Saturday, 25 April 2015

यह कैसा प्यार Kavita 232

यह कैसा प्यार

दिया तो सचमुच भर-भर दिया
समेटा तो कण-कण समेट लिया।

बैठाया तो सर-आँखों पर बैठाया
गिराया तो नज़रों से गिरा दिया।

रिझाया तो चापलूसी से रिझाया
रुलाया तो हिचकियों में रुलाया।

कहाँ यूँ दिलफरेबी चाल चली
कहाँ यूँ दिलफ़रेबी घात किया।

मैंने जो तुम पे ऐतबार किया
क्यों सरेआम शर्मसार किया।

किया प्यार तो यह कैसा किया
किया वार तो पीछे से किया।


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