Wednesday, 27 May 2015

स्वीकारोक्ति

स्वीकारोक्ति

आज यूँ ही लगा कि इंसान के पास कितनी तरह के दुःख होते हैं, हर दुःख किसी एक कंधे पर सिर रख कर नहीं रोया जा सकता। हर व्यक्ति की सेंसिबिलिटी अलग होती है जो हमारे अलग-अलग मूड्स के साथ मैच करती है. यूँ ही आज मन है, अपने फेसबुक मित्रों को याद करने का. फेसबुक के अलावा इस वास्तविक संसार में मेरा बस परिवार मेरा मित्र है या मेरे कर्मचारी। परिवार में मैं बॉबी, बरखा और मनु से अपनी बात कह पाती हूँ. मनु के आगे, लगता है, दिल के सारे राज़ खोल कर रख दूँ. कर्मचारि सम्वेदनशील हैं, लेकिन उनके साथ दिल की बातें? कदापि नहीं। अपनी छोटी बहन बेबी से नियमित फ़ोन पर बात करती हूँ लेकिन उनकी सेंसिबिलिटी एकदम टिपिकल गृहस्थिनों वाली है जो मुझे सूट नहीं करती। मन की हर बात तो सम्बन्धियों से शेयर नहीं की जा सकती। मन के दुःख मित्रों से बाँटे जाते हैं. मित्र आप सब हैं लेकिन आप सब में से किसी-किसी से मैंने दुःख का कोई एकाध टुकड़ा बाँटा हो लेकिन पूरा मन किसी के आगे कभी खोल कर नहीं रखा. शायद कभी रख भी न पाऊँ। लेकिन सोच तो सकती हूँ कि किसके आगे खोल सकती हूँ?

एक दुःख मैं सुनीता दमयंती से बाँट सकती हूँ, वह बढ़िया सलाहकार है लेकिन दूसरों के पचड़ों में पड़ने से परहेज़ करती है.

उमा झुनझुनवाला से प्रेम के दर्द में मेरी सेंसिबिलिटी अत्यधिक मैच करती है, उनका ह्रदय बेहद सम्वेदनशील है, लेकिन मेरी कभी उनसे बात नहीं हुई, एक औपचारिक बात को छोड़ कर.

शैफाली मेरी बहुत अच्छी सहेली हैं, लेकिन उनके पास अपनी बातें इतनी हैं, कि वे दूसरे की क्या सुनें?

नादानियों के मामले में मैं खुद को मोनिका भारद्वाज के समकक्ष खड़ी पाती हूँ. मोनिका मेरी इस बात से दुखी हो सकती हैं कि वे तो नादान नहीं, पर मुझसे ऐसा ही सोचा गया.

सुबोध मित्तल बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता।

माँ सामता अपनी उलझनों में व्यस्त हैं.

इंद्रा रानी अपने आप में पूर्ण है या नहीं, लेकिन दिखती हैं.

कभी-कभी ऋचा विमल कुमार के कंधे पर सिर रख कर रोने का मन हुआ है लेकिन फिर लगा, बेचारी सुखी बच्ची को क्यों दुखी किया जाए? मेरे बहुत से दर्द तो उन्हें समझ ही नहीं आएँगे.

जया पांडे, जिनके घोर अपनत्व से मैं शुरू में ऊब-सी गई थी, इसके बावजूद उन्होंने मुझे सम्मान देना नहीं छोड़ा, दुःख-दर्द सुनाने के मामले में जया मुझे अपने सबसे करीब लगती हैं, अगर वे मेरे नज़दीक रह रही होतीं तो हम एक-दूसरे को अपनी कहानियाँ सुना-सुना कर रात-दिन रो रहे होते, क्योंकि उनके पास भी बहुत दर्द हैं, मेरे पास भी.

अन्य सब सखियाँ भी बहुत भली हैं, मुझसे सभी का स्नेह है, सभी मेरा आदर-मान करती हैं.

पुरुष मित्रों से अपने दुःख-दर्द बाँटना मुझे उचित नहीं लगता क्योंकि दुःख-दर्द बँटते ही करीबी आ जाती है, जिसके कारण नए दुःख-दर्द पैदा होने की सम्भावना बन जाती है. फिर भी पुरुष मित्रों के बारे में कहूँ तो……

ध्रुव गुप्त के साथ अपनेपन का एक झीना सा सूत्र महसूस होता है. फेसबुक पर आने के बाद से मित्र हैं, शायद इसलिए।

आलोक मिश्र अत्यंत भावुक है. उसके पास अपनी कहने और मेरी सुनने के लिए ढेर सारा वक़्त है लेकिन मेरी अपनी अक्षमता, ज़्यादा बातों से मैं थक जाती हूँ.

सौरभ द्विवेदी मुझे शुरू में कुछ दीवाना सा, कुछ बदहवास सा लगा था, मैं उनकी बातों से बोर भी हो गई थी लेकिन सौरभ ने अपने को सँभाला। फिर मेरे प्रति उनका आदरभाव कभी कम नहीं हुआ, कभी उन्हें क्रोध नहीं आया. और बाद में जो मैंने उनमें प्रतिभा देखी, मैं चकित रह गई. उनके भीतर शब्दों और विचारों का लावा भरा है, जो फेसबुक पर निरंतर बह रहा है. सौरभ प्रतिभाशाली हैं, उन्हें शुरू में जिस दुःख ने तोडा था, शायद वही दुःख उनके लिए आगे बढ़ने में प्रेरक सिद्ध हुआ. इसीलिए मैं कहती हूँ, दुःख कभी खाली नहीं जाता, हमें बहुत कुछ देकर जाता है.

आलोक शर्मा के आदर भाव से मैं अभिभूत हूँ.

सुभाष ओझा के विनम्र अपनत्व के प्रति कृतज्ञ हूँ.

राघवेन्द्र अवस्थी (चाहे बुरा मानें) मुझे बहुत लाउड लगते हैं, फिर भी उन्होंने माते सुबोध मित्तल की संगति में बहुत तरक्की की है. मेरे और राघव के बीच छेड़छाड़ का सिलसिला बरकरार है.

भगवंत अनमोल घनघोर आत्म मुग्ध बालक है.

सोमेश चन्द्र ककड़ घनघोर आत्ममुग्ध परिपक्व पुरुष हैं.

संजय कुमार शुक्ला में गज़ब की समझ है. उनके अपनेपन के आगे द्रवित हूँ. कई बार सोचती हूँ कि संजय के 'सच' को मैंने क्यों सराहा? कई सच स्वीकार करने योग्य नहीं होते। पर शायद उनके 'सच' से ज़्यादा उनके जीवन के चमत्कार ने मुझे प्रभावित किया।

डा. एस के सिंह, लगता है, खामोशी से काम कर रहे हैं.

अनिल उपाध्याय ने मुझे Mother Dairy के Nutrifit से परिचय कराया, बेक्ड समोसे के बारे में बताया, दोनों के रसास्वादन से मैं लाभान्वित हुई.

अरे हाँ, अरुण मिश्रा, भई मैं आपको कैसे भूल सकती हूँ? मैं फेसबुक पर आपकी एकमात्र दोस्त जो हुई, बाकी सब तो बहनें-माताएँ हैं.

बाकी के बारे में फिर कभी. सच कहूँ तो जितना आदर मुझे फेसबुक पर मिला, उतना कहीं नहीं, कभी नहीं।

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