Wednesday, 29 April 2015

डायरी लेखन

डायरी लेखन

डायरी लेखन भी साहित्य की एक विधा है, यद्यपि इसमें शिल्प का अधिक महत्व् नहीं है, महत्व है लिखने वाले के तत्कालीन भावों का, विचारों का. महापुरुषों की डायरियों की अपनी विशिष्टता होती है, जिनसे उनके समय की स्थितियों को जाना जा सकता है. डायरी केवल तथ्यों का लेखा-जोखा नहीं होता कि आज हमने यह किया, आज हमने वह किया, बल्कि लिखने वाला अपने मन में चल रहे ऊहापोह को, अपने मानसिक-वैचारिक संघर्ष को शब्दों में उतारता है. व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसा व्यक्तिगत भी होता है, जिसे वह किसी को बता नहीं सकता लेकिन उससे उसके मन में जो कुलबुलाहट रहती है, उसके कारण वह अपने मन की भड़ास निकाले बिना भी नहीं रह पाता, तब वह डायरी लिखने का सहारा लेता है, अतः डायरी में व्यक्ति के नितान्त निजी पलों के अहसास की कहानी लिखी होती है. जब डायरी लिखी जाती है, उस समय उसे उजागर नहीं किया जाता, अन्यथा डायरी लिखने का उद्देश्य ही ख़त्म हो जाएगा। लेकिन क्या डायरी का सार्वकालिक महत्व है? मेरे ख्याल से, शायद नहीं। बहुत संभव है कि अतीत में जो हमारे विचार थे, जो हमारी सोच थी, वह आज वर्तमान में न हो. अतीत में हमने जो अनुभव किया, हो सकता है कि वर्तमान में उस अनुभव से प्राप्ज्ञान आज बेमानी हो. इसलिए डायरी केवल काल-सापेक्ष्य होती है.

Saturday, 25 April 2015

यह कैसा प्यार Kavita 232

यह कैसा प्यार

दिया तो सचमुच भर-भर दिया
समेटा तो कण-कण समेट लिया।

बैठाया तो सर-आँखों पर बैठाया
गिराया तो नज़रों से गिरा दिया।

रिझाया तो चापलूसी से रिझाया
रुलाया तो हिचकियों में रुलाया।

कहाँ यूँ दिलफरेबी चाल चली
कहाँ यूँ दिलफ़रेबी घात किया।

मैंने जो तुम पे ऐतबार किया
क्यों सरेआम शर्मसार किया।

किया प्यार तो यह कैसा किया
किया वार तो पीछे से किया।


Thursday, 23 April 2015

कविता रीमिक्स 1

कविता रीमिक्स 1

लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल
लाली देखन मैं गईं, मैं भी हो गई लाल.

किसी के रंग में क्या रँगे
गहराया इतना कि उतारे न उतरे
दुश्वारी यह
कि हमारा अपना रंग छुप गया।

Monday, 20 April 2015

एसिड पीड़िता सोनाली मुखर्जी

एसिड पीड़िता सोनाली मुखर्जी

वह 22 अप्रेल, 2003 की एक भयावह रात थी, जब अपने घर के टेरेस पर सो रही 18 वर्षीय सोनाली मुखर्जी पर एसिड डाल कर उनसे न जाने कौन से जन्म का बदला उनके दुश्मनों ने लिया था. उनके पिछले 12 वर्ष चिकित्सकीय उपचारों और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने में बीते। बहुत जद्दोजहद के बाद उन्हें सन 2012 में सरकारी नौकरी भी मिली। लेकिन उनकी शक्लो-सूरत जो एक बार बिगड़ी, वह फिर से अपने सही रूपाकार में नहीं आ सकी. एक कहावत है, 12 साल बाद घूरे के भी दिन बदलते हैं, यह कहावत सोनाली मुखर्जी पर शत-प्रतिशत सही उतरी। इसे आप चमत्कार भी कह सकते हैं कि जिसकी कभी सोनाली या उनके घर-परिवारवालों ने कल्पना भी नहीं की होगी, उनके जीवन में वह सुखद दिन आ गया, जब एसिड हमले की इस पीड़िता सोनाली मुखर्जी का विवाह इस 16 अप्रेल को उड़ीसा में कार्यरत इलेक्ट्रिकल इंजिनियर चितरंजन तिवारी के साथ सम्पन्न हुआ. संघर्षशील और जिजीविषा से भरपूर सोनाली के बारे में जब चितरंजन तिवारी को मीडिया से पता चला, तो उन्होंने उनसे सोशल नेटवर्क फेसबुक पर संपर्क किया। कुछ दिनों की बातचीत में ही दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया और अपनी मित्रता को एक रिश्ते का नाम देने का शुभ संकल्प लिया, और 16 अप्रेल को वे विवाह-सूत्र में बँध गए. सन 2012 में सोनाली टीवी शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में भी भाग लेकर सुर्ख़ियों में आई थीं. उनके मन में जीने की अदम्य लालसा थी और मुश्किलों से मुकाबला करने का माद्दा। सोनाली के जैसे हालातों में उन्हें जीवन साथी मिलना मानों उन्हें भगवान की ओर से मिला विजय-पुरस्कार है, भगवान का आशीर्वाद है, उनके किसी पुण्य का प्रसाद है. उनके सुखी गृहस्थ जीवन के लिए हम सब की दुआएँ उनके साथ हैं.



छोटी कविता 21

छोटी कविता 21

तुम्हारे प्यार में ऐसे भीगे
कि अब तक सूखे नहीं।
तुम्हारे प्यार की नमी को
सोखने के लिए
बार-बार दिल को जलाया
लेकिन हर बार अपने को
और भीगा हुआ पाया।

Saturday, 18 April 2015

Kishor Biyani

Kishor Biyani

पता नहीं क्यों लोग पैसे वालों से जलते हैं? पैसा कोई पेड़ पर नहीं उगता, मेहनत से कमाया जाता है. टाटा, बिरला, अम्बानी, अंसल, जितने भी अमीर हैं, अपनी बुद्धि और मेहनत के बल पर अमीर बने हैं. धीरूभाई अम्बानी को बपौती में दौलत नहीं मिली थी, उनके पिता मामूली अध्यापक थे, धीरूभाई ने अपनी मेहनत से बहुत कम समय में एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। ऐसे ही अंसल साम्राज्य खड़ा हुआ. रतन टाटा  मिसाल बन गए, जिनकी बातें कोटेशन्स के रूप में कही जाती हैं. एक नए हैं Future Group (Big Bazar) के किशोर बियानी, जिन्होंने एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म लिया, जो मुंबई की छोटी दुकानों में कपड़ा सप्लाई करने का काम किया करते थे, अब Pantaloons, Big Bazaar, Food Bazaar, Home Town जैसे नामों के साथ रिटेल बिज़नेस को पुनर्परिभाषित करके हर प्रकार के व्यापार में अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक IT HAPPENED IN INDIA में अपनी Rags to Riches की कहानी लिखी है तथा व्यवसाय करने के गुर भी बताए हैं. मैंने यह पुस्तक पढ़ी है, अपना काम यानि व्यवसाय करने वालों को प्रेरित करती है. इस पुस्तक में मुख्य बात यह है कि बुद्धि, परिश्रम, एवम कल्पनाशीलता से किसी भी काम में विजय हासिल की जा सकती है. सच में पैसों के पेड़ लगाए जा सकते हैं. और फिर, पैसे का लाभ केवल सम्बंधित व्यक्ति या उसका परिवार ही नहीं उठाता, उसके कारण अनेक बेरोज़गार लोगों को नौकरी मिलती है, अनेक घरेलु और छोटे-मोटे काम करने वाले लोग बेहतर जीवन जीते हैं, देश की अर्थ-व्यवस्था में सुधार आता है. बहुत से लोग अमीरों का पैसा मुफ्त में पाना चाहते हैं, इस तर्क पर कि उन्हें ग़रीबों का ख्याल रखना चाहिए। मैंने खुद ऐसे कामचोर कर्मचारी देखे हैं जो काम किए बिना मुफ्त का खाना चाहते हैं. खुद काम करेंगे नहीं, और अमीरों से जलेंगे। मैंने कई भिखारियों को, जो सिग्नल पर मिल जाते हैं, कहा है कि चलो, कार में बैठो, तुम्हें नौकरी देती हूँ, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ. भिखारियों की बात न भी करें तो भी मैंने अनेक ऐसे लोग देखे हैं, जिनके आगे काम करने के, मेहनत करने के विकल्प थे लेकिन उन्होंने नहीं की और अमीरों को कोसते रहे. तो जो गरीब हैं, उनकी गरीबी का कारण अमीर लोग नहीं, उनका अपना आलसीपन और निकम्मापन है. अमीर किसी को गरीब नहीं बनाते बल्कि गरीबों की गरीबी को कम करते हैं.


Thursday, 16 April 2015

एक उदास कविता Kavita 231

एक उदास कविता

अजी अब किसकी राह
और किसकी परवाह
मज़े में गुज़ारो दिन।

अजी अब क्या संवरेंगे
और क्या चमकेंगे
धूल-धूसरित हो गए ये दिन।

अजी अब क्या आशाएँ
और क्या सपने
रफ़ा-दफा हुए पुराने दिन।

अजी अब काहे की ख़ुशी
और काहे का ग़म
एकरस हो गए सारे दिन।

अजी अब क्या हम आबाद
और क्या हम बरबाद
जो बीत जाए सो बीत जाए दिन।

अजी अब काहे का हिसाब-किताब
और काहे का जोड़-घटा
गिनने को बचा ही क्या सिवाय दिन।

Tuesday, 14 April 2015

आखिर बच्चों के दिमाग में ये बातें कहाँ से आती हैं?

आखिर बच्चों के दिमाग में ये बातें कहाँ से आती हैं?

मनु इस वर्ष 12 वीं को बोर्ड परीक्षा दे रही है, 2 पेपर्स अभी रहते हैं, 20 अप्रेल को ख़त्म होंगे। उसकी कई सहेलियों का चुनाव यू एस में पढ़ाई के लिए हो चुका है. बता रही थी, 'अमेरिका में ऐडमिशन के लिए जो प्रवेश-परीक्षा होती है, उसमे सिर्फ सब्जेक्ट्स में नंबर नहीं देखे जाते, छात्र को सम्पूर्ण रूप से परखा जाता है, सोशल वर्क, एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज आदि.' इसकी 7-8 अभिन्न मित्र अमेरिका जा रही हैं. उनका ऐडमिशन हो चुका है, यह आगे की पढ़ाई Clinical Psychology में करना चाहती है, फिलहाल यहीं पढ़ेगी, पोस्ट ग्रेजुएशन करने अमेरिका जाएगी। मुझे बता रही थी, 'पोस्ट ग्रेजुएशन तो बाहर से करना ही पड़ेगा, पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री तो बाहर की होनी ही चाहिए।' मैंने पूछा, 'क्यों?' तो बोली, 'यहाँ की पढ़ाई का फायदा नहीं है.' विचित्र बात है. ज़रूर माँ-बाप ने इसके दिमाग में यह बात डाली होगी. मेरा पुत्र भी कह रहा था, दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेजेगा। मनु मुझसे बात कर रही थी, कि तभी उसकी किसी सखी का फोन आ गया, देर तक बात करती रही, मैंने इशारे से कहा, 'फोन बंद कर, कह दे, कल बात करूँगी।' तो मनु ने इशारे से बताया कि 'वह फोन पर रो रही है, अभी बंद नहीं कर सकती।' खैर, फोन बंद होने के बाद मनु ने बताया कि उस सखी के पास मेडिकल सब्जेक्ट्स थे, वह डॉक्टर बनना चाहती है, लेकिन आगे की पढ़ाई यू एस में करना चाहती है, घर में कोई मान नहीं रहा, कोई बाहर भेजना नहीं चाहता। वह कह रही है, उसे बाहर जाना ही जाना है. मनु  ने उससे कहा, 'तू अपने पैरेंट्स से बात कर.' मैंने सोचा, जब घर में बाहर भेजने की कभी बात नहीं हुई, कभी उसे इस बात के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया तो वह बाहर जाने के लिए इतनी लालायित क्यों हैं? यह तो स्कूल की संगत का ही असर हुआ. मैंने मनु से कहा, 'उससे कह, यहाँ इतने मेडिकल कॉलेज हैं, यहाँ पढ़ कर भी तो वह डॉक्टर बन सकती है.' मनु बोली, 'अरे अम्मा, यू एस की पढ़ाई का यहाँ से मुकाबला करेंगी आप? यहाँ क्या रखा है? हमारा फ़्यूचर यहाँ नहीं है.' हैं? मैं अपनी पोती के मुँह से यह सुन कर हैरान रह गई कि यहाँ क्या रखा है? आखिर ये बच्चियाँ बाहर विदेश में अपना भविष्य क्यों देख रही हैं? मैंने पूछा, 'तो अब तुम्हारी सखी क्या करेगी? उसके पैरेंट्स ने बाहर नहीं भेजा तो?' वह बोली, 'करना क्या है? रो-रो कर यहीं पढ़ेगी। कई पैरेंट्स भी ना…… बच्चों के मन को समझते नहीं हैं.' मैं चकित थी, यह नई पीढ़ी, एकदम ताज़ा पीढ़ी अपना भविष्य अपने देश में क्यों नहीं देख रही? किसने इनके दिमाग में यह बात डाली? हमारे इर्द-गिर्द सब ठीक है, सब मज़े में रह रहे हैं, फिर इन सत्रह-अट्ठारह साल के बच्चों को क्यों लग रहा है कि इनका फ्यूचर यहाँ नहीं है? यदि स्कूल में बच्चे आपस में भी इस तरह की बातें सीखते हैं तो कहीं से तो ये बातें आती होंगी? पर कहाँ से?

Sunday, 12 April 2015

ब्लड टेस्ट

ब्लड टेस्ट

मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही, वह यह कि ब्लड टेस्ट करने के लिए ब्लड निकालते वक़्त मेरी किसी वेन (नस) में खून नहीं मिलता, आठ साल पहले हुई कीमोथेरेपी और रेडिओथेरेपी के बाद जैसे सारा खून जल गया है लेकिन उस दिन जो इतना खून निकला, वह कैसे निकला? अब आप हमदर्दी न दिखायेगा। मैं जानती हूँ कि आप सब मुझसे बेहद प्यार करते हैं, मैं सिर्फ अपनी इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए यह बात अब ठीक होने के बाद पूछ रही हूँ कि जब हाथ की नसों में खून नहीं मिलता तो चोट लगने पर इतना खून कहाँ से निकलता है? याद है ना, मेरी कार का ऐक्सिडेंट, जब मैंने कहा था कि मुझे कोई चोट नहीं लगी? तब मेरा चेहरा बिगड़ गया था, होंठ बुरी तरह कट गया था, उसमें ग्यारह स्टिचेज़ (टाँके) आए थे जो सेल्फ डिज़ॉल्व होकर अब ठीक हो गए हैं. उस समय चोट की तकलीफ से अधिक यह तकलीफ कि हाय राम ! मैं तो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रही. क्या तो खून निकला, मेरा सारा दुपट्टा खून से लथपथ। खुदा का शुक्र था कि इंजेक्शन और स्टिचेज़ लगने में ज़रा भी महसूस नहीं हुआ. तो जब अंदर इतना खून होता है तो टेस्ट किए जाने के लिए क्यों नहीं मिलता? यह बात भी अजब-गजब है. प्लीज़, च्च च्च न करें, मैं पूर्ण स्वस्थ-मंगल हूँ. बस एक नुकसान हुआ है, मेरे हाथ से कार तो नहीं छिनी, हाँ, एक ड्राइवर थमा दिया गया है.

Saturday, 11 April 2015

हिन्दी के बहाने से

हिन्दी के बहाने से

यह सही है कि उर्दू हमारे लिए पढ़ने और लिखने की भाषा नहीं है लेकिन बोलने में उर्दू मिश्रित हिन्दी होती है यानि जिसे हिन्दुस्तानी भाषा कह सकते हैं। भारत के आज़ाद होने से पूर्व लोग उर्दू ही लिखते-पढ़ते थे. पहले के कुछ लोग आज भी देखे जा सकते हैं जो उर्दू लिपि ही जानते थे, हिन्दी देवनागरी लिपि नहीं। उस समय उर्दू और अंग्रेजी, यही दो भाषाएँ चलती थीं। मैंने बचपन में घर के बुजुर्गों को इन्हीं दो भाषाओँ में काम करते देखा-सुना था जो आज़ादी मिलने के बाद भी तुरन्त हिन्दी से परिचित नहीं हुए। उचित भी था, अंग्रेज़-शासित देश तथा उससे पहले मुग़ल साम्राज्य के होते यह स्वाभाविक भी था। इसीलिए इस देश का नाम भी हिन्दुस्तान और इंडिया (India) था, भारत नाम बाद में आया। देश की आज़ादी के बाद देश की कोई एक भाषा तो होनी ही थी, जिसे अपनी भाषा कहा जा सके, तो वह हिन्दी हुई, जो आज़ादी के बाद प्रचलन में आई और उर्दू ने दूसरी भाषा का दर्जा हासिल किया। देश के दो हिस्से होने के बाद पाकिस्तान बने दूसरे हिस्से की भाषा उर्दू है. मुझे मालूम नहीं कि वहाँ हिन्दी भाषा को, देवनागरी लिपि को कोई दर्जा दिया गया है या नहीं। लेकिन हमारे देश भारत में चाहे हम उर्दू लिपि को पढ़ना-लिखना नहीं जानते, चाहे हिन्दी भाषा मुख्य धारा में है, फिर भी उर्दू का सम्मान है. हमारी भाषा हिन्दी आज भी उर्दू के अनेक शब्दों से मिश्रित भाषा है. लेकिन हम पूर्ण रूप से अपनी भाषा के प्रति ही समर्पित हो सकते हैं.

हमारे देश में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ के प्रभाव हिन्दी भाषा पर पड़े, इसलिए हिन्दी में उच्चारण और व्याकरण की विभिन्नता दृष्टिगत होती है. यह सच है कि उर्दू भाषा जैसी नफासत और तहज़ीब हिन्दी में नहीं है. यदि हिन्दी भाषी अपने बोलने में उर्दू भाषा का पुट ले आएँ तो हिन्दी अधिक सभ्य लगेगी। जहाँ उर्दू के मिश्रण से हिन्दी समृद्ध हुई, वहीँ हिन्दी में पंजाबी भाषा के प्रभाव से गड़बड़ हुई है, कि 'आप आइए, आप जाइए' हो गया 'आप आओ, आप जाओ'. 'आप' के साथ 'तुम' में लगने वाली क्रिया का प्रयोग 'आप' की गरिमा को घटा देता है. ऐसे ही दक्षिण तथा पश्चिम भारत की भाषाओं के प्रभाव से हिन्दी भाषा का लिंग गड़बड़ा जाता है, जिसके कारण ज़्यादातर पुल्लिंग हो जाते हैं स्त्रीलिंग। अंग्रेजी भाषा के शब्द ज़रूर हिन्दी में समाहित हुए हैं लेकिन अंग्रेजी के कारण हिन्दी के व्याकरण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है. हिन्दी मूलतः उत्तर प्रदेश से उपजी और खड़ी बोली के नाम से जानी गई, इसी कारण इस खड़ी बोली में खरापन और स्पष्टता है. अब यदि अपने ही देश की अन्य भाषाओँ के कारण हिन्दी में उच्चारण और लिंग सम्बन्धी विकार पैदा हो गए हैं तो उसके लिए कुछ किया नहीं जा सकता, सिवाय इसे विवशता मान कर स्वीकारने के.

Friday, 10 April 2015

याचना Kavita 230

याचना

मेरी आँखों की रोशनी कम होने लगे तो तू वह रोशनी बन
मेरे चलने में लड़खड़ाहट होने लगे तो तू मेरे हाथ की लाठी बन
मेरी श्रवण शक्ति क्षीण होने लगे तो तू बोलती हुई मुस्कान बन
मेरे जीने का उत्साह कम होने लगे तो तू रोचक कहानी बन.
मेरे पुत्र !
उम्र के साथ मन याचक हो उठा है
पहले तू मेरी शरण में था
अब मैं तेरी शरण में हूँ.


Thursday, 2 April 2015

27. एक भावचित्र : अनसुलझे प्रश्न

27. एक भावचित्र : अनसुलझे प्रश्न

अत्यंत मानसिक पीड़ा में गुज़रे मेरे पिछले दो वर्ष, जब मैं ज्योतिषियों को खोज-खोज कर उनकी शरण में गई और चाहा कि कोई तो, कोई तो मुझे बता दे कि मेरे साथ जो हुआ, वह क्यों हुआ? मैं जानना चाहती थी कि मेरे भाग्य की रेखाएँ इतनी उल्टी चाल क्यों चलीं कि इतना अप्रत्याशित, अकल्पित, अवांछित घट गया मेरे साथ? मुझे भविष्य के बारे में नहीं जानना था. भविष्य किसने देखा है? मुझे अपने वर्तमान को समझना था. यूँ अप्रत्याशित, अकल्पित मेरे साथ बहुत बार घटा है, लेकिन वह अवांछित नहीं था, उसकी वांछा चाहे न की हो लेकिन मधुर होने के कारण वह सहज स्वीकार्य था. लेकिन अब जो घटा, वह मधुर होने के बावजूद इतनी कड़वाहट जीवन में भर गया कि मुश्किल से उस ग़म को दिल से हटा पाई हूँ. लेकिन जो ग़म अभी भी स्मृति में जीवित है, शब्दों में वाचाल है, क्या वह वाकई दिल से हट गया है? शायद नहीं। बस इतना सा हुआ है कि वह ग़म अब जीने में रुकावट नहीं बन रहा. हाँ, यह सच है कि ख़ुशी चाहे जीवन को आगे नहीं बढ़ाती लेकिन ग़म जीवन की गति को रोक देता है. हम खुद ही चलना नहीं चाहते। लौट-लौट के अपने ग़म के साये में जाते हैं. हम ग़म से जितनी मुक्ति की कामना करते हैं, उतना ही ग़म हमें अपने से बाँधता जाता है. एक असुरक्षा का घेरा हमें चारों ओर से जकड लेता है. आसान नहीं उस घेरे से निकलना। लेकिन निकलना पड़ता है. आखिर जीना जो है. केवल प्रलाप करते हुए तो जीवन नहीं जिया जा सकता। लेकिन प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। प्रश्न बहुत हैं, लेकिन कोई इतना ही बता दे कि जो कुछ भी किसी के साथ होता है, वह क्यों होता है?


कैलाश वाजपेयी

कैलाश वाजपेयी

उस समय मैं छोटी थी और मुझसे भी छोटी थी 'वह', युवा लेखिका, जिसके सभी लेखक मित्र उससे बहुत बड़ी उम्र के थे, तब उसने एक बात कही थी, शायद बचपने में, कि, 'ओह, मैं अपने सब मित्रों की मौत देखूँगी।' आज उसने कैलाश वाजपेयी की मौत भी देख ली. कैलाश वाजपेयी जी को मैं भी बहुत अच्छी तरह जानती थी और ज़ाहिर है, समानधर्मी होने के कारण अनेक बार उनसे मिली भी थी, लेकिन यह बात मुझे 'उसी' से पता चली थी कि कैलाश वाजपेयी जी एक विद्वान ज्योतिषविद भी थे. 'उस' के अनुसार वे इतना सही बताते थे कि हर कदम उनकी सलाह से उठाया जाए तो बेहतर हो. तब मैंने 'उस' से कहा कि मुझे कैलाश जी से मिलना है. लेकिन मिलना चाहते हुए भी मैं उनसे नहीं मिल पाई. और आज उनके निधन का समाचार मिला। 79 वर्ष की आयु में हार्ट अटैक से कल उनकी मृत्यु हुई. फेसबुक और अखबार से यह शोक-सन्देश मुझ तक पहुँचा लेकिन शायद किसी को नहीं पता था कि वे कवि, शिक्षाविद होने के साथ-साथ एक महान ज्योतिषाचार्य भी थे. कैलाश वाजपेयी जी, आपको मेरा शत-शत नमन.