Tuesday, 24 March 2015

25. एक भावचित्र : खालीपन

25. एक भावचित्र : खालीपन

मुझे लगता रहा कि मेरी ज़िन्दगी खाली है, पर इस खाली ज़िन्दगी में भी इतना कुछ भरा हुआ है कि उड़ेंलते-उड़ेंलते भी खाली नहीं हो रहा. घटनाएँ घटित होनी बंद होंगी, तो भीतर यादें भर जाएँगी। यादों को मैं किसी रचना में ढाल दूँ तो भीतर, और कुछ नहीं तो, खालीपन ही भर जाएगा। ये चटखते हुए सपने, ये दरकते हुए अपने, ये रिश्तों के महल अधबने, लगता है कि ये ज़िन्दगी का सार तत्व निचोड़ कर ले गए और जीवन को खाली कर गए, लेकिन नहीं, ये हमारी ज़िन्दगी को जुगुप्सा, वितृष्णा, हीन-भावना और आत्मग्लानि के साथ-साथ नाना प्रकार के रोमांचक अहसासों और अनोखे अनुभवों से भरते हैं, खट्टी-मीठी यादों से भरते हैं, दिवा-स्वप्नों की रचना करते हैं. जीवन में जीवन के खालीपन को भरने के लिए रोज़ तो कुछ घटेगा नहीं, जो घट चुका होता है, वही हमारी जमा-पूँजी है, वही हमारी अचल सम्पत्ति है, जो हमें खाली होने के अहसास के साथ-साथ भरा होने का अहसास भी कराती है. ज़िन्दगी हमें लगती है कि खाली है, लेकिन वह वस्तुतः खाली नहीं होती, खालीपन से भरी हुई होती है.


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