Monday, 23 March 2015

ज्ञानी

ज्ञानी

हे प्रभु ! मुझे आत्मग्लानि से उबार। जब स्थिति ऐसी हो जाए कि पिछला एक भी दिन याद करें तो ज़हर खा लेने का मन हो, तो भीड़ ही एकमात्र सहारा नज़र आती है. जिनके दिल पर ज़्यादा बोझ होते हैं, वे अपने इर्द-गिर्द बड़ी भीड़ इकट्ठी करते हैं, हँस-हँस कर अपनी झूठी ख़ुशी का प्रदर्शन करते हैं और बोझ को प्रवचन की शक्ल में उतारते हैं. दिल के बोझ दूसरों को उपदेश देने लायक तो बना ही देते हैं. जो हमने किया, तुम वह न करो. जो हम कहते हैं, तुम वह करो. हमारे बताए मार्ग पर चलो. जितने इस तरह के ज्ञानी हैं, वे सब अपने अतीत में अपने अज्ञान के कारण भटके हुए होते हैं, उस भटकन से निकल कर ही वे इस काबिल बनते हैं कि दूसरों को न भटकने या भटकन से बाहर निकलने का गुर बता सकें। बिना गलती किए कोई संत-ज्ञानी नहीं बनता। हमारी गलतियाँ, हमारी बेवकूफ़ियां किताबों से ज़्यादा बड़ा ज्ञान हमें सिखाती हैं.


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