Wednesday, 29 April 2015

डायरी लेखन

डायरी लेखन

डायरी लेखन भी साहित्य की एक विधा है, यद्यपि इसमें शिल्प का अधिक महत्व् नहीं है, महत्व है लिखने वाले के तत्कालीन भावों का, विचारों का. महापुरुषों की डायरियों की अपनी विशिष्टता होती है, जिनसे उनके समय की स्थितियों को जाना जा सकता है. डायरी केवल तथ्यों का लेखा-जोखा नहीं होता कि आज हमने यह किया, आज हमने वह किया, बल्कि लिखने वाला अपने मन में चल रहे ऊहापोह को, अपने मानसिक-वैचारिक संघर्ष को शब्दों में उतारता है. व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसा व्यक्तिगत भी होता है, जिसे वह किसी को बता नहीं सकता लेकिन उससे उसके मन में जो कुलबुलाहट रहती है, उसके कारण वह अपने मन की भड़ास निकाले बिना भी नहीं रह पाता, तब वह डायरी लिखने का सहारा लेता है, अतः डायरी में व्यक्ति के नितान्त निजी पलों के अहसास की कहानी लिखी होती है. जब डायरी लिखी जाती है, उस समय उसे उजागर नहीं किया जाता, अन्यथा डायरी लिखने का उद्देश्य ही ख़त्म हो जाएगा। लेकिन क्या डायरी का सार्वकालिक महत्व है? मेरे ख्याल से, शायद नहीं। बहुत संभव है कि अतीत में जो हमारे विचार थे, जो हमारी सोच थी, वह आज वर्तमान में न हो. अतीत में हमने जो अनुभव किया, हो सकता है कि वर्तमान में उस अनुभव से प्राप्ज्ञान आज बेमानी हो. इसलिए डायरी केवल काल-सापेक्ष्य होती है.

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