Tuesday, 14 April 2015

आखिर बच्चों के दिमाग में ये बातें कहाँ से आती हैं?

आखिर बच्चों के दिमाग में ये बातें कहाँ से आती हैं?

मनु इस वर्ष 12 वीं को बोर्ड परीक्षा दे रही है, 2 पेपर्स अभी रहते हैं, 20 अप्रेल को ख़त्म होंगे। उसकी कई सहेलियों का चुनाव यू एस में पढ़ाई के लिए हो चुका है. बता रही थी, 'अमेरिका में ऐडमिशन के लिए जो प्रवेश-परीक्षा होती है, उसमे सिर्फ सब्जेक्ट्स में नंबर नहीं देखे जाते, छात्र को सम्पूर्ण रूप से परखा जाता है, सोशल वर्क, एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज आदि.' इसकी 7-8 अभिन्न मित्र अमेरिका जा रही हैं. उनका ऐडमिशन हो चुका है, यह आगे की पढ़ाई Clinical Psychology में करना चाहती है, फिलहाल यहीं पढ़ेगी, पोस्ट ग्रेजुएशन करने अमेरिका जाएगी। मुझे बता रही थी, 'पोस्ट ग्रेजुएशन तो बाहर से करना ही पड़ेगा, पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री तो बाहर की होनी ही चाहिए।' मैंने पूछा, 'क्यों?' तो बोली, 'यहाँ की पढ़ाई का फायदा नहीं है.' विचित्र बात है. ज़रूर माँ-बाप ने इसके दिमाग में यह बात डाली होगी. मेरा पुत्र भी कह रहा था, दोनों बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेजेगा। मनु मुझसे बात कर रही थी, कि तभी उसकी किसी सखी का फोन आ गया, देर तक बात करती रही, मैंने इशारे से कहा, 'फोन बंद कर, कह दे, कल बात करूँगी।' तो मनु ने इशारे से बताया कि 'वह फोन पर रो रही है, अभी बंद नहीं कर सकती।' खैर, फोन बंद होने के बाद मनु ने बताया कि उस सखी के पास मेडिकल सब्जेक्ट्स थे, वह डॉक्टर बनना चाहती है, लेकिन आगे की पढ़ाई यू एस में करना चाहती है, घर में कोई मान नहीं रहा, कोई बाहर भेजना नहीं चाहता। वह कह रही है, उसे बाहर जाना ही जाना है. मनु  ने उससे कहा, 'तू अपने पैरेंट्स से बात कर.' मैंने सोचा, जब घर में बाहर भेजने की कभी बात नहीं हुई, कभी उसे इस बात के लिए प्रोत्साहित नहीं किया गया तो वह बाहर जाने के लिए इतनी लालायित क्यों हैं? यह तो स्कूल की संगत का ही असर हुआ. मैंने मनु से कहा, 'उससे कह, यहाँ इतने मेडिकल कॉलेज हैं, यहाँ पढ़ कर भी तो वह डॉक्टर बन सकती है.' मनु बोली, 'अरे अम्मा, यू एस की पढ़ाई का यहाँ से मुकाबला करेंगी आप? यहाँ क्या रखा है? हमारा फ़्यूचर यहाँ नहीं है.' हैं? मैं अपनी पोती के मुँह से यह सुन कर हैरान रह गई कि यहाँ क्या रखा है? आखिर ये बच्चियाँ बाहर विदेश में अपना भविष्य क्यों देख रही हैं? मैंने पूछा, 'तो अब तुम्हारी सखी क्या करेगी? उसके पैरेंट्स ने बाहर नहीं भेजा तो?' वह बोली, 'करना क्या है? रो-रो कर यहीं पढ़ेगी। कई पैरेंट्स भी ना…… बच्चों के मन को समझते नहीं हैं.' मैं चकित थी, यह नई पीढ़ी, एकदम ताज़ा पीढ़ी अपना भविष्य अपने देश में क्यों नहीं देख रही? किसने इनके दिमाग में यह बात डाली? हमारे इर्द-गिर्द सब ठीक है, सब मज़े में रह रहे हैं, फिर इन सत्रह-अट्ठारह साल के बच्चों को क्यों लग रहा है कि इनका फ्यूचर यहाँ नहीं है? यदि स्कूल में बच्चे आपस में भी इस तरह की बातें सीखते हैं तो कहीं से तो ये बातें आती होंगी? पर कहाँ से?

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