Thursday, 2 April 2015

27. एक भावचित्र : अनसुलझे प्रश्न

27. एक भावचित्र : अनसुलझे प्रश्न

अत्यंत मानसिक पीड़ा में गुज़रे मेरे पिछले दो वर्ष, जब मैं ज्योतिषियों को खोज-खोज कर उनकी शरण में गई और चाहा कि कोई तो, कोई तो मुझे बता दे कि मेरे साथ जो हुआ, वह क्यों हुआ? मैं जानना चाहती थी कि मेरे भाग्य की रेखाएँ इतनी उल्टी चाल क्यों चलीं कि इतना अप्रत्याशित, अकल्पित, अवांछित घट गया मेरे साथ? मुझे भविष्य के बारे में नहीं जानना था. भविष्य किसने देखा है? मुझे अपने वर्तमान को समझना था. यूँ अप्रत्याशित, अकल्पित मेरे साथ बहुत बार घटा है, लेकिन वह अवांछित नहीं था, उसकी वांछा चाहे न की हो लेकिन मधुर होने के कारण वह सहज स्वीकार्य था. लेकिन अब जो घटा, वह मधुर होने के बावजूद इतनी कड़वाहट जीवन में भर गया कि मुश्किल से उस ग़म को दिल से हटा पाई हूँ. लेकिन जो ग़म अभी भी स्मृति में जीवित है, शब्दों में वाचाल है, क्या वह वाकई दिल से हट गया है? शायद नहीं। बस इतना सा हुआ है कि वह ग़म अब जीने में रुकावट नहीं बन रहा. हाँ, यह सच है कि ख़ुशी चाहे जीवन को आगे नहीं बढ़ाती लेकिन ग़म जीवन की गति को रोक देता है. हम खुद ही चलना नहीं चाहते। लौट-लौट के अपने ग़म के साये में जाते हैं. हम ग़म से जितनी मुक्ति की कामना करते हैं, उतना ही ग़म हमें अपने से बाँधता जाता है. एक असुरक्षा का घेरा हमें चारों ओर से जकड लेता है. आसान नहीं उस घेरे से निकलना। लेकिन निकलना पड़ता है. आखिर जीना जो है. केवल प्रलाप करते हुए तो जीवन नहीं जिया जा सकता। लेकिन प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। प्रश्न बहुत हैं, लेकिन कोई इतना ही बता दे कि जो कुछ भी किसी के साथ होता है, वह क्यों होता है?


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