Friday, 6 February 2015

मन की आँखें खोल Kavita 228

मन की आँखें खोल

मन की आँखें खोल बबुआ, मन की आँखें खोल

अनदेखे को देख सकें जो
वे नैना अनमोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

कभी कहे कुछ, कभी कहे कुछ
बातों में है झोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

हर कोई तेरे गुण गाए
ऐसी वाणी बोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

विपदा के पल जब भी आएँ
निज कर्मों को तोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

सहज सरल सीधी चालें चल
झंझट मत ले मोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

पावन है रिश्तों की माया
कहीं ज़हर मत घोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

मुड़-मुड़ कर वापस आना है
यह दुनिया है गोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

दबा-ढका सब ज़ाहिर है अब
और खुलेगी पोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

पिंजरे से जब बाहर आए
खुली हवा में डोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

मुक्ति पर्व की जिज्ञासा में
ढम ढम बाजे ढोल बबुआ, मन की आँखें खोल.

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