Sunday, 31 May 2015

Gazal 47

Gazal 47

मैंने जो अपना तुझे समझा हुई मुझसे खता.
करूँ तो क्या करूँ अब आके मुझे तू ही बता.

मैं अपनी चंद सी खुशियों के साथ खुश हूँ बहुत
तू मुझे और भी खुश होने के सपने ना दिखा.

कभी खामोशी की सुभाषा को भी सुन लिया कर
कसमे-वादों की झूठी फ़ालतू झड़ी ना लगा.

क्यों तेरे साथ खड़ा हो के ज़माने को दिखूँ?
तू मुझे मंच पर अब बार-बार यूँ ना बुला.

मुझे बेरंग किया तूने मेरे रंग छीन कर
चिढ़ा-चिढ़ा के मुझे रंगों का उत्सव ना मना.

मैंने छोड़ा है तुझे कि तूने छोड़ा है मुझे
दोनों बातों में कोई फर्क कहाँ, यह तो बता.

कि मेरे पास बहाने बहुत हैं जीने को
तू बता, मेरे बिना कैसे जिएगा भला?


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