। बार-बार उसके झाँसे में आ जाने वाली नायिका मोह से मुक्त हो जब असलियत को पहचानती है तो नायक से बदला लेने की और उसे सही पाठ पढ़ाने की उसकी हर चाल अद्भुद होती है। जिस लड़की में सती-सावित्री छुपी होती है, उसी में कहीं चण्डी भी छुपी हुई होती है, जो समय पड़ने पर अपना ऐसा रूप दिखाती है कि .... उफ़ उफ़ उफ़ !!!



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