Sunday, 24 May 2015

वह आया था Kavita 234

वह आया था

वह आया था
उसने क्या अभिनय किया था !
हम आजतक उसके हुनर की दाद देते हैं।

हम उसके झूठ में इतना खोए
कि यह हमें बहुत बाद में पता चला
कि हमारे साथ सच में क्या से क्या हो गया !

वह पिंजरे में बंद होकर भी
पंख इस अदा से फड़फड़ाता था
कि आज़ाद उड़ने वाले शर्म से पानी-पानी हो जाऍं।

ऊँची छलाँग लगाने का जज़्बा
उसमे कूट-कूट कर भरा था
उठ-उठ कर गिरना पर उसकी नियति में लिखा था।

कुछ तो ख़ास था उसमें
हम जैसों को बहकाने के लिए
वर्ना हम कोई पागल नहीं जो बेवजह बहक जाऍं।

नहीं, अब वह हमें याद नहीं आता
याद आते हैं उसके ड्रामे
जिन पर हमने जम कर तालियों बजाई थीं।

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