Tuesday, 2 June 2015

Film : Tanu weds Manu Return

Film : Tanu weds Manu Return

सब यह कहते हैं, अंततः अच्छाई और सचाई की जीत होती है, बुराई और झूठ की हार. अच्छाई चरित्र और स्वभाव के साथ नहीं, बल्कि क्या सिर्फ इस सच के साथ जुडी होती है कि दो व्यक्ति पति-पत्नी हैं, इसलिए उनके रिश्ते को जीतना ही जीतना है, चाहे उसने बुराई की कितनी हदें पार कर ली हों? यह घटिया कहानी है, Tanu weds Manu Return की. Absurd & Unacceptable. यह फिल्म बनाने वाले भी आधुनिक बनने के चक्कर में घटिया हो गए हैं. इन्होने नायिका तनु (कंगना रनौत) को एक आधुनिक महिला के रूप में गढ़ना चाहा लेकिन फुस्स होकर रह गए. तनु कानपुर के एक अत्यंत साधारण मोहल्ले में, अत्यंत साधारण परिवार की उपज है, शायद इसीलिए वह स्वच्छंदता की हद तक स्वतंत्र है. छोटे घरों की लड़कियाँ जल्दी बड़ा होना चाहती हैं, शायद यह मानसिकता इस चरित्र को गढ़ने के पीछे रही हो. क्योंकि वे स्पष्ट रूप से गरीब और पिछड़े हुए दकियानूसी परिवार को बिलॉंग करती हैं, और स्त्री की आज़ादी की माँग के चलते उन्हें स्वयं को इस दाग-धब्बे से दूर करना है, इसलिए वे सजग रूप से हर कदम वह उठाती हैं, जो उन्हें आधुनिकता के दायरे में रख सके. मोहल्ले के लड़कों के साथ खुले प्रेम-सम्बन्ध बनाना, शराब पीना, ये लक्षण आज लड़कियों को आधुनिकता में घुसने के सरल तरीके लगते हैं, जबकि उनका जीवन निभता एक शरीफ आदमी के साथ ही है. तनु का विवाह मनु नाम के डॉक्टर (माधवन) से होता है और वे दोनों लंदन में रहने लगते हैं. माधवन सुपर्ब लगे. डॉक्टर पति के व्यस्त रहने और रोमैंटिसिज़्म से दूर रहने के कारण घरेलु पत्नी तनु उसे पागलखाने तक भिजवा देती है, अपने देश यानि अपने पिछड़े मोहल्ले में वापस लौटती है, लौटने के साथ ही उसके पुराने प्रेमी उभर कर सामने आते हैं, जिनमे एक रिक्शावाला भी है. वह विवाह से तुरंत पूर्व के प्रेमी से रिश्ता जोड़ने की उम्मीद में मिलती है लेकिन वह बताता है कि एक अन्य लड़की से शादी करने वाला है और तनु लौट कर अपने पति के पास आना चाहती है जो अब तक लंदन के पागलखाने से छूट कर उसी मोहल्ले के अपने घर में आ चुका होता है. कहीं और बात जमी नहीं तो पति तो है ही बेचारा, जिसे इमोशनली ब्लैकमेल करके फिर से फँसा लिया जाता है. दर्शक इसे पति-पत्नी के बीच का पुनर्मिलन और हैप्पी एंडिंग की कहानी समझ कर खुश है. लानत है ऐसे पुनर्मिलन पर. लेकिन कहानी का अंत वास्तव में दुखद है क्योंकि फिल्म में असली नायिका तनु नहीं, कुसुम (कंगना रनौत का डुप्लीकेट रूप) है जिसकी एंट्री कहानी के बीच में होती है, जो एक सकारात्मक चरित्र है, गाँव की भाषा बोलने वाली एक सीधी-सादी लड़की है, जिसमे नायक अपनी पत्नी तनु की झलक पाकर आकर्षित होता है और उसके साथ विवाह की वेदी तक पहुँच जाता है. पर तनु के वहाँ जमी रहने के कारण वह रिश्ता टूटता है. कुसुम टूटना सहर्ष स्वीकार करती है लेकिन अकेले में उसके दिल का दर्द आँसुओं में बहता है. एक दृश्य में जब तनु उसके गंवारपन पर हँसती है, तब वह गाँव की लड़की कुसुम उसे क्या दो-टूक जवाब देती है कि तुम डॉक्टर के पैसे पर पल रही हो, मैं खुद कमाती हूँ, तुम रिश्तों की अहमियत क्या समझो आदि आदि. मेरे विचार में, न हर पति इस काबिल होता, न हर पत्नी इस काबिल होती कि सिफ हैप्पी एंडिंग की नियत से दोबारा रिश्ता जोड़ा जाए.
 

No comments:

Post a Comment