Sunday, 28 June 2015

मेरे साथ Kavita 236

मेरे साथ

मेरी बहुत सारी कविताएँ वक़्त के साये में गुम हो गईं. मेरी बहुत सी ऐसी कविताएँ हैं जो न तो मेरे तीन कविता संग्रहों में संकलित हैं, न ही कहीं और लिखी हुई मेरे पास हैं. मेरी एक प्रिय कविता की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद हैं, शब्दों से बचो, ख़ामोशी की कविता रचो, यह छापी थी, कन्हैया लाल नंदन जी ने उस अखबार में जिसके वे संपादक थे, शायद 1990 के बाद किसी समय. मैं अपने लेखन के प्रति बड़ी ही गैरजिम्मेदार रही और कुछ संभाल कर न रख सकी, क्योंकि मुझे अजीब सा वैराग्य हो गया हो गया था, मेरे दिल में लेखिका के रूप में कोई यश कमाने की अभिलाषा नहीं थी और मैंने सोचा था कि मैंने दुनिया छोड़ दी है. यह ख्याल भी नहीं आया था कि मुर्दे अर्थी से भी ज़िन्दा उठ खड़े होते हैं. सो एक दिन मैं मृत्यु शैया से उठ खड़ी हुई। कुछ दिन पूर्व लेखिका उषा भटनागर, जो मुंबई से मेरी मित्र बनीं और यहाँ फेसबुक पर बरसों बाद मिलीं, ने मुझे मेरी एक कविता भेजी जो, उन्होंने बताया, 'हंस' पत्रिका में बीस साल पहले छपी थी. कविता नीचे दे रही हूँ. मैं हैरान हूँ, आप भी हैरान होंगे कि राजेन्द्र यादव जी जैसे विद्वान संपादक ने इस घटिया कविता को 'हंस' में कैसे स्थान दिया?

मेरे साथ

पुत्र !
तू क्यों नही सीखता
मॉ के बिना जीना?
क्यों बँधा रहता है हर वक़्त
मॉ के पल्लू के साथ?
तूने कर दिया
अपने जीवन का दान
मॉ के नाम।
नही अच्छी लगती तुझे
किसी के भी हाथ की बनाई हुई रोटी
मातृसेवा परमोधर्म
का व्रत तूने अपनाया है।
तू इस मोह से मुक्त नही हो पाता
कि मॉ बोलती रहे
और तू सुनता रहे
मॉ के जीवन की कहानियाँ।
आख़िर मॉ कब तक बोलती रहेगी बेटे !
अपने को मुक्त कर
अपना मोह कहीं और जगा
वरना तू कैसे जी पायेगा?
मेरे मरने के साथ
कैसे कहूँ
भीतर कही तू भी
.......
अशुभ मत बोलो.

Saturday, 20 June 2015

ऋचा विमल कुमार

ऋचा विमल कुमार

वाह, मेरे फेसबुक मित्रों ! यदि इसी तरह से आप मेरी शॉप पर आकर मेरी सेल करवाते रहे तो मेरे वारे न्यारे। या कहूँ, मैं आप पर वारी वारी। कुछ दिन पूर्व रोहित रहस्य आए थे और कुछ गिफ्ट आयटम खरीद कर ले गए थे लेकिन मैं उन्हें मिल नहीं सकी थी क्योंकि मैं नॉएडा से बाहर थी. श्री ध्रुव गुप्त भी मेरी दुकान से खरीद चुके हैं. अनेक मित्रों ने मुझसे Online shopping की. कल सुबोध मित्तल आई ही थीं. आज झारखंड की ऋचा विमल कुमार आई थीं. इन दिनों वे नॉएडा में हैं, इससे पूर्व ये मुझसे Online खरीद चुकी है. आज ये बस जल्दी-जल्दी में आईं, समझो तूफ़ान की तरह आईं और कुछ देर में ही खरीदारी करके तूफ़ान की तरह लौट गईं, फिर आने का वादा करके। ऋचा गज़ब की खूबसूरत और स्मार्ट हैं, फेसबुक पर अपनी पोस्ट्स में जितनी चुलबुली नज़र आती हैं, उससे कहीं ज़्यादा चंचल हैं. माशा अल्लाह ऋचा, तुम्हारी खूबसूरती को मेरी नज़र न लगे. उनकी बेटी ने यह फोटो ली, जिसमें उनकी नॉएडावासी भाभी हमारे साथ खड़ी हैं. ओफ्फो ! मैं ऋचा को अपना हाथ दिखाना तो भूल ही गई. साहब ये प्रोफेशनल ज्योतिषी हैं. मैं आज़मा चुकी हूँ. क्या कमाल का हॉरोस्कोप (जन्मपत्री) पढ़ती हैं. जो अपनी जन्मपत्री इन्हें दिखाना चाहें, दिखा सकते हैं, फीस भी ज़्यादा नहीं है, केवल 1001/- रुपये में आप पूरे जीवन का हाल जान लीजिए. मुझसे सिफारिश की तो मैं थोड़ा कम भी करवा दूँगी। क्यों ऋचा, सही है ना?


Friday, 19 June 2015

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल दो या तीन साल से मेरी फेसबुक मित्र हैं. मैंने उन्हें मित्र बनाते समय पूछा था कि आप पुरुष हैं तो आपने महिला का चित्र अपनी प्रोफाइल पिक्चर के रूप में क्यों लगाया हुआ है? (ऐसे ही मुझे प्रभात समीर, विनय पँवर नाम की महिला मित्रों के प्रति भ्रम हुआ था.) सुबोध ने कहा था, वह महिला ही हैं, नाम चाहे सुबोध है. मैंने फेसबुक पर हमेशा उन्हें ज्ञानवान, बहसीली, तर्कप्रिय और ठहाके लगाते हुए पाया। उनकी टाइमलाइन पर उनके फोटोज़ में हमेशा उन्हें भीड़ में घिरे पाया। कभी उन्होंने फेसबुक मित्रों को इकट्ठा करके पिकनिक मनाईं, कभी get-together किए. पति के रिटायर होने के बाद वे मेरे नॉएडा के नज़दीक इन्दिरापुरम में आकर बस गईं हैं, वहाँ एक contributory get-together में उन्होंने मुझे आमंत्रित किया कि मेरा contribution वे दे देंगी। Contribution की मुझे क्या परवाह लेकिन मैं भीड़-भड़क्कों से घबराती हूँ. मैं नहीं गई. फिर उन्होंने कई बार मिलना चाहा, मैं भी मिल सकती थी लेकिन उनके इर्द-गिर्द की भीड़ को देख कर उनसे मिलने का कभी मन नहीं हुआ. मुझे लगा, उन्हें बहुत हलचल पसंद है और मैं एकांतप्रिय। उनका और मेरा कोई मेल नहीं। अभी कुछ दिन पूर्व मैंने, दिल के दर्द किस मित्र के साथ बाँटे जा सकते हैं, इस विषय पर पोस्ट लिखी थी, जिसमे सुबोध के बारे लिखा था कि Subodh Mittal बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता। उन्होंने कमेंट में लिखा था, 'मनिका जी ! ये मस्तमौलापन आंसुओं की कीमत पहचान लेने के बाद ही आया है |' कई बार क्लिक करने के लिए कोई एक बात काफी होती है. उनकी इस बात ने मुझे कहीं छुआ, और उसके बाद कई बार मेरी बात उनसे मैसेज बॉक्स और फ़ोन पर हुई तो लगा कि उनके घर-गृहस्थन, मिलनसार, हँसमुख महिला होने के पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो मुझ जैसी एकाकीमना, किसी से न मिलने की शौक़ीन को उनके प्रति आसक्त बना सकता है. वे आज मेरे घर अपने पति के साथ आईं. जैसी फेसबुक पर नज़र आती हैं, उससे एकदम अलग, पतली, छरहरी, हँसमुख तो खैर हैं ही, उनसे मिल कर दूसरा भी मस्त-मौला हो जाए. मैंने कभी सुबोध से इतनी बात कहने-सुनने की कल्पना नहीं की थी, जितनी आज कह-सुन ली. फिर उन्होंने मेरी दुकान पर जाना चाहा। शाम हो गई थी. मैंने कहा, रहने दें, फिर कभी दुकान पर आ जाइए। बोलीं, 'नहीं, अभी चलना है.' (शरीफ मित्र मेरी दुकान से कुछ न कुछ खरीदते हैं, चाहे आकर खरीदें, चाहे कूरियर से मंगवाएँ। सॉरी।) दुकान से उन्होंने कुछ ड्रेसेज़ खरीदीं. देखिए, सफ़ेद प्लाजो के ऊपर काले टॉप में वे कितनी फिट लग रही हैं.




Monday, 8 June 2015

मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी

मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी

मनु पर लिखी यह कविता गीत 'बन्नो तेरी अंखियाँ सुरमेदानी' की तर्ज़ पर है, जो मनु के बहाने से समस्त किशोरी लड़कियों को सम्बोधित है।

मन्नो तेरा मुखड़ा चाँद सा रे
मन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी।

मन्नो तेरा नखरा प्यारा लागे
मन्नो तेरी ज़िद है दिल लुभानी।

मन्नो तेरे सपने बेहिसाबी
मन्नो तेरा उड़ना आसमानी।

मन्नो तेरे दिल का जोश वाह-वाह
मन्नो है यह दुनिया शातिरानी।

मन्नो तेरी बतियाँ रस भरी री
मन्नो तुझ पर मैं मर-मर जानी।

मन्नो तेरा दिल है भोला-भाला
मन्नो ज़रा रखियो सावधानी।

मन्नो यह जिंदड़ी टेढ़ी-मेढ़ी
मन्नो यहाँ हर पल है हैरानी।

मन्नो यह दिल है बड़ा फरेबी
मन्नो मत करियो तू नादानी।

मन्नो तेरी मस्ती छल-छल छलके
मन्नो तेरी अल्हड़ सी रवानी।

मन्नो बस पर्दा लाज का रे
मन्नो तू रखियो आँख में पानी।

मन्नो तुझे हर पल जीतना है
मन्नो तू लिखियो ख़ास कहानी।

मन्नो तेरा सुन के अच्छा-अच्छा
मन्नो तेरे अपने सब गर्वानी।

Thursday, 4 June 2015

बेपेंदी का लोटा

बेपेंदी का लोटा

GIP Mall में, Crazy Noodles रेस्टॉरेंट में पानी पीने के लिए जो शीशे के गिलास मेज़ पर रखे थे, उनका नाम था Crazy Glass. उनके नीचे पेंदे में एक गोल गुम्बद था जिसके कारण वे गिलास खड़े नहीं हो पा रहे थे, कभी इधर झुक रहे थे, कभी उधर, यानि इधर-उधर लुढ़के-लुढ़के जा रहे थे. हमें बड़ी हँसी आई, कहीं इनमे से पानी गिर न पड़े लेकिन पानी नहीं गिरा। गिलास आधा भरा था. रेस्टॉरेंट वाले गिलास बेच भी रहे थे, एक गिलास का मूल्य 200 रुपये और 5 गिलास के साथ एक गिलास फ्री यानि 1000 रुपये में 6 गिलास। हम भी बड़े Crazy Buyer हैं, जहाँ भी कोई ऊटपटाँग सी चीज़ नज़र आती है, खरीद लेते हैं, घर में काम आए तो आए अन्यथा Retail में लाई हुई चीज़ को दुकान में रख कर Retail में बेच लेते हैं, 200 की लाए हैं तो 100 की तो बिक ही जाएगी, हाहा, या किसी को गिफ्ट कर देते हैं. बस खरीदने का शौक है. पर उस दिन नहीं खरीदे। तनु-मनु फिल्म के लिए देर हो रही थी, किसी तरह जल्दी-जल्दी खाना खाया था. सोचा, दोबारा तो यहाँ आना ही है, फिर खरीद लेंगे। पर साहब, उन गिलासों को देख कर कहावत 'बेपेंदी का लोटा' साकार हो गई. अब तक यह नहीं पता था कि बेपेंदी का लोटा होता कैसा है? उस दिन जैसे आँखों के आगे चित्र सा खिंच गया. तो बेपेंदी के लोटे-लुटिया ऐसे होते हैं? इस कहावत से ये शब्द ध्यान में आते थे कि जो इधर-उधर लुढ़कता रहे, वह बेपेंदी का लोटा। उस दिन ये अर्थ भी सामने आए कि जो कभी इधर झुके, कभी उधर झुके, वह बेपेंदी का.होता हैं, सच में कुछ लोग होते हैं, जो बेपेंदी के होते हैं. यहाँ फेसबुक पर भी हैं कई ऐसे लोटे-लुटिया हैं, जो पक्ष के कमेंट को भी लाइक करते हैं और विपक्ष के कमेंट को भी. यहाँ एक सज्जन ऐसे ही थे, जो मेरी पोस्ट की प्रशंसा में आए कमेंट को फटाक से लाइक करते थे तथा उतने ही फटाक से उस पोस्ट की आलोचना में आए कमेंट को लाइक करते थे. मुझे उन्हें अनफ्रेंड करना पड़ा. कारण? मैं भई उसूलों वाली बंदी हूँ. उनका कोई एक मत नहीं, एक दृष्टिकोण नहीं। बंधुवर ! किसी एक जगह तो टिको। यह क्या कि चित भी अपनी, पट भी अपनी। तो जी, ऐसे बेपेंदी के लोटे बड़े खतरनाक होते हैं. आप उनका भरोसा नहीं कर सकते। आप उनसे बस यह अनुरोध कर सकते हैं कि महानुभावों, अपनी पेंदी लगवा लो, ताकि एक जगह जम के खड़े हो सको. इधर-उधर लुढ़कने में क्या रखा है?

Wednesday, 3 June 2015

कथाकार शिवमूर्ति

कथाकार शिवमूर्ति
(अखबार 'अमर उजाला' के 3 जून के अंक के हवाले से)

डा. शकुंतला मिश्रा पुनर्वास विश्विद्यालय में 65 वर्षीय कथाकार शिवमूर्ति ने एम ए हिंदी में प्रवेश के लिए फॉर्म भरा है. इसी यूनिवर्सिटी के एम ए के कोर्स में उंनकी कहानी 'तिरिया चरित्तर' पढ़ाई जाती है, जिस पर नसीरुद्दीन शाह एवं ओम पुरी अभिनीत फिल्म बनाई जा चुकी है. तो अब शिवमूर्ति भाय एम ए में अपनी लिखी कहानी पढ़ेंगे और उस पर प्रश्नोत्तर तैयार करके परीक्षा भी देंगे। शिवमूर्ति जी का कहना है कि उन्होंने बी ए ज़रूर किया है लेकिन यूनिवर्सिटी वह पहली बार जाएँगे। उनके बच्चे बड़े हो चुके हैं, सेटल हो गए हैं, इसलिए उन्हें लगा कि आगे और पढ़ाई पढ़ लेनी चाहिए। बधाई हो, शिवमूर्ति भाय, आप सफल हों, अन्य बंधुगण आपसे प्रेरणा लें. (एक बात इस सन्दर्भ से हट कर कि मैंने 'तिरिया चरित्तर' कहानी की समीक्षा की थी जो कहीं छपी भी थी, और मेरे निबंध संग्रह 'प्रसंगवश' में संकलित है. कभी यहाँ डाल दूँगी। भाय शब्द का प्रयोग शिवमूर्ति ने इस कहानी में किया है, ख़ास मित्र के अर्थ में)


Tuesday, 2 June 2015

Film : Tanu weds Manu Return

Film : Tanu weds Manu Return

सब यह कहते हैं, अंततः अच्छाई और सचाई की जीत होती है, बुराई और झूठ की हार. अच्छाई चरित्र और स्वभाव के साथ नहीं, बल्कि क्या सिर्फ इस सच के साथ जुडी होती है कि दो व्यक्ति पति-पत्नी हैं, इसलिए उनके रिश्ते को जीतना ही जीतना है, चाहे उसने बुराई की कितनी हदें पार कर ली हों? यह घटिया कहानी है, Tanu weds Manu Return की. Absurd & Unacceptable. यह फिल्म बनाने वाले भी आधुनिक बनने के चक्कर में घटिया हो गए हैं. इन्होने नायिका तनु (कंगना रनौत) को एक आधुनिक महिला के रूप में गढ़ना चाहा लेकिन फुस्स होकर रह गए. तनु कानपुर के एक अत्यंत साधारण मोहल्ले में, अत्यंत साधारण परिवार की उपज है, शायद इसीलिए वह स्वच्छंदता की हद तक स्वतंत्र है. छोटे घरों की लड़कियाँ जल्दी बड़ा होना चाहती हैं, शायद यह मानसिकता इस चरित्र को गढ़ने के पीछे रही हो. क्योंकि वे स्पष्ट रूप से गरीब और पिछड़े हुए दकियानूसी परिवार को बिलॉंग करती हैं, और स्त्री की आज़ादी की माँग के चलते उन्हें स्वयं को इस दाग-धब्बे से दूर करना है, इसलिए वे सजग रूप से हर कदम वह उठाती हैं, जो उन्हें आधुनिकता के दायरे में रख सके. मोहल्ले के लड़कों के साथ खुले प्रेम-सम्बन्ध बनाना, शराब पीना, ये लक्षण आज लड़कियों को आधुनिकता में घुसने के सरल तरीके लगते हैं, जबकि उनका जीवन निभता एक शरीफ आदमी के साथ ही है. तनु का विवाह मनु नाम के डॉक्टर (माधवन) से होता है और वे दोनों लंदन में रहने लगते हैं. माधवन सुपर्ब लगे. डॉक्टर पति के व्यस्त रहने और रोमैंटिसिज़्म से दूर रहने के कारण घरेलु पत्नी तनु उसे पागलखाने तक भिजवा देती है, अपने देश यानि अपने पिछड़े मोहल्ले में वापस लौटती है, लौटने के साथ ही उसके पुराने प्रेमी उभर कर सामने आते हैं, जिनमे एक रिक्शावाला भी है. वह विवाह से तुरंत पूर्व के प्रेमी से रिश्ता जोड़ने की उम्मीद में मिलती है लेकिन वह बताता है कि एक अन्य लड़की से शादी करने वाला है और तनु लौट कर अपने पति के पास आना चाहती है जो अब तक लंदन के पागलखाने से छूट कर उसी मोहल्ले के अपने घर में आ चुका होता है. कहीं और बात जमी नहीं तो पति तो है ही बेचारा, जिसे इमोशनली ब्लैकमेल करके फिर से फँसा लिया जाता है. दर्शक इसे पति-पत्नी के बीच का पुनर्मिलन और हैप्पी एंडिंग की कहानी समझ कर खुश है. लानत है ऐसे पुनर्मिलन पर. लेकिन कहानी का अंत वास्तव में दुखद है क्योंकि फिल्म में असली नायिका तनु नहीं, कुसुम (कंगना रनौत का डुप्लीकेट रूप) है जिसकी एंट्री कहानी के बीच में होती है, जो एक सकारात्मक चरित्र है, गाँव की भाषा बोलने वाली एक सीधी-सादी लड़की है, जिसमे नायक अपनी पत्नी तनु की झलक पाकर आकर्षित होता है और उसके साथ विवाह की वेदी तक पहुँच जाता है. पर तनु के वहाँ जमी रहने के कारण वह रिश्ता टूटता है. कुसुम टूटना सहर्ष स्वीकार करती है लेकिन अकेले में उसके दिल का दर्द आँसुओं में बहता है. एक दृश्य में जब तनु उसके गंवारपन पर हँसती है, तब वह गाँव की लड़की कुसुम उसे क्या दो-टूक जवाब देती है कि तुम डॉक्टर के पैसे पर पल रही हो, मैं खुद कमाती हूँ, तुम रिश्तों की अहमियत क्या समझो आदि आदि. मेरे विचार में, न हर पति इस काबिल होता, न हर पत्नी इस काबिल होती कि सिफ हैप्पी एंडिंग की नियत से दोबारा रिश्ता जोड़ा जाए.
 

Monday, 1 June 2015

राघवेन्द्र अवस्थी

राघवेन्द्र अवस्थी

फेसबुक पर  एक मित्र हैं, राघवेन्द्र अवस्थी। अपने लगभग 5000 मित्रों की मंडली में खासे लोकप्रिय हैं. उनका कहना है कि वे मेरा बहुत सम्मान करते हैं और मेरी किसी बात का बुरा नहीं मानते, न मानेंगे। तीन-चार साल से मित्र हैं, जिसमे से अपने बड़बोलेपन के कारण दो बार अनफ्रेंड हो चुके हैं, कुछ म्यूच्यूअल फ्रेंड्स की सिफारिश पर तीसरी बार मित्र बने हैं. शायद अब अनफ्रेंड न करना पड़े. ऐसों को भी निभा लो मणिका, ऐसों को भी निभा लो.

लगभग तीन साल पहले राघवेन्द्र ने अपने डॉगी के साथ अपनी एक फोटो डाली थी और बताया था कि उसका नाम बूज़ो है, तब मैंने उन्हें यह मैसेज किया था : जब आपने अपने डॉगी का नाम बूज़ो लिखा तो मेरा ध्यान इस बात की ओर गया कि मेरे एक परिचित के डॉग का नाम भी बूज़ो है, पत्नी का नाम अर्चना, तथा उनके नाम का पहला अक्षर र है. मेरा ऐसी बातों की तरफ ध्यान जाता है कि इतनी समानताएँ किन्हीं दो व्यक्तियों में हैं तो क्यों हैं? इसीलिए मैंने आपका Year of birth पूछा।' (वह आपसे 8 साल छोटा है। )

मुझे यह साम्य बहुत कमाल का लगा था, मेरे एक अंतरंग मित्र और राघवेन्द्र में. दोनों का नाम R र से शुरू होता है, दोनों की पत्नी का नाम अर्चना (उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था, He was a widower), और दोनों के डॉगी का नाम बूज़ो।' इन दिनों जब मेरी पोस्ट पर किसी कारण से राघवेन्द्र एक 'हल्ला बोल' खेल में शामिल हुए तो कुछ और साम्य देखने में आए, कि राघवेन्द्र मेरे मित्र की ही तरह बेहद बातूनी, हाजिरजवाब, कविताओं पर तुरन्त अपनी कविता लिखना, अपने को बहुत चतुर समझना, हर समय कन्याओं से घिरे रहने का शौक, यह अहंकार कि मैं इतना बढ़िया हूँ कि हर कोई मुझे पसंद करेगा ही करेगा (करेगी ही करेगी), कुछ-कुछ पागल सा, दीवाना सा, पर साफ़ दिल, भोला बच्चा जैसे, जो हर वक़्त यह विश्वास दिलाए कि हमसे ज़्यादा बड़ा उसका कोई अपना नहीं, शुभचिंतक नहीं, जो रोज़ गलती करे, जिसकी हर गलती पर माफ़ करने को दिल चाहे।

पर आखिर कोई कब तक माफ़ करे? मैंने अपने अंतरंग मित्र से मुक्ति पाई, जो मेरे लिए बहुत कठिन काम था, पर करना पड़ा. रिश्ते तोडना आसान नहीं, दिल टूटते हैं. लेकिन इन दिनों अनेक बार इस बात पर हैरान हुई कि भगवान ने एक जैसे दो रॉटन पीस Rotten Piece कैसे बनाए? और क्यों बनाए? सॉरी राघव। आय'म वेरी सॉरी।