Sunday, 31 May 2015

Gazal 47

Gazal 47

मैंने जो अपना तुझे समझा हुई मुझसे खता.
करूँ तो क्या करूँ अब आके मुझे तू ही बता.

मैं अपनी चंद सी खुशियों के साथ खुश हूँ बहुत
तू मुझे और भी खुश होने के सपने ना दिखा.

कभी खामोशी की सुभाषा को भी सुन लिया कर
कसमे-वादों की झूठी फ़ालतू झड़ी ना लगा.

क्यों तेरे साथ खड़ा हो के ज़माने को दिखूँ?
तू मुझे मंच पर अब बार-बार यूँ ना बुला.

मुझे बेरंग किया तूने मेरे रंग छीन कर
चिढ़ा-चिढ़ा के मुझे रंगों का उत्सव ना मना.

मैंने छोड़ा है तुझे कि तूने छोड़ा है मुझे
दोनों बातों में कोई फर्क कहाँ, यह तो बता.

कि मेरे पास बहाने बहुत हैं जीने को
तू बता, मेरे बिना कैसे जिएगा भला?


Saturday, 30 May 2015

चट्टान Kavita 235

चट्टान

चट्टान होती हैं न-टूटने के लिए।
चट्टान बनती हैं न-बिगड़ने के लिए।

सर्दी, गर्मी, बरसात
कोई भी मौसम
किसी भी चट्टान का
कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

आओ आँधियों
मुझे हिलाने की कोशिश करो।
आओ समुन्दर
मुझे डुबाने की कोशिश करो।
आओ बाहुबली
मुझे अपने अंक में भरो।
आओ जुझारू
मुझे कीचड़ में लथपथ करो।

तुम किससे जूझ रहे हो द्रोही
चट्टान चट्टान होती है
वह किसी के हिलाए
टस से मस नहीं होती।

उस पर अपना नाम नहीं लिख पाओगे
उसे किसी रंग में नहीं रँग पाओगे
उसे कुछ समझो या न समझो
पत्थर समझोगे तो ठोकर खाओगे।

मैं जब चाहूँगी
इसमें पंख लगा दूँगी
और यह हवा में उड़ने लगेगी।
मैं जब चाहूँगी
इसे पानी में बहा दूँगी
और यह सरलता से तैरने लगेगी।
मैं जब चाहूँगी
इसे फूलों से सजा दूँगी
और यह महकने लगेगी।

इसे पहचान है भावना के हाथों की
यह प्यार की छुवन को पहचानती है
इसीलिए पत्थर की है तो क्या?
कभी किसी मूरत में ढल जाती है
और आशीर्वाद के फूल बरसाती है।

Friday, 29 May 2015

Mahmud Alam

Mahmud Alam

एक सज्जन हैं Mahmud Alam (महमूद आलम). इनका कल एक मेल आया, Added you on Google. (मुझे Google  पर add करना नहीं आता. सच कहूँ तो ईमेल करने और फेसबुक करने के सिवा मुझे कंप्यूटर पर कुछ भी नहीं आता. कुछ लोग Linkedin भेजते हैं. मैं सबको Trash में डाल देती हूँ. मुझसे सिर्फ फेसबुक पर मिलें, और कहीं नहीं।) महमूद आलम ने कल दोपहर 12 बजे से रात 12 बजे तक मेरे ब्लॉग की 12 लम्बी रचनाएँ पढ़ कर बढ़िया और विस्तृत कमेंट दिए. उनके कमेंट मेरी ईमेल पर आए. मैंने 4 का उत्तर दिया, पता नहीं उन तक पहुँचा या नहीं, क्योंकि उसका कोई जवाब नहीं आया. मैं इनके धैर्य की दाद देती हूँ, जो 12 घंटे तक लगातार मेरी लेखनी को ही पढ़ते रहे. दोषरहित रोमन में इन्होने कमेंट लिखे। दिल से कह रही हूँ कि ब्लॉग पर ऐसे सहृदय पाठक मिल जाएँ तो कहीं किसी पत्रिका / पुस्तक में छपास की इच्छा ही नहीं, नेट पर ही सारी ख़ुशी मिल रही है.

Thursday, 28 May 2015

प्रार्थना

प्रार्थना

मेरी एक फास्ट फ्रेंड हुआ करती थी. उसका और मेरा ऑफिस आसपास था. उसकी आर्थिक स्थिति बहुत बढ़िया थी. मुझे ज़रूरत पड़ने पर पैसे उधार दिया करती थी. मैं लंच नहीं ले जाती तो ज़िद करके अपना लंच मुझे खिलाती थी. मैं कई बार भगवान से यह दुआ माँगती थी कि उसे बहुत पैसा दो ताकि वह मुझे ज़रूरत पड़ने पर दे सके. एक दिन अचानक मुझे ख्याल आया था कि मैं भगवान से सीधे अपने लिए क्यों नहीं माँगती? तो मुझे लगता है कि कई बार हम सीधे अपने लिए भगवान से नहीं माँगते बल्कि वह जरिया मज़बूत करने की प्रार्थना करते हैं, जिस ज़रिये से हम सुखी होते हैं. जो लोग हमारा ख्याल रखते हैं, वे हमारी प्रार्थनाओं में होते हैं. इसका अर्थ तो यही हुआ कि अच्छे लोग अवश्य और हमेशा किसी न किसी की प्रार्थनाओं में होते होंगे?



Wednesday, 27 May 2015

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

आज यूँ ही लगा कि इंसान के पास कितनी तरह के दुःख होते हैं, हर दुःख किसी एक कंधे पर सिर रख कर नहीं रोया जा सकता। हर व्यक्ति की सेंसिबिलिटी अलग होती है जो हमारे अलग-अलग मूड्स के साथ मैच करती है. यूँ ही आज मन है, अपने फेसबुक मित्रों को याद करने का. फेसबुक के अलावा इस वास्तविक संसार में मेरा बस परिवार मेरा मित्र है या मेरे कर्मचारी। परिवार में मैं बॉबी, बरखा और मनु से अपनी बात कह पाती हूँ. मनु के आगे, लगता है, दिल के सारे राज़ खोल कर रख दूँ. कर्मचारि सम्वेदनशील हैं, लेकिन उनके साथ दिल की बातें? कदापि नहीं। अपनी छोटी बहन बेबी से नियमित फ़ोन पर बात करती हूँ लेकिन उनकी सेंसिबिलिटी एकदम टिपिकल गृहस्थिनों वाली है जो मुझे सूट नहीं करती। मन की हर बात तो सम्बन्धियों से शेयर नहीं की जा सकती। मन के दुःख मित्रों से बाँटे जाते हैं. मित्र आप सब हैं लेकिन आप सब में से किसी-किसी से मैंने दुःख का कोई एकाध टुकड़ा बाँटा हो लेकिन पूरा मन किसी के आगे कभी खोल कर नहीं रखा. शायद कभी रख भी न पाऊँ। लेकिन सोच तो सकती हूँ कि किसके आगे खोल सकती हूँ?

एक दुःख मैं सुनीता दमयंती से बाँट सकती हूँ, वह बढ़िया सलाहकार है लेकिन दूसरों के पचड़ों में पड़ने से परहेज़ करती है.

उमा झुनझुनवाला से प्रेम के दर्द में मेरी सेंसिबिलिटी अत्यधिक मैच करती है, उनका ह्रदय बेहद सम्वेदनशील है, लेकिन मेरी कभी उनसे बात नहीं हुई, एक औपचारिक बात को छोड़ कर.

शैफाली मेरी बहुत अच्छी सहेली हैं, लेकिन उनके पास अपनी बातें इतनी हैं, कि वे दूसरे की क्या सुनें?

नादानियों के मामले में मैं खुद को मोनिका भारद्वाज के समकक्ष खड़ी पाती हूँ. मोनिका मेरी इस बात से दुखी हो सकती हैं कि वे तो नादान नहीं, पर मुझसे ऐसा ही सोचा गया.

सुबोध मित्तल बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता।

माँ सामता अपनी उलझनों में व्यस्त हैं.

इंद्रा रानी अपने आप में पूर्ण है या नहीं, लेकिन दिखती हैं.

कभी-कभी ऋचा विमल कुमार के कंधे पर सिर रख कर रोने का मन हुआ है लेकिन फिर लगा, बेचारी सुखी बच्ची को क्यों दुखी किया जाए? मेरे बहुत से दर्द तो उन्हें समझ ही नहीं आएँगे.

जया पांडे, जिनके घोर अपनत्व से मैं शुरू में ऊब-सी गई थी, इसके बावजूद उन्होंने मुझे सम्मान देना नहीं छोड़ा, दुःख-दर्द सुनाने के मामले में जया मुझे अपने सबसे करीब लगती हैं, अगर वे मेरे नज़दीक रह रही होतीं तो हम एक-दूसरे को अपनी कहानियाँ सुना-सुना कर रात-दिन रो रहे होते, क्योंकि उनके पास भी बहुत दर्द हैं, मेरे पास भी.

अन्य सब सखियाँ भी बहुत भली हैं, मुझसे सभी का स्नेह है, सभी मेरा आदर-मान करती हैं.

पुरुष मित्रों से अपने दुःख-दर्द बाँटना मुझे उचित नहीं लगता क्योंकि दुःख-दर्द बँटते ही करीबी आ जाती है, जिसके कारण नए दुःख-दर्द पैदा होने की सम्भावना बन जाती है. फिर भी पुरुष मित्रों के बारे में कहूँ तो……

ध्रुव गुप्त के साथ अपनेपन का एक झीना सा सूत्र महसूस होता है. फेसबुक पर आने के बाद से मित्र हैं, शायद इसलिए।

आलोक मिश्र अत्यंत भावुक है. उसके पास अपनी कहने और मेरी सुनने के लिए ढेर सारा वक़्त है लेकिन मेरी अपनी अक्षमता, ज़्यादा बातों से मैं थक जाती हूँ.

सौरभ द्विवेदी मुझे शुरू में कुछ दीवाना सा, कुछ बदहवास सा लगा था, मैं उनकी बातों से बोर भी हो गई थी लेकिन सौरभ ने अपने को सँभाला। फिर मेरे प्रति उनका आदरभाव कभी कम नहीं हुआ, कभी उन्हें क्रोध नहीं आया. और बाद में जो मैंने उनमें प्रतिभा देखी, मैं चकित रह गई. उनके भीतर शब्दों और विचारों का लावा भरा है, जो फेसबुक पर निरंतर बह रहा है. सौरभ प्रतिभाशाली हैं, उन्हें शुरू में जिस दुःख ने तोडा था, शायद वही दुःख उनके लिए आगे बढ़ने में प्रेरक सिद्ध हुआ. इसीलिए मैं कहती हूँ, दुःख कभी खाली नहीं जाता, हमें बहुत कुछ देकर जाता है.

आलोक शर्मा के आदर भाव से मैं अभिभूत हूँ.

सुभाष ओझा के विनम्र अपनत्व के प्रति कृतज्ञ हूँ.

राघवेन्द्र अवस्थी (चाहे बुरा मानें) मुझे बहुत लाउड लगते हैं, फिर भी उन्होंने माते सुबोध मित्तल की संगति में बहुत तरक्की की है. मेरे और राघव के बीच छेड़छाड़ का सिलसिला बरकरार है.

भगवंत अनमोल घनघोर आत्म मुग्ध बालक है.

सोमेश चन्द्र ककड़ घनघोर आत्ममुग्ध परिपक्व पुरुष हैं.

संजय कुमार शुक्ला में गज़ब की समझ है. उनके अपनेपन के आगे द्रवित हूँ. कई बार सोचती हूँ कि संजय के 'सच' को मैंने क्यों सराहा? कई सच स्वीकार करने योग्य नहीं होते। पर शायद उनके 'सच' से ज़्यादा उनके जीवन के चमत्कार ने मुझे प्रभावित किया।

डा. एस के सिंह, लगता है, खामोशी से काम कर रहे हैं.

अनिल उपाध्याय ने मुझे Mother Dairy के Nutrifit से परिचय कराया, बेक्ड समोसे के बारे में बताया, दोनों के रसास्वादन से मैं लाभान्वित हुई.

अरे हाँ, अरुण मिश्रा, भई मैं आपको कैसे भूल सकती हूँ? मैं फेसबुक पर आपकी एकमात्र दोस्त जो हुई, बाकी सब तो बहनें-माताएँ हैं.

बाकी के बारे में फिर कभी. सच कहूँ तो जितना आदर मुझे फेसबुक पर मिला, उतना कहीं नहीं, कभी नहीं।

Sunday, 24 May 2015

वह आया था Kavita 234

वह आया था

वह आया था
उसने क्या अभिनय किया था !
हम आजतक उसके हुनर की दाद देते हैं।

हम उसके झूठ में इतना खोए
कि यह हमें बहुत बाद में पता चला
कि हमारे साथ सच में क्या से क्या हो गया !

वह पिंजरे में बंद होकर भी
पंख इस अदा से फड़फड़ाता था
कि आज़ाद उड़ने वाले शर्म से पानी-पानी हो जाऍं।

ऊँची छलाँग लगाने का जज़्बा
उसमे कूट-कूट कर भरा था
उठ-उठ कर गिरना पर उसकी नियति में लिखा था।

कुछ तो ख़ास था उसमें
हम जैसों को बहकाने के लिए
वर्ना हम कोई पागल नहीं जो बेवजह बहक जाऍं।

नहीं, अब वह हमें याद नहीं आता
याद आते हैं उसके ड्रामे
जिन पर हमने जम कर तालियों बजाई थीं।

Friday, 22 May 2015

शिमला के बहाने से : कुछ पुराने दर्द

शिमला के बहाने से : कुछ पुराने दर्द

शिमला अब वह शिमला नहीं रहा. शहर के मुकाबले 28*C कूल होगा लेकिन हम अपने शहर में, अपने घर में जितने ठंडे मौसम में रहते हैं, उतना ठंडा मौसम इन दिनों शिमला में नहीं है. और भीड़.… गज़ब की भई. माल रोड पर घूमना मुश्किल है. चल खुसरो घर आपने। पर शिमला का एक अपना ग्लैमर है जो अन्य किसी हिल स्टेशन का नहीं है. पहाड़ों की रानी अगर मसूरी है तो शिमला राजा।

मेरा पुत्र, मुझ गरीब माँ का बेटा, कभी शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढता था. आज शान से कहती हूँ, My son is a product of Bishop Cotton School, Shimla. (Shimla तब Simla लिखा जाता था. बोला हमेशा से 'शिमला' ही जाता है)

मेरे बेटे !
मैं अपनी ज़िन्दगी के विरोधाभासों की कहानी
तुझे अभी कैसे सुनाऊँ?
तू बहुत छोटा है.
नहीं समझेगा कि माँ का अकेलापन
जब-जब उसके समूचे व्यक्तित्व पर छा जाता है
तब-तब वह खुद को सँवारने की कोशिश में लग जाती है
और भीतर ही भीतर कहीं टूटती चली जाती है.

मैं लगभग हर सप्ताह शनिवार को रात बस से चल कर रविवार की सुबह शिमला पहुँचती थी, दिन भर बेटे के साथ माल रोड पर भटकती थी, रेस्त्रां में खाना खा कर किसी पार्क में बैठे रहते थे, नहीं होटल में नहीं रुकते थे, फिर शाम उसे हॉस्टल में छोड़ कर बस से दिल्ली के लिए रवाना होकर सोमवार की सुबह सीधे ऑफिस। स्कूल से स्पेशल परमीशन ली हुई थी हर सप्ताह मिलने की.

मेरे बच्चे !
जब मेरी आँखों में समुद्र उमड़ आया था
तब तेरी आँखें क्यों रीत गई थीं?
जब मैंने चुप्पियों को तोड़
तेरे साथ मिल कर चहचहाना चाहा था
तब तेरे होंठ क्यों सिल गए थे?
क्यों तू अपने नन्हे-मुन्ने साथियों को छोड़
मेरी गोद में सिमट आया था
और अनेक प्रश्न भरा चेहरा मेरे वक्ष पर रख
बिन कहे मुझसे अनेकों सवाल पूछ गया था?
क्या वे सब अर्थ जो मुझे निरर्थक बना गए थे
तुझमें से होकर भी गुज़रे थे?
मेरी पीड़ा तेरी पीड़ा बन गई थी.
बिना कहे भी कितना कुछ कह जाने वाली
तेरी छोटी-छोटी चमकदार आँखों का दर्द
मेरे उस दर्द से कितना बड़ा था
जो तुझसे छुपाना चाहते हुए भी मैंने
तुझे अपने से लिपटा कर
तेरी झोली में डाल दिया था.

एक बार उसके एक टीचर ने मुझसे कहा, 'मैं हैरान हूँ, आपने अपने बेटे को इस महँगे स्कूल में क्यों डाला? इस स्कूल का कोई भी बच्चा सरकारी अधिकारी का बच्चा नहीं है, सब बड़े बिज़नेसमैन, इंडस्ट्रियलिस्ट, फिल्म स्टार्स के बच्चे हैं. आप कैसे अफोर्ड करेंगी? आप निभा नहीं पाएँगी।' उन्होंने ही बताया कि फिल्म स्टार राज कपूर का बेटा ऋषि कपूर तथा अन्य बच्चे इसी स्कूल से पढ़े हैं. (शायद इसीलिए मैं आजतक नमक-अजवायन के पराँठे खुश होकर खाती हूँ.)

मेरे बेटे !
तेरे लिए अनेक सुखों के स्वप्न देखते हुए भी
तुझे अपने गहनतम दुःख का भागीदार
बना लेने के गुनाह के लिए
तेरी माँ तेरे आगे क्षमाप्रार्थी है.

बेटे का भाग्य प्रबल था. मुझे इस स्कूल का नाम तक पता नहीं था. (असल में कुछ मित्रों ने कहां था कि मैं हरवक्त ग़मगीन रहने के कारण अपने बच्चे की परवरिश सही नहीं कर पा रही हूँ, इसलिए उसे हॉस्टल में डालना बेहतर होगा।) मैं उसे शिमला के नज़दीक डगशाई के एक हॉस्टल में दाखिल करने गई थी लेकिन वहाँ का माहौल मुझे ठीक नहीं लगा, नया खुला था, बच्चे बहुत कम थे. हॉस्टल में दाखिल करने का आइडिया त्याग हम शिमला अपने एक सम्बन्धी के घर चले गए, यह सोच कर कि अगली सुबह वहाँ से दिल्ली की बस लेंगे। सम्बन्धी ने बताया, 'यहाँ एक अच्छा स्कूल है, बिशप कॉटन, थोड़ा महँगा है, आप चाहें तो पता कर लें.' अगले दिन दिल्ली आने की बजाय हम बिशप कॉटन पहुँचे, जैसे वे हमारे ही इंतज़ार में बैठे थे, उन्होंने तुरंत एडमिशन दे दिया (शायद कोई जगह खाली होगी). और फिर दिल्ली आकर उस स्कूल के आदेशों के अनुसार 12-12 स्कूल ड्रेसेज़, अण्डरवियर्स, 3 गर्म कोट, 1 गर्म नाइट गाउन तथा अन्य अनेक सामान तीन बड़े ट्रंकों में भर कर मैं अपने अकेले होने का इंतज़ाम कर आई.

दाखिले के बाद जब मैं पहली बार उसे मिलने गई तो स्कूल में बच्चों से पूछ रही थी कि मनीष कहाँ है? कि मैंने महसूस किया कि मेरे पीछे से कोई मेरी साड़ी का पल्लू खींच रहा है. मैंने एकाएकी पहचाना नहीं। उसके इतने खूबसूरत शैम्पू किए फ्लफी बालों को फ़ौज के जवानों के बालों की तरह क्रूकट कर दिया गया था. मेरे गले से लगते ही उसने पहला वाक्य बोला, 'मम्मा, अकेले रोना नहीं।'

मेरे बेटे !
क्या तुझे समझ में आती हैं वे सब बातें
जो मैं आँसुओं के रास्ते तुझ तक पहुँचाती हूँ?
सच बता, मैं तुझे कितना-कितना तड़पाती हूँ?
अपने नन्हे हाथों से मेरे आँसू पोंछते हुए
तू मेरा रक्षक बन जाता है.
पर यह मैंने तेरी दीये सी जलती आँखों में देखा है
कि मुझे हँसना सिखाते हुए
तू भीतर कितना रोया-तड़पा है
मुझे सँभालते हुए तू खुद कितना अकेला हो गया है
मेरे आँसू पोंछते हुए तूने
किस मुश्किल से अपनी आँखों को उमड़ने से रोका है
खिलौनों का मोह छोड़ तूने बहुत लगन से
अपनी माँ को टूटने से रोका है.
तेरा त्याग मेरे त्याग से कहीं बड़ा बन कर
मुझे नतमस्तक कर जाता है.

अपने अकेले होने का इंतज़ाम मैंने उसे बी ई करने के लिए पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज भेजते हुए भी किया, लेकिन वह ज़रूरी था. उस समय मेरे पिता ने यह कहा था, 'कुछ पैसा अपने आगे के लिए भी रख. बच्चों का कोई भरोसा नहीं।' सच है, यह जीवन एक जुआ है, हम चाल कितनी भी दुरुस्त चलें, फिर भी हार की गुंजाइश बनी रहती है. मेरा सौभाग्य था कि मुझे अंत में जीत मिली।

मेरे बच्चे !
तेरी आँखों के जो कभी-कभी
बेहिसाब जिज्ञासा झिलमिलाने लगती है
उसे मैं किसी दोहरी नैतिकता का पाठ पढ़ाना नहीं चाहती।
मैं अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब-सी
तेरे आगे रख देना चाहती हूँ
तू खुद उसे पढ़ना
और उसमें से अपने लिए
नीति वाक्य को तलाशना।


Wednesday, 20 May 2015

Re-birth

Re-birth

After writing 16 books, I was dead (though not literally) for almost 13 years. During that period, I had passed through a phase of suicidal tendencies, enjoyed absolute 'Vairaagya", living in this world, still not living in it, also went through the agony of deadly disease Cancer. (Now I am completely cured, this is what Doctors say). I woke up again in the beginning of 2012 (I re-started writing in August, 2012) after 13 odd years to die again in 2014. Now in my persona, a dead person is talking to you.

During that period of my loneliness of 13 years, surprisingly I found an email friend. Obviously Male. This on-line friendship was initiated by him. We exchanged about one thousand emails during a short span of time, without knowing factual details of each other, without knowing age of each other etc.

These emails are very literary, poetic pieces of mind blowing reading experience. In these mails, one can find a dream world of two unknown, unseen persons, belonging to different disciplines, leading a different life style, with full of emotions, away from the realistic world, unfolding the pages of their past, stepping towards a dreamy future, which they both know, can never be achieved due to many reasons. It will be interesting to read how the chapters of lives of a known Hindi Writer (that is Me) and he, who has also been inspired to creative writing are unfolding autobiographically. Each moment, conscious about their age-difference, occasionally they even found themselves romantically inclined and miserably confined in a no-return situation. They threw themselves in a world of agelessness, timelessness, facelessness, resulting in an unfulfilled relationship, giving both an unspoken pain, which they call a beautiful experience, enlightening them on many truths and facets of love, life, reality and imaginary world.

No one can deny the strength of WORD. Words have got tremendous power of changing the scenario. It is this power which has awakened my 'Sleeping Writer' and I felt the inner need to restart my writing skill and it is this power which drew him to creative writing as well. After the phase of living in that artificial world of dreams and imagination is over, means dead, my 'writer' is reborn. An artist is always an artist. A writer is always a writer. So now I am here.

वह मुझे मेरे अकेलेपन से निकाल कर फिर से भीड़ में फेंक गया। उससे शुरू, उस पर ख़त्म, मेरी कविताएँ।

All my poems, written after August, 2012, are inspired by none other than this dream man, whom I don't think, I'll ever meet.

Silly girl, इस दुनिया में इतने जीते-जागते लोग हैं और तू सपनों में जी रही है?

I feel, emotional involvement is very necessary to recreate yourself. It gives you thrill and spice of life.

Manika Mohini   20.05.2015

Monday, 18 May 2015

Feeling proud to be ME. (खुद पर नाज़ करते हुए)

Feeling proud to be ME. (खुद पर नाज़ करते हुए)

Let me announce my independence. I am my own boss. I decide my own things. I take my own decisions. I am a senior citizen. I had been a cancer patient. Still I am earning my own livelihood even today. I have earned my own house. I have earned my own car. I have fullfilled my responsibilities pretty well. I choose my own friends. I choose my own way of life. Still I do not do any wrong thing. I do not harm and hurt any body. I do not quarrel with any body. Though I do not live as per the norms of the conservative society, I am a liberated person, still I am praised by the society. My conscience is clear and sharp. I am up to the mark and on equal level with my next generations. I have earned love and good faith of those who are connected with me. I am I. I am ME. People should feel happy, at least one woman is liberated.

मैं अपने स्वतंत्र होने की घोषणा करती हूँ. मैं अपनी बॉस खुद हूँ. मैं अपनी चीज़ें खुद चुनती हूँ. मैं अपने निर्णय खुद करती हूँ. मैं एक सीनियर सिटिज़न हूँ. मैं एक कैंसर पेशेंट रह चुकी हूँ. इतने पर भी मैं आज भी अपनी रोज़ी-रोटी खुद कमा रही हूँ. मैंने अपना मकान कमाया है. मैंने अपनी कार कमाई है. मैंने अपनी ज़िम्मेदारियों को बहुत बढ़िया तरह निभाया है. मैं अपने मित्र स्वयं चुनती हूँ. मैं अपनी तरह से जीवन जीती हूँ. तब भी मैं कुछ गलत नहीं करती। मैं किसी का दिल नहीं दुखाती, न ही किसी को नुकसान पहुँचाती हूँ. मैं किसी से लड़ाई नहीं करती। यद्यपि मैं दकियानूसी समाज के कायदों-कानूनों पर नहीं चलती और एक आज़ाद जीवन जीती हूँ, तथापि मैं समाज द्वारा पूर्ण सम्मानित हूँ. मेरा अंतर्मन साफ़ और दुरुस्त है. मैं नए ज़माने के साथ हूँ और अपनी अगली पीढ़ी के साथ समान स्तर पर जीती हूँ, मैंने अपने से जुड़े हुए लोगों का प्रेम और विश्वास अर्जित किया है. मैं 'मैं' हूँ. मैं 'मैं' ही हूँ. लोगों को इस बात के लिए खुश होना चाहिए कि कम से कम एक महिला तो आज़ाद है.

Thursday, 14 May 2015

Bhumika Dwivedi के नाम खुला पत्र

Bhumika Dwivedi के नाम खुला पत्र

भूमिका, चाहे तुम बुरा मानो, पर मैं स्पष्ट कहूँगी कि बूढ़े पुरुषों की लोलुप मानसिकता पर लिखी तुम्हारी कविता एकदम घटिया है, भाव की दृष्टि से तो घटिया है ही, शिल्प की दृष्टि से भी इसमें कोई दम नहीं है. वस्तुतः यह कविता है ही नहीं, किसी पर गुस्से में निकले उदगार हैं. साहित्य के किसी कोने में उस रचना को स्थान नहीं मिल सकता जो मन की भड़ास निकालने के लिए, किसी को बदनाम करने के लिए रची जाए. जो लोग प्रशंसा के पुल बाँध रहे हैं, वे तुम्हारे मज़े ले रहे हैं. एक शेयर करने वाले मित्र ने तुम्हारे व्यक्तिगत जीवन के बारे में अपनी टिप्पणी लिखी है. एक युवा लड़के ने तुम्हारी कविता शेयर की है जिसके शब्दों में 55 साल का आदमी बुड्ढा है. जब आप 20 के होते हैं तो आपको 30-40 साल के लोग भी बुड्ढे लगते हैं. वैसे एक उम्र पर आदमी बुड्ढा हो ही जाता है, सबके साथ है, हाँ, उस उम्र में भी यदि वह किसी युवा लड़की को भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से संतुष्ट करने में सक्षम है, तो वह कहाँ से बुड्ढा है? हाँ, कई रसलोलुप होते हैं लेकिन बहुत बड़ी उम्र का पुरुष, जैसा कि तुमने दर्शाया है, किसी भी लड़की से ज़बरदस्ती कुछ नहीं कर सकता, बलात्कार तो बिलकुल नहीं। लड़की स्वयं अपनी ख़ुशी से उससे अपना उपभोग करवाए तो करवाए. अब मैं तुम्हारे सामने उन कमउम्र, कमसिन, मृगनयनी, कामिनियों (नहीं, कमीनियों) की सचाई के बारे में बताती हूँ जो ऐसे पुरुषों को भी नहीं छोड़ती, जिनके लिए ऐसे पुरुष ईज़ी टारगेट होते हैं. मैं स्वयं महिला होते हुए ऐसा कह रही हूँ क्योंकि यह एक सचाई है और मैं हमेशा सच के पक्ष में होती हूँ. लेखक सलमान रूश्दी के साथ कमउम्र लड़कियों ने स्वयं आगे बढ़ कर शादी की. चित्रकार पिकासो के साथ उनकी 61 वर्ष की आयु में एक 21 वर्ष की नवयुवती ने उनसे प्रेम विवाह किया। इंग्लिश मैगज़ीन Playboy के मालिक, जिनकी उम्र 80 वर्ष के लगभग थी, के साथ एक बहुत छोटी उम्र की लड़की शादी करने के लिए तत्पर थी. इन कतिपय सुप्रसिद्ध नामों के सिवा इस समाज में बहुत से ऐसे मामले देखने को मिल जाएँगे। कुछ कमसिन लड़कियाँ सचमुच उम्रदराज़ पुरुषों के प्रेम में पड़ जाती हैं, कारण कई हो सकते हैं, फादर फिगर के प्रति उनका आकर्षण, उम्रदराज़ पुरुष के पैसे और रुतबे के प्रति आकर्षण, कुछ यह भी कि जल्दी मर जाएगा और हमें सब कुछ मिल जाएगा, लड़कियों का आर्थिक रूप से ज़रूरतमंद होना, पुरुष की हैसियत और रुतबे के सहारे खुद ऊपर उठना, लड़कियों की आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा जो उनके हमउम्र संघर्षरत लड़के के द्वारा पूरी नहीं की जा सकती, आदि कई कारण होते हैं जो लड़कियों को बड़ी उम्र के पुरुष की और आकर्षित करते हैं. मैत्रेयी पुष्पा ने पोस्ट पर कमेंट किया था, कि लड़कियाँ कंगाल बुड्ढों को क्यों नहीं चुनतीं, तो वह कमेंट हटा दिया गया। सोचने वाली बात है कि आज तक किसी कमसिन लड़की ने किसी ज़रूरतमंद कंगाल बुड्ढे का हाथ नहीं थामा। (And mind you, it is vice versa. पर वह फिर कभी.)


Wednesday, 13 May 2015

सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे।

सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे।

कल सुबह डाकिया एक रजिस्ट्री लेकर आया. मैंने साइन करके लिया, जीवन बीमा निगम से आया था. डाकिया खुश होकर बोला, 'चेक आया है.' 'तुम्हें कैसे पता?' मैंने पूछा तो बोला, 'खोल कर देख लीजिए।' और खड़ा रहा. मैं गेट बंद करने लगी तो फ़िर बोला, 'मैडम, चेक आया है.' मैंने गुस्से में कहा, 'क्या ख़ास बात हो गई चेक आया है तो?' और गेट बंद करके भीतर आ गई. बेचारे को 10-20 रुपये की भीख मिलने से रह गई.

मेरा पासपोर्ट रिन्यू होना था, सारी औपचारिकताएँ पूरी हो गईं तो एक सिपाही महोदय घर आए कुछ तहकीकात करने। पूछताछ के बाद बोले, 'तो मैं जाऊँ?' पूछा उन्होंने ऐसे जैसे मैं कहूँगी, नहीं, नहीं, ठहरिए, खाना खा कर जाइएगा। मैंने कहा, 'जाइए।' बोले, 'कुछ इनाम नहीं देंगी?' 'इनाम काहे का?'  बोले, 'मैडम, हमारे हाथ में बहुत कुछ है, हमारी रिपोर्ट के आधार पर पासपोर्ट बनता है. हम चाहें तो पासपोर्ट बने, न चाहें तो न बने.' मेरा आधारभूत पासपोर्ट डिप्लोमैटिक था. रिन्यू न होने का तो सवाल ही नहीं था। वैसे भी मैं रिश्वत देकर कोई भी काम करवाने के सख्त खिलाफ। मैंने उसे लगभग डाँटते हुए कहा, 'उठो और जाओ यहाँ से. और हिम्मत है तो मेरा पासपोर्ट रोक कर दिखाना।' पासपोर्ट तो खैर क्या रुकता, हाँ, उस दिन उस बेचारे की ऊपर की कमाई ज़रूर रुक गई.

अभी कुछेक दिन पहले सेल्स टैक्स की चिट्ठी लेकर आया उनका चपरासी चिट्ठी देने के बाद भी खड़ा रहा तो मैंने कहा, 'ठीक है, जाओ.' ढिठाई से बोला, 'कुछ चाय-पानी …' मैंने गुस्से से कहा, 'मैंने कहा था, यह चिट्ठी मेरे पास लेकर आओ? दफ़ा हो जाओ.' मैं फकीरी औकात वाले लोगों को ऐसे ही ट्रीट करती हूँ. मेरी नज़रों में ये लोग गिरे हुए हैं, जो अपनी नौकरी करते हुए ऊपरी कमाई यानि भिखमंगी की आदत पाले हुए हैं. ऐसी बातों से मेरा दिमाग भन्ना जाता है.

मेरे परिवार के अन्य लोग मेरी सोच से विपरीत हैं. पुत्र का ऐटिच्यूड यह कि 'कहाँ टाइम है ऐसी बातों में दिमाग खपाने के लिए? दो यार 50-100 रुपये। ऐसी छोटी-छोटी बातों में सिरखपाई मत किया करो.'

पुत्रवधु छोटी आई थी, अब तक छोटी ही है. उस के बस में नहीं आते ये लोग. बच्चे सिद्धांत का पासपोर्ट बन कर घर आ गया, सिपाही पूछताछ के लिए बाद में आया. जब उसे बताया गया कि पासपोर्ट बन चुका है तो बोला, 'फिर भी मैं तो आया हूँ ना, मेरी मेहनत का तो कुछ दो,' और बरखा ने उसे 50 रुपये दे दिए. मैंने घर आने के बाद जब सुना तो 'हे राम' के अलावा और क्या कहती?

अब ताज़ी बात कल की. बरखा का पासपोर्ट रिन्यू होना है, सारी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी हैं, सिपाही जी अपना फ़र्ज़ पूरा करने घर आए. बरखा घर में अकेली थी. उसने कहानी यूँ बताई।।।।

सारी पूछताछ करने के बाद सिपाही जी बोले, 'अब मेरी फीस तो दो.'

'आपकी फीस?' बरखा ने पूछा।

'हाँ, जाओ, 2-4 हज़ार रुपये लेकर आओ.'

'पर मेरे पास इतने रुपये नहीं हैं. अभी मेरे हस्बैंड और मदर-इन-लॉ भी घर पर नहीं हैं.'

'कुछ तो दो. चलो, 500 ही दो.'

'मेरे पास 500 भी नहीं हैं, मैं बस 100 रुपये दे सकती हूँ. मैं आपके बिना माँगे ही आपको 100 रुपये देने वाली थी.'

'100 रुपये लेने की तो अपनी औकात ना है.'

बरखा ने उसे 200 रुपये दिए, तब वह विदा हुआ.

अब बरखा को भी डाँटना ज़रूरी था, 'तुम घर में अकेली थीं, तुम्हें डर नहीं लगा जो उसे घर में घुसने दिया? बाहर खड़े-खड़े बता देतीं।'

'मम्मी, वह माना ही नहीं, बोला, उसे अंदर बैठ कर लिखना है.'

'वाह ! तुमने यह भी बता दिया कि घर में और कोई नहीं है, तुम अकेली हो?'

'मैं क्या करती मम्मी, वह 2-4 हज़ार माँग रहा था और जा ही नहीं रहा था? मेरे पास इतने रुपये नहीं थे।'

'यानि होते तो तुम उसे दे देतीं?'

'मम्मी...... देने होते तो मैं आपकी अलमारी से निकाल कर दे देती, आपकी अलमारी की चाबी, आपने बताया हुआ है न, कहाँ रखी है? पर मैंने नहीं दिए. ठीक तो किया।'

हे भगवान ! मुझे कई बार लगता है कि मेरे घर में रहते मेरा घर मेरे भरोसे है और मैं घर में न होऊँ तो भगवान भरोसे।

सोच रही हूँ, जहाँ से वह सिपाही कल आया था, वह पुलिस स्टेशन हमारे घर के पास ही है, आज वहाँ जाकर उसकी शिकायत कर आऊँ कि अकेली महिला के होते सिपाही घर में न आए, पूछताछ बाहर से करे और ज़बरदस्ती पैसे न माँगे। पर बेटा ऑफिस जाते हुए हिदायतन बोल गया है, 'क्यों अपनी दिक्कतें बढ़ा रही हो माँ? पैसा खर्च करके अगर मुश्किलें आसान होती हैं तो क्या दिक्कत है?'

मेरे पास सिर्फ यह सोच कर सब्र करने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है कि सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे। और मेरे बच्चे ……? हे भगवान।

Tuesday, 12 May 2015

क्या लिखूँ Kavita 233

क्या लिखूँ

मैं भूल गई हूँ कविता लिखना।

मेरे पास भाव भी हैं, अभाव भी
विलास भी है, संत्रास भी
संज्ञान भी है, अज्ञान भी
आशा भी है, निराशा भी
पुराने दर्द भी हैं, नए ज़ख्म भी
शब्दों के ढेर भी हैं, मौन के मर्म भी.

फिर क्यों रुक जाती हूँ?
आगे बढ़ नहीं पाती हूँ?

लिखने को क्या लिखूँ?
कैसे लिखूँ?
और क्यों लिखूँ?

भूल गई हूँ लिखना
जैसे कभी-कभी भूल जाती हूँ जीना।

Monday, 11 May 2015

Gazal 46

Gazal 46

तुमने मुझे इतना छुआ
क्या तुम्हें कुछ नहीं हुआ?

बुझते अंगार जलाने
क्यों आए थे तुम मर्दुआ?

जल बिन मछली की उपमा
बेबस प्यार की बद्दुआ।

तुमने झूठ ही कहा था
पर मुझे सच में ही हुआ।

अब इस होने का भी क्या?
जो भी हुआ सो बस हुआ।

Friday, 8 May 2015

मदर्स डे पर तोहफ़ा

मदर्स डे पर तोहफ़ा

सुना है, मदर्स डे आने वाला है. सच, बच्चे जब बड़े हो जाएँ तो कोई एक दिन तो निश्चित हो, जब वे अपनी माँ के पास बैठें। सालों पहले जब मेरे पुत्र ने लम्बा होना शुरू किया था, मैं उससे कहती थी, 'बस, बस, और बड़ा मत हो, तेरे बड़ा होने से लोगों को लगता है कि मैं बड़ी हो रही हूँ. मुझे बूढ़ा करके छोड़ेगा।' अब मेरे पुत्र ने कहा, 'मम्मी, मैं बूढ़ा हो गया पर आप बूढ़ी नहीं हुईं।' सच पूछो तो लड़के-लडकियाँ जब तीस के होते हैं तो अपने को ढलता हुआ महसूस करते हैं और चालीस के हो जाएँ तो बूढ़ा। अब हम जैसे कहाँ मिलेंगे जो मर-मर कर जी उठते हैं और हर मरने के बाद जी उठने पर अपने को फिर से 'नया' महसूस करने लगते हैं. जाने दीजिए. तो जनाब, बेटे ने कहा, 'मैं बूढ़ा हो गया पर आप बूढी नहीं हुईं।' यह बात कोई और कहता तो मैं समझती, फ्लर्ट कर रहा है. गज़ब है ना, आजकल बच्चे भी? माँ-बाप से फ्लर्ट करते हैं. मदर्स डे पर इससे बड़ा तोहफ़ा कोई क्या देगा किसी माँ को?