Friday, 19 June 2015

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल

सुबोध मित्तल दो या तीन साल से मेरी फेसबुक मित्र हैं. मैंने उन्हें मित्र बनाते समय पूछा था कि आप पुरुष हैं तो आपने महिला का चित्र अपनी प्रोफाइल पिक्चर के रूप में क्यों लगाया हुआ है? (ऐसे ही मुझे प्रभात समीर, विनय पँवर नाम की महिला मित्रों के प्रति भ्रम हुआ था.) सुबोध ने कहा था, वह महिला ही हैं, नाम चाहे सुबोध है. मैंने फेसबुक पर हमेशा उन्हें ज्ञानवान, बहसीली, तर्कप्रिय और ठहाके लगाते हुए पाया। उनकी टाइमलाइन पर उनके फोटोज़ में हमेशा उन्हें भीड़ में घिरे पाया। कभी उन्होंने फेसबुक मित्रों को इकट्ठा करके पिकनिक मनाईं, कभी get-together किए. पति के रिटायर होने के बाद वे मेरे नॉएडा के नज़दीक इन्दिरापुरम में आकर बस गईं हैं, वहाँ एक contributory get-together में उन्होंने मुझे आमंत्रित किया कि मेरा contribution वे दे देंगी। Contribution की मुझे क्या परवाह लेकिन मैं भीड़-भड़क्कों से घबराती हूँ. मैं नहीं गई. फिर उन्होंने कई बार मिलना चाहा, मैं भी मिल सकती थी लेकिन उनके इर्द-गिर्द की भीड़ को देख कर उनसे मिलने का कभी मन नहीं हुआ. मुझे लगा, उन्हें बहुत हलचल पसंद है और मैं एकांतप्रिय। उनका और मेरा कोई मेल नहीं। अभी कुछ दिन पूर्व मैंने, दिल के दर्द किस मित्र के साथ बाँटे जा सकते हैं, इस विषय पर पोस्ट लिखी थी, जिसमे सुबोध के बारे लिखा था कि Subodh Mittal बड़ी मस्त मौला हैं, उनके साथ मिल कर ठहाके लगाए जा सकते हैं, रोया नहीं जा सकता। उन्होंने कमेंट में लिखा था, 'मनिका जी ! ये मस्तमौलापन आंसुओं की कीमत पहचान लेने के बाद ही आया है |' कई बार क्लिक करने के लिए कोई एक बात काफी होती है. उनकी इस बात ने मुझे कहीं छुआ, और उसके बाद कई बार मेरी बात उनसे मैसेज बॉक्स और फ़ोन पर हुई तो लगा कि उनके घर-गृहस्थन, मिलनसार, हँसमुख महिला होने के पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो मुझ जैसी एकाकीमना, किसी से न मिलने की शौक़ीन को उनके प्रति आसक्त बना सकता है. वे आज मेरे घर अपने पति के साथ आईं. जैसी फेसबुक पर नज़र आती हैं, उससे एकदम अलग, पतली, छरहरी, हँसमुख तो खैर हैं ही, उनसे मिल कर दूसरा भी मस्त-मौला हो जाए. मैंने कभी सुबोध से इतनी बात कहने-सुनने की कल्पना नहीं की थी, जितनी आज कह-सुन ली. फिर उन्होंने मेरी दुकान पर जाना चाहा। शाम हो गई थी. मैंने कहा, रहने दें, फिर कभी दुकान पर आ जाइए। बोलीं, 'नहीं, अभी चलना है.' (शरीफ मित्र मेरी दुकान से कुछ न कुछ खरीदते हैं, चाहे आकर खरीदें, चाहे कूरियर से मंगवाएँ। सॉरी।) दुकान से उन्होंने कुछ ड्रेसेज़ खरीदीं. देखिए, सफ़ेद प्लाजो के ऊपर काले टॉप में वे कितनी फिट लग रही हैं.




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