Friday, 22 May 2015

शिमला के बहाने से : कुछ पुराने दर्द

शिमला के बहाने से : कुछ पुराने दर्द

शिमला अब वह शिमला नहीं रहा. शहर के मुकाबले 28*C कूल होगा लेकिन हम अपने शहर में, अपने घर में जितने ठंडे मौसम में रहते हैं, उतना ठंडा मौसम इन दिनों शिमला में नहीं है. और भीड़.… गज़ब की भई. माल रोड पर घूमना मुश्किल है. चल खुसरो घर आपने। पर शिमला का एक अपना ग्लैमर है जो अन्य किसी हिल स्टेशन का नहीं है. पहाड़ों की रानी अगर मसूरी है तो शिमला राजा।

मेरा पुत्र, मुझ गरीब माँ का बेटा, कभी शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढता था. आज शान से कहती हूँ, My son is a product of Bishop Cotton School, Shimla. (Shimla तब Simla लिखा जाता था. बोला हमेशा से 'शिमला' ही जाता है)

मेरे बेटे !
मैं अपनी ज़िन्दगी के विरोधाभासों की कहानी
तुझे अभी कैसे सुनाऊँ?
तू बहुत छोटा है.
नहीं समझेगा कि माँ का अकेलापन
जब-जब उसके समूचे व्यक्तित्व पर छा जाता है
तब-तब वह खुद को सँवारने की कोशिश में लग जाती है
और भीतर ही भीतर कहीं टूटती चली जाती है.

मैं लगभग हर सप्ताह शनिवार को रात बस से चल कर रविवार की सुबह शिमला पहुँचती थी, दिन भर बेटे के साथ माल रोड पर भटकती थी, रेस्त्रां में खाना खा कर किसी पार्क में बैठे रहते थे, नहीं होटल में नहीं रुकते थे, फिर शाम उसे हॉस्टल में छोड़ कर बस से दिल्ली के लिए रवाना होकर सोमवार की सुबह सीधे ऑफिस। स्कूल से स्पेशल परमीशन ली हुई थी हर सप्ताह मिलने की.

मेरे बच्चे !
जब मेरी आँखों में समुद्र उमड़ आया था
तब तेरी आँखें क्यों रीत गई थीं?
जब मैंने चुप्पियों को तोड़
तेरे साथ मिल कर चहचहाना चाहा था
तब तेरे होंठ क्यों सिल गए थे?
क्यों तू अपने नन्हे-मुन्ने साथियों को छोड़
मेरी गोद में सिमट आया था
और अनेक प्रश्न भरा चेहरा मेरे वक्ष पर रख
बिन कहे मुझसे अनेकों सवाल पूछ गया था?
क्या वे सब अर्थ जो मुझे निरर्थक बना गए थे
तुझमें से होकर भी गुज़रे थे?
मेरी पीड़ा तेरी पीड़ा बन गई थी.
बिना कहे भी कितना कुछ कह जाने वाली
तेरी छोटी-छोटी चमकदार आँखों का दर्द
मेरे उस दर्द से कितना बड़ा था
जो तुझसे छुपाना चाहते हुए भी मैंने
तुझे अपने से लिपटा कर
तेरी झोली में डाल दिया था.

एक बार उसके एक टीचर ने मुझसे कहा, 'मैं हैरान हूँ, आपने अपने बेटे को इस महँगे स्कूल में क्यों डाला? इस स्कूल का कोई भी बच्चा सरकारी अधिकारी का बच्चा नहीं है, सब बड़े बिज़नेसमैन, इंडस्ट्रियलिस्ट, फिल्म स्टार्स के बच्चे हैं. आप कैसे अफोर्ड करेंगी? आप निभा नहीं पाएँगी।' उन्होंने ही बताया कि फिल्म स्टार राज कपूर का बेटा ऋषि कपूर तथा अन्य बच्चे इसी स्कूल से पढ़े हैं. (शायद इसीलिए मैं आजतक नमक-अजवायन के पराँठे खुश होकर खाती हूँ.)

मेरे बेटे !
तेरे लिए अनेक सुखों के स्वप्न देखते हुए भी
तुझे अपने गहनतम दुःख का भागीदार
बना लेने के गुनाह के लिए
तेरी माँ तेरे आगे क्षमाप्रार्थी है.

बेटे का भाग्य प्रबल था. मुझे इस स्कूल का नाम तक पता नहीं था. (असल में कुछ मित्रों ने कहां था कि मैं हरवक्त ग़मगीन रहने के कारण अपने बच्चे की परवरिश सही नहीं कर पा रही हूँ, इसलिए उसे हॉस्टल में डालना बेहतर होगा।) मैं उसे शिमला के नज़दीक डगशाई के एक हॉस्टल में दाखिल करने गई थी लेकिन वहाँ का माहौल मुझे ठीक नहीं लगा, नया खुला था, बच्चे बहुत कम थे. हॉस्टल में दाखिल करने का आइडिया त्याग हम शिमला अपने एक सम्बन्धी के घर चले गए, यह सोच कर कि अगली सुबह वहाँ से दिल्ली की बस लेंगे। सम्बन्धी ने बताया, 'यहाँ एक अच्छा स्कूल है, बिशप कॉटन, थोड़ा महँगा है, आप चाहें तो पता कर लें.' अगले दिन दिल्ली आने की बजाय हम बिशप कॉटन पहुँचे, जैसे वे हमारे ही इंतज़ार में बैठे थे, उन्होंने तुरंत एडमिशन दे दिया (शायद कोई जगह खाली होगी). और फिर दिल्ली आकर उस स्कूल के आदेशों के अनुसार 12-12 स्कूल ड्रेसेज़, अण्डरवियर्स, 3 गर्म कोट, 1 गर्म नाइट गाउन तथा अन्य अनेक सामान तीन बड़े ट्रंकों में भर कर मैं अपने अकेले होने का इंतज़ाम कर आई.

दाखिले के बाद जब मैं पहली बार उसे मिलने गई तो स्कूल में बच्चों से पूछ रही थी कि मनीष कहाँ है? कि मैंने महसूस किया कि मेरे पीछे से कोई मेरी साड़ी का पल्लू खींच रहा है. मैंने एकाएकी पहचाना नहीं। उसके इतने खूबसूरत शैम्पू किए फ्लफी बालों को फ़ौज के जवानों के बालों की तरह क्रूकट कर दिया गया था. मेरे गले से लगते ही उसने पहला वाक्य बोला, 'मम्मा, अकेले रोना नहीं।'

मेरे बेटे !
क्या तुझे समझ में आती हैं वे सब बातें
जो मैं आँसुओं के रास्ते तुझ तक पहुँचाती हूँ?
सच बता, मैं तुझे कितना-कितना तड़पाती हूँ?
अपने नन्हे हाथों से मेरे आँसू पोंछते हुए
तू मेरा रक्षक बन जाता है.
पर यह मैंने तेरी दीये सी जलती आँखों में देखा है
कि मुझे हँसना सिखाते हुए
तू भीतर कितना रोया-तड़पा है
मुझे सँभालते हुए तू खुद कितना अकेला हो गया है
मेरे आँसू पोंछते हुए तूने
किस मुश्किल से अपनी आँखों को उमड़ने से रोका है
खिलौनों का मोह छोड़ तूने बहुत लगन से
अपनी माँ को टूटने से रोका है.
तेरा त्याग मेरे त्याग से कहीं बड़ा बन कर
मुझे नतमस्तक कर जाता है.

अपने अकेले होने का इंतज़ाम मैंने उसे बी ई करने के लिए पुणे इंजीनियरिंग कॉलेज भेजते हुए भी किया, लेकिन वह ज़रूरी था. उस समय मेरे पिता ने यह कहा था, 'कुछ पैसा अपने आगे के लिए भी रख. बच्चों का कोई भरोसा नहीं।' सच है, यह जीवन एक जुआ है, हम चाल कितनी भी दुरुस्त चलें, फिर भी हार की गुंजाइश बनी रहती है. मेरा सौभाग्य था कि मुझे अंत में जीत मिली।

मेरे बच्चे !
तेरी आँखों के जो कभी-कभी
बेहिसाब जिज्ञासा झिलमिलाने लगती है
उसे मैं किसी दोहरी नैतिकता का पाठ पढ़ाना नहीं चाहती।
मैं अपनी ज़िन्दगी को खुली किताब-सी
तेरे आगे रख देना चाहती हूँ
तू खुद उसे पढ़ना
और उसमें से अपने लिए
नीति वाक्य को तलाशना।


3 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संत वाणी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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