Saturday, 15 August 2015

सौरभ द्विवेदी

सौरभ द्विवेदी

हमारे इर्द-गिर्द कितनी कहानियाँ बिखरी हुई हैं, इस बात को जितनी खूबी से सौरभ द्विवेदी रोज़ अपनी पोस्ट में उतारते हैं, शायद कोई नहीं। जो कुछ सौरभ के आसपास घटता है, वह तुरन्त शब्दों का जामा पहन कर पोस्ट पर हाज़िर हो जाता है. उनकी देखी हुई घटना का विवरण मात्र नहीं, बल्कि उनके विचार, भाव, सुझाव, सब मिल कर उसे एक कहानी का रूप दे देते हैं. वे किसी दुकान पर खड़े हो कर चाय पीते हैं, तो उन्हें कोई कहानी मिल जाती है. किसी से कुछ बात करते हैं तो वहाँ भी उन्हें कोई कहानी मिल जाती है. बच्चे, बूढ़े, जवान, किसी को भी देखें / मिलें, तो उनमें कोई न कोई कहानी ढूँढ लेते हैं. कहीं पत्थर या फूल दिख जाए तो वह भी उनकी कहानी का विषय बन कर शब्दों में पिरोया जाता है. सच तो यह है कि हमारे आसपास, कण-कण में कहानियाँ बिखरी हुई हैं, बस नज़र चाहिए, पारखी नज़र, जो उस कण को उठा कर हीरे में बदल दे. यह पारखी नज़र सौरभ में है. कितना कुछ भरा पड़ा है सौरभ के भीतर ! जैसे युगों से जमा किया हुआ लावा हो, जो हर पल उछल-उछल कर बाहर निकलने के लिए मचल रहा हो. इतना ज़्यादा लिखने से उनकी लेखनी मँज रही है, सँवर रही है. वे लिखते-लिखते थकते नहीं, ऊबते नहीं, जैसे वे हाथ में विजय पताका उठा कर चले हैं कि उन्हें हर वस्तु के पीछे छुपा सच दुनिया को दिखाना ही है. वे भोले हैं, जैसे अनुभव की आँखें अभी-अभी खुली हैं. ज़र्रे-ज़र्रे को अपने भीतर समेटने का जज़्बा लिए वे देश के अप्रतिम युवा हैं, भविष्य की उम्मीद हैं, पूरी तरह भारतीय हैं. विजयी भवः, सौरभ !


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