Wednesday, 13 May 2015

सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे।

सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे।

कल सुबह डाकिया एक रजिस्ट्री लेकर आया. मैंने साइन करके लिया, जीवन बीमा निगम से आया था. डाकिया खुश होकर बोला, 'चेक आया है.' 'तुम्हें कैसे पता?' मैंने पूछा तो बोला, 'खोल कर देख लीजिए।' और खड़ा रहा. मैं गेट बंद करने लगी तो फ़िर बोला, 'मैडम, चेक आया है.' मैंने गुस्से में कहा, 'क्या ख़ास बात हो गई चेक आया है तो?' और गेट बंद करके भीतर आ गई. बेचारे को 10-20 रुपये की भीख मिलने से रह गई.

मेरा पासपोर्ट रिन्यू होना था, सारी औपचारिकताएँ पूरी हो गईं तो एक सिपाही महोदय घर आए कुछ तहकीकात करने। पूछताछ के बाद बोले, 'तो मैं जाऊँ?' पूछा उन्होंने ऐसे जैसे मैं कहूँगी, नहीं, नहीं, ठहरिए, खाना खा कर जाइएगा। मैंने कहा, 'जाइए।' बोले, 'कुछ इनाम नहीं देंगी?' 'इनाम काहे का?'  बोले, 'मैडम, हमारे हाथ में बहुत कुछ है, हमारी रिपोर्ट के आधार पर पासपोर्ट बनता है. हम चाहें तो पासपोर्ट बने, न चाहें तो न बने.' मेरा आधारभूत पासपोर्ट डिप्लोमैटिक था. रिन्यू न होने का तो सवाल ही नहीं था। वैसे भी मैं रिश्वत देकर कोई भी काम करवाने के सख्त खिलाफ। मैंने उसे लगभग डाँटते हुए कहा, 'उठो और जाओ यहाँ से. और हिम्मत है तो मेरा पासपोर्ट रोक कर दिखाना।' पासपोर्ट तो खैर क्या रुकता, हाँ, उस दिन उस बेचारे की ऊपर की कमाई ज़रूर रुक गई.

अभी कुछेक दिन पहले सेल्स टैक्स की चिट्ठी लेकर आया उनका चपरासी चिट्ठी देने के बाद भी खड़ा रहा तो मैंने कहा, 'ठीक है, जाओ.' ढिठाई से बोला, 'कुछ चाय-पानी …' मैंने गुस्से से कहा, 'मैंने कहा था, यह चिट्ठी मेरे पास लेकर आओ? दफ़ा हो जाओ.' मैं फकीरी औकात वाले लोगों को ऐसे ही ट्रीट करती हूँ. मेरी नज़रों में ये लोग गिरे हुए हैं, जो अपनी नौकरी करते हुए ऊपरी कमाई यानि भिखमंगी की आदत पाले हुए हैं. ऐसी बातों से मेरा दिमाग भन्ना जाता है.

मेरे परिवार के अन्य लोग मेरी सोच से विपरीत हैं. पुत्र का ऐटिच्यूड यह कि 'कहाँ टाइम है ऐसी बातों में दिमाग खपाने के लिए? दो यार 50-100 रुपये। ऐसी छोटी-छोटी बातों में सिरखपाई मत किया करो.'

पुत्रवधु छोटी आई थी, अब तक छोटी ही है. उस के बस में नहीं आते ये लोग. बच्चे सिद्धांत का पासपोर्ट बन कर घर आ गया, सिपाही पूछताछ के लिए बाद में आया. जब उसे बताया गया कि पासपोर्ट बन चुका है तो बोला, 'फिर भी मैं तो आया हूँ ना, मेरी मेहनत का तो कुछ दो,' और बरखा ने उसे 50 रुपये दे दिए. मैंने घर आने के बाद जब सुना तो 'हे राम' के अलावा और क्या कहती?

अब ताज़ी बात कल की. बरखा का पासपोर्ट रिन्यू होना है, सारी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी हैं, सिपाही जी अपना फ़र्ज़ पूरा करने घर आए. बरखा घर में अकेली थी. उसने कहानी यूँ बताई।।।।

सारी पूछताछ करने के बाद सिपाही जी बोले, 'अब मेरी फीस तो दो.'

'आपकी फीस?' बरखा ने पूछा।

'हाँ, जाओ, 2-4 हज़ार रुपये लेकर आओ.'

'पर मेरे पास इतने रुपये नहीं हैं. अभी मेरे हस्बैंड और मदर-इन-लॉ भी घर पर नहीं हैं.'

'कुछ तो दो. चलो, 500 ही दो.'

'मेरे पास 500 भी नहीं हैं, मैं बस 100 रुपये दे सकती हूँ. मैं आपके बिना माँगे ही आपको 100 रुपये देने वाली थी.'

'100 रुपये लेने की तो अपनी औकात ना है.'

बरखा ने उसे 200 रुपये दिए, तब वह विदा हुआ.

अब बरखा को भी डाँटना ज़रूरी था, 'तुम घर में अकेली थीं, तुम्हें डर नहीं लगा जो उसे घर में घुसने दिया? बाहर खड़े-खड़े बता देतीं।'

'मम्मी, वह माना ही नहीं, बोला, उसे अंदर बैठ कर लिखना है.'

'वाह ! तुमने यह भी बता दिया कि घर में और कोई नहीं है, तुम अकेली हो?'

'मैं क्या करती मम्मी, वह 2-4 हज़ार माँग रहा था और जा ही नहीं रहा था? मेरे पास इतने रुपये नहीं थे।'

'यानि होते तो तुम उसे दे देतीं?'

'मम्मी...... देने होते तो मैं आपकी अलमारी से निकाल कर दे देती, आपकी अलमारी की चाबी, आपने बताया हुआ है न, कहाँ रखी है? पर मैंने नहीं दिए. ठीक तो किया।'

हे भगवान ! मुझे कई बार लगता है कि मेरे घर में रहते मेरा घर मेरे भरोसे है और मैं घर में न होऊँ तो भगवान भरोसे।

सोच रही हूँ, जहाँ से वह सिपाही कल आया था, वह पुलिस स्टेशन हमारे घर के पास ही है, आज वहाँ जाकर उसकी शिकायत कर आऊँ कि अकेली महिला के होते सिपाही घर में न आए, पूछताछ बाहर से करे और ज़बरदस्ती पैसे न माँगे। पर बेटा ऑफिस जाते हुए हिदायतन बोल गया है, 'क्यों अपनी दिक्कतें बढ़ा रही हो माँ? पैसा खर्च करके अगर मुश्किलें आसान होती हैं तो क्या दिक्कत है?'

मेरे पास सिर्फ यह सोच कर सब्र करने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं है कि सरकारी कर्मचारी फ़कीर के फ़कीर रहेंगे। और मेरे बच्चे ……? हे भगवान।

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