Sunday, 22 February 2015

जीने की तमन्ना Kavita 229

जीने की तमन्ना

जीने की तमन्ना इतनी कि
हर बार उम्र को पीछे कर
मैं दौड़ गई मेलों में और सुनसानों में।

भागमभाग नहीं अब कोई
छुपाछुपी भी बंद हो गई
है फर्क नहीं खेलों में और बलिदानों में।

जीवन की गाड़ी सर्र सर्र
बिन पंखों के ही फर्र फर्र
है दौड़ रही रेलों में और मैदानों में।

कौन सिरफिरा उछल-उछल कर
बेमतलब की बाजी खेले
ढूँढो उसको जेलों और पागलखानों में।

कुछ अज्ञाती भाव सुनहरे
कुछ आभासी रंग रुपहले
हैं सजे हुए शमियानों और शमशानों में।

No comments:

Post a Comment