Friday, 6 March 2015

Women's day special : 1

Women's day special : 1

यह महिला दिवस उन औरतों के नाम, जो औरत होने के बावजूद पूर्ण औरत होने के लिए तरस रही हैं. यह उन औरतों के दर्द की कहानी है, जो पुरुष-शरीर में कैद हैं, यानि Transgender हैं यानि जिन्हें आम भाषा में हिजड़ा कहते हैं. ऐसी ही एक औरत की डायरी के कुछ पन्ने.

मेरा जन्म आज से 35 वर्ष पूर्व एक लड़के के रूप में हुआ था. मेरा शरीर लड़कों के जैसा था. लेकिन मैं बचपन से लड़कियों की तरह रहती थी. मुझे अपनी बहनों की तरह कपडे पहनना, गुड़ियों से खेलना अच्छा लगता। शुरू-शुरू में मेरी माँ को भी इसमें कुछ गलत नहीं लगा. लेकिन 13-14 वर्ष की होने पर भी जब मेरी ज़िद अपनी बहनों की तरह सजने-सँवरने की रही तथा मेरे हावभाव, मेरा बोलना, चलना, हँसना, शक्ल-सूरत में भी लड़की जैसी छवि दिखने लगी तो मेरे माता-पिता को चिता हुई. मैं स्कूल में होने वाले नृत्य के कार्यक्रमों में लड़की की तरह सज कर नृत्य करती, नाटक में लड़की के किरदार निभाती, मेरे हर अंदाज़ स्त्रियोचित होते। धीरे-धीरे मैं बड़ी हो रही थी, मैं सहज रूप से लड़कों की ओर आकर्षित होती, मुझे सब लड़कियाँ अपनी बहनों जैसी लगतीं। अनायास मैंने महसूस किया कि लोग मुझे देख कर हँसते हैं, मुझे विचित्र नामों से पुकारते हैं, छक्का, हिजड़ा, नामर्द। मेरा मन हुआ, मैं आत्महत्या कर लूँ. चिल्ला-चिल्ला कर कहूँ कि मैं लड़की हूँ, देखो, मैं लड़कियों की तरह चलती हूँ, लड़कियों की तरह बोलती हूँ, लड़कियों की तरह हँसती हूँ, और सुन्दर भी तो कितनी हूँ लड़कियों की तरह. लेकिन मेरी कौन सुनता। खुद मेरे पिता ने मेरी एक नहीं सुनी। वैसे भी, लोगों को बेटे का मोह होता है, वे अपना बेटा कैसे खोते? उन्होंने मुझे रास्ते पर लाने के लिए एक रास्ता निकाला। उनका ख्याल था, शायद मैं उनके निकाले रास्ते से 'सुधर' जाऊँ। मैं उन्हें यह बात मनवा नहीं पाई कि पप्पा, मैं बिगड़ी हुई कहाँ हूँ? मैं तो आप की ही पैदा की हुई औलाद हूँ. मैं जैसी भी हूँ, उसमें मेरा क्या कसूर? मैंने खुद को ऐसा नहीं बनाया। मैं जैसी भी हूँ, वैसी बनी-बनाई पैदा हुई हूँ. Transgender पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते। लेकिन पप्पा कहाँ सुनने वाले थे. उनके विचार में मुझ पर एक 'खब्त' सवार था जो मेरा विवाह कर देने से उतर जाएगा। और ज़बरदस्ती मेरा विवाह कर दिया गया मात्र 23 वर्ष की आयु में. मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं कि मैं उस लड़की को, जो मेरी पत्नी नाम से जानी गई,  सुख यानि शारीरिक सुख नहीं दे पाई. जल्दी ही वह मेरी कमज़ोरी को जान गई. लगभग सवा साल बाद मेरे पिता का स्वर्गवास हुआ, उसके बाद मैंने अपनी तथाकथित पत्नी से तलाक लेकर उसका विवाह अन्यत्र करवाया। वह मुझसे बहुत प्रसन्न है और मुझे अपनी प्रिय सखी मानती है.

वस्तुतः मेरा दर्द मेरी बड़ी बहन ने समझा। उसने साफ़ शब्दों में मुझे समझाया, 'नामर्द कहलाने से बेहतर है कि साडी और चूड़ियाँ पहन कर एक इज़्ज़तदार स्त्री का जीवन जीओ.' और तब से मैं खुलेआम एक लड़की का जीवन जी रही हूँ, एक संभ्रांत परिवार की पढ़ी-लिखी, सुन्दर-सुशील, नृत्यांगना, नृत्य-शिक्षिका और बहुत सी सहेलियों की चहेती। मेरा नाम कुछ भी रख लीजिए, मैं आप सब में से ही हूँ.

(क्रमशः। जल्दी ही इसका अगला अंश पोस्ट करूँगी।)

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