Tuesday, 31 March 2015

भारतरत्न अटल जी को प्रणाम

भारतरत्न अटल जी को प्रणाम

एक मित्र ने मुझे मैसेज में बताया कि बलराज मधोक, जो भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष और एक वरिष्ठ नेता रहे हैं. ने अपनी आत्मकथा 'ज़िन्दगी का सफर' में अटल बिहारी वाजपेयी जी के युवावस्था के कुछ अनर्गल अंतरंग प्रसंगों के बारे में जगदीश प्र. माथुर के बताए कुछ किस्से लिखे हैं, यह भी लिखा है कि उन्होंने (बलराज मधोक ने) अटल जी को बुला कर बात की और अटल जी के जवाब से बात साफ़ हो गई. (यानि अटल जी पर जो आरोप लगाया जा रहा था. वह ख़त्म हो गया. मुझे तो यही समझ आया कि बलराज मधोक की ग़लतफ़हमी दूर हो गई.)

वैसे अटल जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक साक्षात्कार में कहा था कि उनके सम्बन्ध राजकुमारी कौल के साथ रहे, राजकुमारी कौल के पति प्रोफ़ेसर बी. एन. कौल भी उनके अच्छे मित्र थे. अटल जी उनके घर पर साथ ही रहते थे, मित्र ने भी उन्हें बाइज़्ज़त स्वीकारा हुआ था, उनके बच्चे भी उन्हें पितृवत मानते थे. राजकुमारी कौल की पुत्री नमिता को उन्होंने ऑफिशियली अडॉप्ट किया था जिसके बारे में ये अटकलें भी लगाई जाती हैं कि वे नमिता के बायोलॉजिकल फादर हैं. अटल जी ने कभी विवाह नहीं किया और मित्र के परिवार को ही अपना परिवार माना। श्रीमती कौल का निधन पिछले वर्ष हुआ.

हरेक की युवावस्था में कुछ न कुछ होता है. आखिर ये लोग भी इंसान हैं. मेरे विचार में व्यक्तिगत बातों से अधिक अन्य किए गए अच्छे काम व्यक्ति को महान बनाते हैं. ये सब बातें धरी की धरी रह जाती हैं. इसलिए किसी बड़े सुप्रसिद्ध व्यक्ति के बारे में जब कोई गलत बोलता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता। अटल जी एक महान नेता थे, एक सफल प्रधानमन्त्री थे. एक अच्छे इंसान और एक बढ़िया कवि हैं. उन्हें भारत रत्न मिलने पर मेरी तरह बहुत लोग खुश होंगे।


Sunday, 29 March 2015

26. एक भावचित्र : मन चंगा

26. एक भावचित्र : मन चंगा

मन चंगा, तो कठौती में गंगा। मैं अपने एक कमरे में खुश हूँ.

देखो बाहर, कितना अच्छा मौसम है, कितनी प्यारी हवा चल रही है, कभी बालकनी में तो बैठो।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

ज़रा घर से बाहर तो निकलो, कभी पार्क में चली जाया करो, इधर-उधर टहलो, बतियाओ, हँसो।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

लोगों से मिलो-जुलो, घूमो-फिरो, सैर-सपाटे को जाओ, ज़िन्दगी को चलने से मत रोको। 

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

अकेले बोर हो जाती होंगी, चलो, कोई फिल्म देख आएँ, चलो, किसी संगी-साथी से मिल आएँ.

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

तुम सठिया गई हो, तुम ख़त्म हो गई हो, तुममे अब कोई सम्भावना नहीं।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।


Thursday, 26 March 2015

कि तुम आना Kavita 229

कि तुम आना

कि तुम आना
इस सूखी धरा पर
नमी सा बिछ जाना।

कि तुम आना
लिखे जो गीत तुम्हारे लिए
उन्हें गुनगुनाना।

कि तुम आना
बुझती हुई चिंगारी को
हवा दे जाना।

कि तुम आना
मौत के साये में झूलते मन को
निर्भय बनाना।

कि तुम आना
मेरी सारी मूर्खताओं पर
फिर से मुस्कुराना।

कि तुम आना
मुर्दा पड़ी कल्पनाओं को
पंख लगा जाना।

कि तुम आना
अगले जन्म में मिलने का वादा करके
वापस लौट जाना।

कि तुम आना
एक बार तो आना
ज़रूर आना।

कि तुम आना......

Tuesday, 24 March 2015

25. एक भावचित्र : खालीपन

25. एक भावचित्र : खालीपन

मुझे लगता रहा कि मेरी ज़िन्दगी खाली है, पर इस खाली ज़िन्दगी में भी इतना कुछ भरा हुआ है कि उड़ेंलते-उड़ेंलते भी खाली नहीं हो रहा. घटनाएँ घटित होनी बंद होंगी, तो भीतर यादें भर जाएँगी। यादों को मैं किसी रचना में ढाल दूँ तो भीतर, और कुछ नहीं तो, खालीपन ही भर जाएगा। ये चटखते हुए सपने, ये दरकते हुए अपने, ये रिश्तों के महल अधबने, लगता है कि ये ज़िन्दगी का सार तत्व निचोड़ कर ले गए और जीवन को खाली कर गए, लेकिन नहीं, ये हमारी ज़िन्दगी को जुगुप्सा, वितृष्णा, हीन-भावना और आत्मग्लानि के साथ-साथ नाना प्रकार के रोमांचक अहसासों और अनोखे अनुभवों से भरते हैं, खट्टी-मीठी यादों से भरते हैं, दिवा-स्वप्नों की रचना करते हैं. जीवन में जीवन के खालीपन को भरने के लिए रोज़ तो कुछ घटेगा नहीं, जो घट चुका होता है, वही हमारी जमा-पूँजी है, वही हमारी अचल सम्पत्ति है, जो हमें खाली होने के अहसास के साथ-साथ भरा होने का अहसास भी कराती है. ज़िन्दगी हमें लगती है कि खाली है, लेकिन वह वस्तुतः खाली नहीं होती, खालीपन से भरी हुई होती है.


Monday, 23 March 2015

स्कूलों की भूमिका

स्कूलों की भूमिका

एक अध्यापक के आग्रह पर लिखी निम्नलिखित टिप्पणी शायद आपको पढ़ने योग्य लगे। वे जानना चाहते थे कि मैं अपने अनुभव से बताऊँ कि यदि कोई स्कूल-छात्र लेखक बनना चाहे तो स्कूल को क्या सहयोग करना चाहिए?
मुझमे लिखने की आदत विकसित करने में, मुझे नहीं याद कि स्कूल की क्या भूमिका रही? स्कूल में स्कूली पढ़ाई की ओर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, किसी को लेखक बनाने के इरादे से स्कूलों में ध्यान नहीं दिया जाता। लेखक स्वतः बनते हैं. मेरे विचार में स्कूल में बच्चा या बच्ची 16-17 वर्ष की आयु तक होते हैं, उस समय यदि किसी बच्चे में लिखने का शौक स्वतः जन्म ले तो ठीक है. स्कूल उस दौरान उन्हें अच्छी पुस्तकें उपलब्ध करा सकता है, उन्हें उन पुस्तकों को पढ़ने का महत्व बता सकता है, अच्छे लेखकों के नाम से परिचय करवा सकता है, तथा कुछ कालजयी पुस्तकें पढ़ने के लिए उनमें चेतना जगा सकता है. इससे बच्चों में भाषा-शैली एवं शिल्प के प्रति जागरूकता पैदा होगी जो आगे जाकर, यदि वे लेखक बने तो उन्हें मददगार साबित होगी. 
बच्चों में रचनात्मकता कई तरह की हो सकती है, ज़रूरी नहीं कि वे लेखन के क्षेत्र में ही हो. बच्चों में रचनात्मकता के विकास के लिए उन्हें सही वातावरण दिया जाना चाहे, वे जिस दिशा में आगे बढ़ना चाहें, उन्हें उस दिशा में आगे बढ़ने के पूरे अवसर दिए जाएं। स्कूल के स्तर तक बच्चे निर्णय नहीं कर पाते कि उन्हें अपने भविष्य के लिए कौन सी दिशा चुननी है, इसलिए उनके सम्मुख एक से अधिक रास्ते खुले रखने चाहिए, ताकि वे एक से अधिक क्षेत्रों में अपने शौक के पनपने की गुंजाइश देख सकें। फिर जिस क्षेत्र में वे टिकना चाहेंगे, उसमें टिक जाएंगे।
लेखन-कार्यशालाएँ विद्यार्थी का बहुमुखी विकास करने में उपयोगी हो सकती हैं. लेखन-कार्यशालाओं में कहानी-कविता का पाठ करने की कला व नाटक में संवाद अदायगी की कला सिखाई जा सकती है, कोई विषय देकर कहानी-कविता लिखने के लिए कहा जा सकता है, किसी विषय पर निबंध लिखवाया जा सकता है, किसी विद्वतजन को बुला कर उनके विचार सुनवाए जा सकते हैं, किसी लेखक या अन्य कलाकार से बच्चों की बातचीत करवाई जा सकती है, बच्चों को अपनी कल्पना से कुछ लिखने के लिए कहा जा सकता है. कई तरह से उनमें लेखन या किसी अन्य कला के प्रति रुचि पैदा करने की ओर ध्यान दिया जा सकता है.लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इन कार्यशालाओं में सक्रिय भाग लेकर कोई लेखक बन ही जाए. स्कूल की उम्र तक बच्चों में इतनी परिपक्वता नहीं आती कि वे चुनाव कर सकें या जो चुना है, उसी पर स्थिर रह सकें

ज्ञानी

ज्ञानी

हे प्रभु ! मुझे आत्मग्लानि से उबार। जब स्थिति ऐसी हो जाए कि पिछला एक भी दिन याद करें तो ज़हर खा लेने का मन हो, तो भीड़ ही एकमात्र सहारा नज़र आती है. जिनके दिल पर ज़्यादा बोझ होते हैं, वे अपने इर्द-गिर्द बड़ी भीड़ इकट्ठी करते हैं, हँस-हँस कर अपनी झूठी ख़ुशी का प्रदर्शन करते हैं और बोझ को प्रवचन की शक्ल में उतारते हैं. दिल के बोझ दूसरों को उपदेश देने लायक तो बना ही देते हैं. जो हमने किया, तुम वह न करो. जो हम कहते हैं, तुम वह करो. हमारे बताए मार्ग पर चलो. जितने इस तरह के ज्ञानी हैं, वे सब अपने अतीत में अपने अज्ञान के कारण भटके हुए होते हैं, उस भटकन से निकल कर ही वे इस काबिल बनते हैं कि दूसरों को न भटकने या भटकन से बाहर निकलने का गुर बता सकें। बिना गलती किए कोई संत-ज्ञानी नहीं बनता। हमारी गलतियाँ, हमारी बेवकूफ़ियां किताबों से ज़्यादा बड़ा ज्ञान हमें सिखाती हैं.


Thursday, 19 March 2015

पुपुल जयकर

पुपुल जयकर

हमारे यहाँ की महिलाओं ने भी बड़े-बड़े काम किए हैं. कई तो उस उम्र तक कर्मठ और क्रियाशील रहीं जिस उम्र को जीवन का चौथा चरण माना जाता है और जिस उम्र तक आते-आते व्यक्ति शारीरिक रूप से अंजर-पंजर हो जाता है यानि लगभग समाप्त हो जाता है. ऐसी ही एक महिला थीं पुपुल जयकर, जो सत्तर वर्ष की आयु में राजीव गाँधी के कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री बनीं तथा राजीव गाँधी की सांस्कृतिक सलाहकार रहीं। मेरे ख्याल से इतनी आयु में इस पद को प्राप्त करने वाली ये प्रथम महिला रही होंगी। ये लेखिका भी थीं और अपने देश के हस्तशिल्प एवं हस्तकरघा कार्यों से जुडी हुई थीं. इनकी पुस्तकों में जे. कृष्णामूर्ति की जीवनी J. Krishnamurti : A Biography (1988) और इंदिरा गाँधी की जीवनी Indira Gandhi : An Intimate Biography (1992) शामिल हैं. इनकी मृत्यु 29 मार्च, 1997 में 82 वर्ष की अवस्था में हुई. अच्छा लगता है ना किसी को, विशेषकर महिला को इतनी आयु तक चुस्त-दुरुस्त देख कर. ऐसी महिला हमारे लिए प्रेरणा-स्वरूप हैं.

नीचे तस्वीर में पुपुल जयकर 1985 में राजीव गाँधी के साथ, उन्हें कोई पुस्तक भेंट करते हुए.


Sunday, 8 March 2015

Women's day special : 4

Women's day special : 4

यह महिला दिवस, 8th March, उन औरतों के नाम, जो औरत होने के बावजूद पूर्ण औरत होने के लिए तरस रही हैं. यह उन औरतों के दर्द की कहानी है, जो पुरुष-शरीर में कैद हैं, यानि Transgender हैं यानि जिन्हें आम भाषा में हिजड़ा कहते हैं. ऐसी ही एक औरत की डायरी के कुछ और पन्ने.

मैं जिस तरह से अपना जीवन बसर करना चाहती हूँ, क्या इसका निर्णय दूसरे लोग करेंगे? समाज के पास मेरे लिए केवल तीन विकल्प हैं, या तो मैं तालियाँ बजा कर लोगों को दुआएँ दूँ, या मैं घर-घर जाकर भीख माँगूँ, या मैं वेश्यावृत्ति करूँ। क्या मैं अन्य लोगों की तरह सम्मानजनक जीवन नहीं जी सकती? अपने लिए सम्भावनाएँ तलाश करती हुई? मैं केवल एक शरीर नहीं हूँ, केवल बाहरी रूप-रंग नहीं हूँ, मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो बेशकीमती है. मेरे शरीर में, जिसे अधूरा कह दिया गया है, एक भरा-पूरा दिल है, जिसमे भावनाएँ हैं, कामनाएँ हैं, सपने हैं. मैं अन्य लोगों की तरह ही एक इंसान हूँ, मुझे किसी अन्य क्षेत्र से आया हुआ अजनबी न समझें। यह घटिया समाज अज्ञानी है जिसे हम जैसों के होने की हकीकत नहीं मालूम। क्या यह मेरे बस में था कि मैं कोमल, स्त्रियोचित भावनाओं के साथ एक पुरुष शरीर में जन्मी? मेरा शरीर क्यों उपहास का विषय है? जब-जब समाज मुझ पर हँसता है, मेरे भीतर कुछ मर जाता है. लेकिन मैं अपना मरापन किसी को दिखाती नहीं, उसे सौंदर्य-प्रसाधनों की परतों में छुपा लेती हूँ, क्योंकि मैं शर्मदार हूँ, बेशर्म समाज जैसी बेशर्म नहीं।

(जिसकी कहानी मैंने लिखी है, मैंने उससे पूछा, 'जब तुमने अपने वक्षस्थल को प्राकृतिक रूप देने के लिए इलाज करवाया, तो क्या सेक्स चेंज भी करवाया है?' वह बोली, 'सेक्स चेंज करवाने के लिए मैं विदेश गई थी लेकिन मुझे डॉक्टरों द्वारा बताया गया कि मेरा शरीर उस तरह के ऑपरेशन को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा, शायद दो वर्ष मुझे बिस्तर पर ही रहना पड़े. मैं चूँकि एक नृत्य विद्यालय चलाती हूँ, इसलिए वहाँ की ज़िम्मेदारियों को देखते हुए मेरे लिए दो वर्ष बिस्तर से बँधे रहना संभव नहीं था, इसलिए सेक्स चेंज नहीं करवा सकी.' एक ठंडी आह भर कर वह आगे बोली, 'मणिका, This is the reason, why I am not a complete woman like you.' मैं उसके शब्दों में अपने सन्दर्भ में सचाई खोजती रही, क्या मैं complete woman हूँ? क्या कोई भी औरत complete woman है? या कोई भी पुरुष, कोई भी इंसान complete है? हम सब अधूरे हैं, किसी न किसी रूप में, कोई शरीर से, कोई मन से, कोई दिमाग से, कोई भाग्य से, कोई चरित्र से, कोई परिवार से, कोई अपने कार्य से, लेकिन जिस तरह से ये Transgender अपने अधूरेपन को लेकर दुखी एवं शर्मिन्दा हैं, क्या हम तथाकथित पूरे लोग कभी अपने अधूरेपन पर दुखी एवं शर्मिन्दा हुए हैं?)

प्रस्तुति : मणिका मोहिनी

Saturday, 7 March 2015

Women's day special : 3

Women's day special : 3

यह महिला दिवस उन औरतों के नाम, जो औरत होने के बावजूद पूर्ण औरत होने के लिए तरस रही हैं. यह उन औरतों के दर्द की कहानी है, जो पुरुष-शरीर में कैद हैं, यानि Transgender हैं यानि जिन्हें आम भाषा में हिजड़ा कहते हैं. ऐसी ही एक औरत की डायरी के कुछ पन्ने.

(उस अनाम कन्या की मूल लिखी रचना, एक महिला से झगड़ा हो जाने पर क्रोध में लिखी गई, ज्यों की त्यों प्रस्तुत है. इस रचना में भावनाओं का उद्रेक है, जिसमें छुपी है एक भीषण सचाई)

Men are attracted to transwomen as much as 
they are attracted to biological women. 
Transwomen are bold, raw and sexually 
stimulating. A transwoman can evoke the 
passion of a man like a volcanic eruption. 
A man falls in love with a transwoman for many 
reasons. Not only is she beautiful and sensual 
but also a free person thrown away from the 
strange social norms of the society. Though she 
may live in rags, her spirit is free and she is 
prosperous and liberated in love. For a biological 
woman in India, her partner is chosen by her 
biological families. But a transwoman is free to 
choose her partner and may live with him even 
without a marriage bond. It is an unconditional 
bond of togetherness bound by love and 
passion.

A transwoman's love for a man is voluptuously 
complete. Some transwomen surrender totally 
to their men and the men become their 
masters. At times, a transwoman knows she is 
exploited, yet for her, he is the anchor in her 
life. She pours cascades of pure love on him 
which drives him madly to possess her 
completely. She believes in her own chastity and 
loyalty.

Transwomen are great playmates in bed. Men 
open up their deepest animal desires and gallop 
in flames of endless joy with them. Transwomen 
are explosive. Men are experimental. Together 
they burn and blow up playing with the Pandora 
of sexual desires. A man plunges deep into her 
and she swallows him up to the core. 
A lonely midnight walk by her on a high street 
does magnetic effect on men. They buzz around 
her like hungry bees for their carnal 
satisfactions. She can choose the one who she 
desires. The remaining bees can fly home and 
cuddle with their loved ones.

The uncommonness about her identity is the 
mystery that men seek. Transwomen are magic 
and men want more of them. Transwomen are 
satiating divas, the undisputed queens of 
loveland.

प्रस्तुति : मणिका मोहिनी
(क्रमशः)

Women's day special : 2

Women's day special : 2

यह महिला दिवस उन औरतों के नाम, जो औरत होने के बावजूद पूर्ण औरत होने के लिए तरस रही हैं. यह उन औरतों के दर्द की कहानी है, जो पुरुष-शरीर में कैद हैं, यानि Transgender हैं यानि जिन्हें आम भाषा में हिजड़ा कहते हैं. ऐसी ही एक औरत की डायरी के कुछ पन्ने.

जैसे कि एक पुरुष को मर्द कहते हैं, एक स्त्री को औरत कहते हैं, वैसे ही हम जैसों को हिजड़ा कहते हैं. मुझे पसंद नहीं कि मुझे हिजड़ा या Transgender कहा जाए. मेरा जन्म एक लड़के के रूप में ज़रूर हुआ लेकिन मैं लड़का नहीं हूँ, मैं एक लड़की हूँ. कभी-कभी लगता है कि अपने अतीत का हर वह हिस्सा जला दूँ जहाँ मैं लड़के के रूप में जानी जाती हूँ और कहीं ऐसी जगह चली जाऊँ जहाँ किसी को यह न पता हो कि मेरा जन्म लड़के के रूप में हुआ था, जहाँ सब मुझे लड़की ही समझें। जब भी कोई मुझे मेरे पुराने लड़के वाले नाम से पुकारता है, तब-तब मेरे भीतर जैसे कुछ मर जाता है. क्यों मुझे लोग एक लड़की नहीं मान लेते? मैं 14 वर्ष की आयु से लड़की की तरह रह रही हूँ, मुझे 21 वर्ष हो गए सम्पूर्ण रूप से लड़की की तरह रहते हुए. मुझ पर तरस खाओ, दुनिया वालों, और मुझे लड़की ही समझो।

मैं पिछले पाँच साल से हार्मोन्स पर हूँ ताकि मेरे वक्षों में स्वाभाविक उभार आए और हाँ, ऐसा हुआ है. अब एक लड़की की भाँति ही मेरा वक्षस्थल स्वाभाविक है. यहाँ एक बात बता दूँ, इन हार्मोन्स का असर हम जैसों पर ही होता है. यदि कोई सामान्य लड़का सोचे कि वह भी हार्मोन्स लेकर अपना वक्षस्थल बढ़ा ले तो यह संभव नहीं है. इसके लिए उसे भीर से लड़की होना होगा। मुझे अपने वक्षस्थल पर गर्व है और मैं स्वयं में लड़कीपन महसूस करती हूँ तथा किसी पुरुष को देख कर मैं भी वैसा ही महसूस करती हूँ जैसा कोई अन्य लड़की। मैं पुरुष की ओर आकर्षित होती हूँ, मेरा पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाने को दिल करता है. मेरी इच्छा होती है कि कोई पुरुष मुझे चाहे, प्यार करे और वह सब कुछ मुझे दे जिसकी मैं भी हकदार हूँ, अन्य लड़कियों की तरह. 

स्त्री होने के अहसास ने मुझे यह अहसास भी कराया है कि इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे एक स्त्री प्राप्त न कर सके. यदि स्त्री के पास महत्वाकांक्षा है, आत्मविश्वास है, कुछ कर दिखाने का हौसला है तो वह ज़रूर अपने गंतव्य पर पहुँचेगी। एक स्त्री के हर प्रकार की परिस्थितियों एवं कठिनाइयों से समझौता करने की योग्यता होती है. मुझे गर्व है कि मैं एक स्त्री हूँ और कमज़ोर नहीं हूँ. यह दुनिया स्त्रियों के कारण सुन्दर है. स्त्री में ही शक्ति है, नव-रचना करने की.

वैज्ञानिक कहते हैं, Transgender का सम्बन्ध मस्तिष्क से है. यदि कोई बच्चा लड़के का शरीर लेकर पैदा होता है, उसके मस्तिष्क में होता है कि वह लड़की है. इसी तरह लड़की का शरीर लेकर पैदा होने वाले Transgender के मस्तिष्क में होता है कि वह लड़का है. There is no COMPLETE man or woman in this world . Every male has certain female attributes and every female has certain male attributes. They are called sexual characteristics. These characteristics can be adopted, developed through surroundings and environment, or it could be inert since birth. Not all birth defects can be identified at birth. जब तक बच्चा एक ख़ास उम्र तक बड़ा न हो जाए, यह पता नहीं लगाया जा सकता कि वह गूँगा-बहरा है, अंधा है या स्पैस्टिक है. इसी तरह आप बच्चे के एक ख़ास उम्र पर पहुँचने तक उसका जेंडर निश्चित नहीं कर सकते। जेंडर बच्चे की शारीरिक बनावट से निश्चित नहीं होता, बल्कि मानसिक बनावट से निश्चित होता है, ऐसा वैज्ञानिक कहते हैं. इसलिए जब मैं कह रही हूँ कि मैं लड़की हूँ तो मानना चाहिए कि मैं एक लड़की हूँ. कोई भी वास्तविक लड़का अपने को लड़की नहीं कहना चाहेगा।

Since past two years, I am having a man in my life....and i am having a living relation with him... not married legally...but by ritually.... yes...legal marriage is not yet allowed as gay marriage is still not passed by Law.

(क्रमशः। जल्दी ही इसका एक और अंश पोस्ट करूँगी।)

Friday, 6 March 2015

Women's day special : 1

Women's day special : 1

यह महिला दिवस उन औरतों के नाम, जो औरत होने के बावजूद पूर्ण औरत होने के लिए तरस रही हैं. यह उन औरतों के दर्द की कहानी है, जो पुरुष-शरीर में कैद हैं, यानि Transgender हैं यानि जिन्हें आम भाषा में हिजड़ा कहते हैं. ऐसी ही एक औरत की डायरी के कुछ पन्ने.

मेरा जन्म आज से 35 वर्ष पूर्व एक लड़के के रूप में हुआ था. मेरा शरीर लड़कों के जैसा था. लेकिन मैं बचपन से लड़कियों की तरह रहती थी. मुझे अपनी बहनों की तरह कपडे पहनना, गुड़ियों से खेलना अच्छा लगता। शुरू-शुरू में मेरी माँ को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगा. लेकिन 13-14 वर्ष की होने पर भी जब मेरी ज़िद अपनी बहनों की तरह सजने-सँवरने की रही तथा मेरे हावभाव, मेरा बोलना, चलना, हँसना, शक्ल-सूरत में भी लड़की जैसी छवि दिखने लगी तो मेरे माता-पिता को चिता हुई. मैं स्कूल में होने वाले नृत्य के कार्यक्रमों में लड़की की तरह सज कर नृत्य करती, नाटक में लड़की के किरदार निभाती, मेरे हर अंदाज़ स्त्रियोचित होते। धीरे-धीरे मैं बड़ी हो रही थी, मैं सहज रूप से लड़कों की ओर आकर्षित होती, मुझे सब लड़कियाँ अपनी बहनों जैसी लगतीं। अनायास मैंने महसूस किया कि लोग मुझे देख कर हँसते हैं, मुझे विचित्र नामों से पुकारते हैं, छक्का, हिजड़ा, नामर्द। मेरा मन हुआ, मैं आत्महत्या कर लूँ. चिल्ला-चिल्ला कर कहूँ कि मैं लड़की हूँ, देखो, मैं लड़कियों की तरह चलती हूँ, लड़कियों की तरह बोलती हूँ, लड़कियों की तरह हँसती हूँ, और सुन्दर भी तो कितनी हूँ लड़कियों की तरह. लेकिन मेरी कौन सुनता। खुद मेरे पिता ने मेरी एक नहीं सुनी। वैसे भी, लोगों को बेटे का मोह होता है, वे अपना बेटा कैसे खोते? उन्होंने मुझे रास्ते पर लाने के लिए एक रास्ता निकाला। उनका ख्याल था, शायद मैं उनके निकाले रास्ते से 'सुधर' जाऊँ। मैं उन्हें यह बात मनवा नहीं पाई कि पप्पा, मैं बिगड़ी हुई कहाँ हूँ? मैं तो आप की ही पैदा की हुई औलाद हूँ. मैं जैसी भी हूँ, उसमें मेरा क्या कसूर? मैंने खुद को ऐसा नहीं बनाया। मैं जैसी भी हूँ, वैसी बनी-बनाई पैदा हुई हूँ. Transgender पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते। लेकिन पप्पा कहाँ सुनने वाले थे. उनके विचार में मुझ पर एक 'खब्त' सवार था जो मेरा विवाह कर देने से उतर जाएगा। और ज़बरदस्ती मेरा विवाह कर दिया गया मात्र 23 वर्ष की आयु में. मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं कि मैं उस लड़की को, जो मेरी पत्नी नाम से जानी गई,  सुख यानि शारीरिक सुख नहीं दे पाई. जल्दी ही वह मेरी कमज़ोरी को जान गई. लगभग सवा साल बाद मेरे पिता का स्वर्गवास हुआ, उसके बाद मैंने अपनी तथाकथित पत्नी से तलाक लेकर उसका विवाह अन्यत्र करवाया। वह मुझसे बहुत प्रसन्न है और मुझे अपनी प्रिय सखी मानती है.

वस्तुतः मेरा दर्द मेरी बड़ी बहन ने समझा। उसने साफ़ शब्दों में मुझे समझाया, 'नामर्द कहलाने से बेहतर है कि साडी और चूड़ियाँ पहन कर एक इज़्ज़तदार स्त्री का जीवन जीओ.' और तब से मैं खुलेआम एक लड़की का जीवन जी रही हूँ, एक संभ्रांत परिवार की पढ़ी-लिखी, सुन्दर-सुशील, नृत्यांगना, नृत्य-शिक्षिका और बहुत सी सहेलियों की चहेती। मेरा नाम कुछ भी रख लीजिए, मैं आप सब में से ही हूँ.

(क्रमशः। जल्दी ही इसका अगला अंश पोस्ट करूँगी।)

Tuesday, 3 March 2015

My Father : Shri Ram Nath Chopra ji

My Father : Shri Ram Nath Chopra ji

कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिनके बारे में जिज्ञासा कभी धुँधली नहीं पड़ती। जितना जानते जाओ, उससे ज़्यादा जानने के लिए बचा रह जाता है. जैसे एक विषय है भूत. क्या मरने के बाद इंसान भूत बन जाता है? कहते हैं, अतृप्त आत्माएँ भूत बन जाती हैं. या मरने के बाद कुछ समय तक मरने वाले की आत्मा उसी जगह टहलती रहती है? मेरे पिताश्री अपने अंतिम दिनों में कई बार मेरे घर आकर महीनों रहे. हम उन्हें बाऊजी कहते थे. बाऊजी ने मेरे इस नॉएडा वाले घर में अंतिम साँस ली. उनका कमरा पहली मंज़िल पर था. मेरा कमरा भी पहली मंज़िल पर था. (अब मेरा वही कमरा है जिसमे वे रहते थे.) उनकी मृत्यु के एक सप्ताह बाद बरखा को नीचे अपने कमरे में महसूस हुआ कि बाऊजी उसके ऊपर वाले कमरे में चल रहे हैं. उसे एक पल के लिए भी यह नहीं लगा कि बाऊजी अब नहीं रहे. बरखा ने ही बताया कि मरने के बाद आत्मा कुछ दिन तक उसी घर में घूमती है. बहुत दिनों तक मुझे भी लगता रहा कि बाऊजी मेरे पलँग के चारों ओर चल रहे हैं. क्या यह सिर्फ ख्याल था? या सच में उनकी आत्मा टहल रही थी?

उनका अगले जन्म में विश्वास था और वे यह मानते थे कि किसी की मृत्यु के तुरंत बाद यदि परिवार की कोई स्त्री गर्भ धारण करती है तो मरने वाले की आत्मा उस गर्भ में आ जाती है और मरने वाले का पुनर्जन्म उस गर्भ के बच्चे के रूप में होता है. वे मेरे घर में पुनर्जन्म लेना चाहते थे और कहा करते थे कि देखना, मैं मरने के बाद बॉबी का बेटा बन कर जन्म लूँगा। उनके जीवित रहते जब बरखा गर्भवती हुई तो उनके चेहरे पर मैंने ख़ुशी से ज़्यादा मलाल देखा, जैसे अफ़सोस कर रहे हों कि वे बॉबी का बेटा बनने से रह गए. अगले जन्म में इतना अटूट विश्वास? कहते हैं, बेटियाँ अपने माता-पिता का श्राद्ध नहीं करतीं, पर मैं उनका श्राद्ध करती हूँ. (मेरा भाई तो करता ही है, श्राद्ध के दिनों में.) मैं उनके मृत्यु दिवस पर अपने हिसाब से उनका श्राद्ध करती हूँ. आज यूँ ही उनकी फोटो देख कर मन हुआ यह लिखने के लिए.

बाऊजी, अंतिम दिनों में.