Thursday, 16 April 2015

एक उदास कविता Kavita 231

एक उदास कविता

अजी अब किसकी राह
और किसकी परवाह
मज़े में गुज़ारो दिन।

अजी अब क्या संवरेंगे
और क्या चमकेंगे
धूल-धूसरित हो गए ये दिन।

अजी अब क्या आशाएँ
और क्या सपने
रफ़ा-दफा हुए पुराने दिन।

अजी अब काहे की ख़ुशी
और काहे का ग़म
एकरस हो गए सारे दिन।

अजी अब क्या हम आबाद
और क्या हम बरबाद
जो बीत जाए सो बीत जाए दिन।

अजी अब काहे का हिसाब-किताब
और काहे का जोड़-घटा
गिनने को बचा ही क्या सिवाय दिन।

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