Monday, 23 March 2015

स्कूलों की भूमिका

स्कूलों की भूमिका

एक अध्यापक के आग्रह पर लिखी निम्नलिखित टिप्पणी शायद आपको पढ़ने योग्य लगे। वे जानना चाहते थे कि मैं अपने अनुभव से बताऊँ कि यदि कोई स्कूल-छात्र लेखक बनना चाहे तो स्कूल को क्या सहयोग करना चाहिए?
मुझमे लिखने की आदत विकसित करने में, मुझे नहीं याद कि स्कूल की क्या भूमिका रही? स्कूल में स्कूली पढ़ाई की ओर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, किसी को लेखक बनाने के इरादे से स्कूलों में ध्यान नहीं दिया जाता। लेखक स्वतः बनते हैं. मेरे विचार में स्कूल में बच्चा या बच्ची 16-17 वर्ष की आयु तक होते हैं, उस समय यदि किसी बच्चे में लिखने का शौक स्वतः जन्म ले तो ठीक है. स्कूल उस दौरान उन्हें अच्छी पुस्तकें उपलब्ध करा सकता है, उन्हें उन पुस्तकों को पढ़ने का महत्व बता सकता है, अच्छे लेखकों के नाम से परिचय करवा सकता है, तथा कुछ कालजयी पुस्तकें पढ़ने के लिए उनमें चेतना जगा सकता है. इससे बच्चों में भाषा-शैली एवं शिल्प के प्रति जागरूकता पैदा होगी जो आगे जाकर, यदि वे लेखक बने तो उन्हें मददगार साबित होगी. 
बच्चों में रचनात्मकता कई तरह की हो सकती है, ज़रूरी नहीं कि वे लेखन के क्षेत्र में ही हो. बच्चों में रचनात्मकता के विकास के लिए उन्हें सही वातावरण दिया जाना चाहे, वे जिस दिशा में आगे बढ़ना चाहें, उन्हें उस दिशा में आगे बढ़ने के पूरे अवसर दिए जाएं। स्कूल के स्तर तक बच्चे निर्णय नहीं कर पाते कि उन्हें अपने भविष्य के लिए कौन सी दिशा चुननी है, इसलिए उनके सम्मुख एक से अधिक रास्ते खुले रखने चाहिए, ताकि वे एक से अधिक क्षेत्रों में अपने शौक के पनपने की गुंजाइश देख सकें। फिर जिस क्षेत्र में वे टिकना चाहेंगे, उसमें टिक जाएंगे।
लेखन-कार्यशालाएँ विद्यार्थी का बहुमुखी विकास करने में उपयोगी हो सकती हैं. लेखन-कार्यशालाओं में कहानी-कविता का पाठ करने की कला व नाटक में संवाद अदायगी की कला सिखाई जा सकती है, कोई विषय देकर कहानी-कविता लिखने के लिए कहा जा सकता है, किसी विषय पर निबंध लिखवाया जा सकता है, किसी विद्वतजन को बुला कर उनके विचार सुनवाए जा सकते हैं, किसी लेखक या अन्य कलाकार से बच्चों की बातचीत करवाई जा सकती है, बच्चों को अपनी कल्पना से कुछ लिखने के लिए कहा जा सकता है. कई तरह से उनमें लेखन या किसी अन्य कला के प्रति रुचि पैदा करने की ओर ध्यान दिया जा सकता है.लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इन कार्यशालाओं में सक्रिय भाग लेकर कोई लेखक बन ही जाए. स्कूल की उम्र तक बच्चों में इतनी परिपक्वता नहीं आती कि वे चुनाव कर सकें या जो चुना है, उसी पर स्थिर रह सकें

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