Thursday, 4 June 2015

बेपेंदी का लोटा

बेपेंदी का लोटा

GIP Mall में, Crazy Noodles रेस्टॉरेंट में पानी पीने के लिए जो शीशे के गिलास मेज़ पर रखे थे, उनका नाम था Crazy Glass. उनके नीचे पेंदे में एक गोल गुम्बद था जिसके कारण वे गिलास खड़े नहीं हो पा रहे थे, कभी इधर झुक रहे थे, कभी उधर, यानि इधर-उधर लुढ़के-लुढ़के जा रहे थे. हमें बड़ी हँसी आई, कहीं इनमे से पानी गिर न पड़े लेकिन पानी नहीं गिरा। गिलास आधा भरा था. रेस्टॉरेंट वाले गिलास बेच भी रहे थे, एक गिलास का मूल्य 200 रुपये और 5 गिलास के साथ एक गिलास फ्री यानि 1000 रुपये में 6 गिलास। हम भी बड़े Crazy Buyer हैं, जहाँ भी कोई ऊटपटाँग सी चीज़ नज़र आती है, खरीद लेते हैं, घर में काम आए तो आए अन्यथा Retail में लाई हुई चीज़ को दुकान में रख कर Retail में बेच लेते हैं, 200 की लाए हैं तो 100 की तो बिक ही जाएगी, हाहा, या किसी को गिफ्ट कर देते हैं. बस खरीदने का शौक है. पर उस दिन नहीं खरीदे। तनु-मनु फिल्म के लिए देर हो रही थी, किसी तरह जल्दी-जल्दी खाना खाया था. सोचा, दोबारा तो यहाँ आना ही है, फिर खरीद लेंगे। पर साहब, उन गिलासों को देख कर कहावत 'बेपेंदी का लोटा' साकार हो गई. अब तक यह नहीं पता था कि बेपेंदी का लोटा होता कैसा है? उस दिन जैसे आँखों के आगे चित्र सा खिंच गया. तो बेपेंदी के लोटे-लुटिया ऐसे होते हैं? इस कहावत से ये शब्द ध्यान में आते थे कि जो इधर-उधर लुढ़कता रहे, वह बेपेंदी का लोटा। उस दिन ये अर्थ भी सामने आए कि जो कभी इधर झुके, कभी उधर झुके, वह बेपेंदी का.होता हैं, सच में कुछ लोग होते हैं, जो बेपेंदी के होते हैं. यहाँ फेसबुक पर भी हैं कई ऐसे लोटे-लुटिया हैं, जो पक्ष के कमेंट को भी लाइक करते हैं और विपक्ष के कमेंट को भी. यहाँ एक सज्जन ऐसे ही थे, जो मेरी पोस्ट की प्रशंसा में आए कमेंट को फटाक से लाइक करते थे तथा उतने ही फटाक से उस पोस्ट की आलोचना में आए कमेंट को लाइक करते थे. मुझे उन्हें अनफ्रेंड करना पड़ा. कारण? मैं भई उसूलों वाली बंदी हूँ. उनका कोई एक मत नहीं, एक दृष्टिकोण नहीं। बंधुवर ! किसी एक जगह तो टिको। यह क्या कि चित भी अपनी, पट भी अपनी। तो जी, ऐसे बेपेंदी के लोटे बड़े खतरनाक होते हैं. आप उनका भरोसा नहीं कर सकते। आप उनसे बस यह अनुरोध कर सकते हैं कि महानुभावों, अपनी पेंदी लगवा लो, ताकि एक जगह जम के खड़े हो सको. इधर-उधर लुढ़कने में क्या रखा है?

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