Saturday, 11 April 2015

हिन्दी के बहाने से

हिन्दी के बहाने से

यह सही है कि उर्दू हमारे लिए पढ़ने और लिखने की भाषा नहीं है लेकिन बोलने में उर्दू मिश्रित हिन्दी होती है यानि जिसे हिन्दुस्तानी भाषा कह सकते हैं। भारत के आज़ाद होने से पूर्व लोग उर्दू ही लिखते-पढ़ते थे. पहले के कुछ लोग आज भी देखे जा सकते हैं जो उर्दू लिपि ही जानते थे, हिन्दी देवनागरी लिपि नहीं। उस समय उर्दू और अंग्रेजी, यही दो भाषाएँ चलती थीं। मैंने बचपन में घर के बुजुर्गों को इन्हीं दो भाषाओँ में काम करते देखा-सुना था जो आज़ादी मिलने के बाद भी तुरन्त हिन्दी से परिचित नहीं हुए। उचित भी था, अंग्रेज़-शासित देश तथा उससे पहले मुग़ल साम्राज्य के होते यह स्वाभाविक भी था। इसीलिए इस देश का नाम भी हिन्दुस्तान और इंडिया (India) था, भारत नाम बाद में आया। देश की आज़ादी के बाद देश की कोई एक भाषा तो होनी ही थी, जिसे अपनी भाषा कहा जा सके, तो वह हिन्दी हुई, जो आज़ादी के बाद प्रचलन में आई और उर्दू ने दूसरी भाषा का दर्जा हासिल किया। देश के दो हिस्से होने के बाद पाकिस्तान बने दूसरे हिस्से की भाषा उर्दू है. मुझे मालूम नहीं कि वहाँ हिन्दी भाषा को, देवनागरी लिपि को कोई दर्जा दिया गया है या नहीं। लेकिन हमारे देश भारत में चाहे हम उर्दू लिपि को पढ़ना-लिखना नहीं जानते, चाहे हिन्दी भाषा मुख्य धारा में है, फिर भी उर्दू का सम्मान है. हमारी भाषा हिन्दी आज भी उर्दू के अनेक शब्दों से मिश्रित भाषा है. लेकिन हम पूर्ण रूप से अपनी भाषा के प्रति ही समर्पित हो सकते हैं.

हमारे देश में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ के प्रभाव हिन्दी भाषा पर पड़े, इसलिए हिन्दी में उच्चारण और व्याकरण की विभिन्नता दृष्टिगत होती है. यह सच है कि उर्दू भाषा जैसी नफासत और तहज़ीब हिन्दी में नहीं है. यदि हिन्दी भाषी अपने बोलने में उर्दू भाषा का पुट ले आएँ तो हिन्दी अधिक सभ्य लगेगी। जहाँ उर्दू के मिश्रण से हिन्दी समृद्ध हुई, वहीँ हिन्दी में पंजाबी भाषा के प्रभाव से गड़बड़ हुई है, कि 'आप आइए, आप जाइए' हो गया 'आप आओ, आप जाओ'. 'आप' के साथ 'तुम' में लगने वाली क्रिया का प्रयोग 'आप' की गरिमा को घटा देता है. ऐसे ही दक्षिण तथा पश्चिम भारत की भाषाओं के प्रभाव से हिन्दी भाषा का लिंग गड़बड़ा जाता है, जिसके कारण ज़्यादातर पुल्लिंग हो जाते हैं स्त्रीलिंग। अंग्रेजी भाषा के शब्द ज़रूर हिन्दी में समाहित हुए हैं लेकिन अंग्रेजी के कारण हिन्दी के व्याकरण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ा है. हिन्दी मूलतः उत्तर प्रदेश से उपजी और खड़ी बोली के नाम से जानी गई, इसी कारण इस खड़ी बोली में खरापन और स्पष्टता है. अब यदि अपने ही देश की अन्य भाषाओँ के कारण हिन्दी में उच्चारण और लिंग सम्बन्धी विकार पैदा हो गए हैं तो उसके लिए कुछ किया नहीं जा सकता, सिवाय इसे विवशता मान कर स्वीकारने के.

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