Sunday, 29 March 2015

26. एक भावचित्र : मन चंगा

26. एक भावचित्र : मन चंगा

मन चंगा, तो कठौती में गंगा। मैं अपने एक कमरे में खुश हूँ.

देखो बाहर, कितना अच्छा मौसम है, कितनी प्यारी हवा चल रही है, कभी बालकनी में तो बैठो।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

ज़रा घर से बाहर तो निकलो, कभी पार्क में चली जाया करो, इधर-उधर टहलो, बतियाओ, हँसो।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

लोगों से मिलो-जुलो, घूमो-फिरो, सैर-सपाटे को जाओ, ज़िन्दगी को चलने से मत रोको। 

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

अकेले बोर हो जाती होंगी, चलो, कोई फिल्म देख आएँ, चलो, किसी संगी-साथी से मिल आएँ.

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।

तुम सठिया गई हो, तुम ख़त्म हो गई हो, तुममे अब कोई सम्भावना नहीं।

नहीं, मैं अपने कमरे में खुश हूँ. मन चंगा, तो कठौती में गंगा।


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