Monday, 28 September 2015

काश ! Kavita 240

काश !

जिनके साथ लगाते हैं महफ़िलें
जिनकी जिजीविषा लुभाती है हमें
जिनकी बातों का रस आप्लावित कर देता है
क्यों वे छूट जाते हैं हमसे?

क्या सिर्फ बहती गंगा में नहाते हैं हम?
क्यों नहीं दूर तक जाते हैं हम?

संभाल कर रखना समझदारी होती है
चाहे चीज़ें हों या रिश्ते
खो देने पर ढूँढते रहते हैं हम
उन उन उन्हीं को.

क्यों नहीं अपनी पसंद को संभाल पाते हैं हम?
क्यों बाद में आँसू बहाते हैं हम?

रंगीनियाँ कभी चकाचौंध करती हैं
सपनों में बुनी जाती है ज़िन्दगी
चारों ओर बिखरी रहती है सुगंध
उत्सव-गान बजते हैं कानों में.

क्यों नहीं खुशबुओं को सहेज पाते हैं हम?
क्यों अपने जीवन में खुद आग लगाते हैं हम?

काश हम समझदार पैदा हुआ करते !
काश जीने के रास्ते साफ़ हुआ करते !

Thursday, 17 September 2015

जगदीश चतुर्वेदी

जगदीश चतुर्वेदी

दोस्तों के दोस्त, अपनों के अपने, गैरों के भी अपने, घोर आशावादी, निराशावाद का कहीं नाम नहीं, असंगतियों में जीवन जीने वाले, विवादों को जन्म देते रहने वाले, विद्रोही तेवर से सजे, हिन्दी साहित्य की हर विधा से जुड़े, 1970 के दशक में अकविता आन्दोलन के प्रवर्तक, श्री जगदीश चतुर्वेदी के दो दिन पूर्व हुए निधन का समाचार मुझ तक आज पहुँचा। इस सम्बन्ध में प्रताप सहगल जी ने परसों ही फेसबुक पर सूचना दी लेकिन उनकी पोस्ट मेरी नज़रों से नहीं गुज़री। सोमवार का जनसत्ता भी मैंने नहीं देखा। कितनी अजीब बात कि मुझे सूचित किया मेरी तीस साल पुरानी सखी, एडवोकेट और कवयित्री, अमेरिका में जा बसी मोना गुलाटी ने, जो आजकल दिल्ली आई हुई है. मोना अकविता आन्दोलन में भी सक्रीय रही. जगदीश चतुर्वेदी जी की प्रमुख कृतियों में कनाट प्लेस, सूर्यपुत्र, पूर्वराग, इतिहासहंता, नए मसीहा का जन्म, अंधेरे का आदमी, अंतराल के दो छोर, कपास के फूल और पीली दोपहर शामिल हैं।

मुझे दो-तीन साल पहले पता चला था कि चतुर्वेदी जी अल्ज़ाइमर रोग (भूलने की बीमारी) से ग्रस्त हैं. तभी मैंने उन्हें फोन किया था तो उनकी पत्नी, भाभी जी से बात हुई थी. भाभी जी ने उन्हें फोन देते हुए कहा था, 'मणिका मोहिनी का फोन है. इन्हें जानते हो?' मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दी थी, 'हाँ, हाँ, मणिका को क्यों नहीं जानता?' फिर उन्होंने मुझसे बात की थी तो मुझे ठीक ही लगे थे. भाभी जी ने बताया था कि कभी-कभी ठीक बात कर लेते हैं. पता चला कि भाभी जी भी दो साल पहले गुज़र गईं. स्थान की दूरियों के कारण सालों से मिलना नहीं हो पाया, वर्ना एक समय वह था कि जब हम बहुत सारे लेखक-मित्र पश्चिमी दिल्ली में आसपास रहते थे और रोज़ जमावड़े होते थे. धीरे-धीरे हम सबकी उम्र भी ढलने लगी और दिल के जोश भी. बस, स्मृति में हैं, सहस्रों मीठे-खट्टे लम्हे। चाह कर भी कल शाम उनके अंतिम संस्कार में नहीं जा पाऊँगी। चतुर्वेदी जी, यहीं से मेरा नमन और श्रद्धांजलि स्वीकार करें।

अंत में जगदीश चतुर्वेदी जी के कविता संग्रह 'नए मसीहा का जन्म' से एक छोटी कविता प्रस्तुत है..... 

मृत्यु

जिन वादियों से आया हूँ
उनमें थे फूल
बसंत
स्मृतियाँ
और बार-बार जीने की ज़िद.

अब जिस वादी में जाऊँगा
वहाँ होगा एक नीला विस्तार
अनत शान्ति
और तृष्णाओं का
मधुर अंत.




श्री गणेशाय नमः

श्री गणेशाय नमः 

गणेश जी के जन्म की कथा आप सबको मालूम होगी। शायद यह भी मालूम हो कि हर शुभकार्य से पहले गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है? आइए देखें, यह भी कि उसका आज के सन्दर्भ में कोई अर्थ निकलता है क्या?

पार्वती जी ने स्नान करने के लिए जाते समय मिट्टी का एक पुतला बनाया और स्नानागार के द्वार पर बैठा दिया, यह कह कर कि तू मेरा पुत्र है, ध्यान रखना, कोई भीतर न आए. (यदि आप मिट्टी के पुतले पर भी विश्वास करें, तो उससे भी अपनी बात मनवा सकते हैं.) तभी वहाँ शिव जी आ गए. उन्हें इस पुतले के बारे में कुछ मालूम नहीं था. पार्वती के स्नानगृह के द्वार पर किसी अजनबी को बैठा देख कर उन्हें अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने आवेश में गणेश जी का सिर काट दिया। (क्रोध में उत्तेजित होकर कोई कार्य करने की बजाय स्थिति की पूरी जानकारी अवश्य लें.) जब पार्वती जी ने यह देखा तो वे बिलख उठीं और रो-रो कर शिव जी से बोलीं कि उनके पुत्र को जीवित करो. (संतान चाहे जैसी भी हो, मिट्टी की ही क्यों न बनी हो, माता का प्रेम उसके लिए अक्षुण्य होता है.) शिव जी गणेश का सिर काट कर दूर फ़ेंक चुके थे, कहाँ से लाते? उन्होंने अपने सेवकों को आज्ञा दी कि किसी भी बच्चे का सिर काट कर ले आओ. (शिव जी को यह नहीं सूझा कि यह आज्ञा दें कि गणेश जी का ही सिर ढूँढ कर लाओ. मुसीबत के समय बड़ों-बड़ों के होश उड़ जाते हैं.) सेवकों ने बहुत खोजा पर सफल नहीं हुए. अंत में उन्होंने देखा कि एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ कर के सोई हुई थी. उन्होंने उस बच्चे हाथी का सिर काटा और शिव जी के पास ले आए. (माँ हमेशा बच्चे को अपने कलेजे से चिपटा कर सुलाती है. बच्चे की तरफ पीठ करके न सोएँ, बच्चे को कोई भी नुकसान हो सकता है.) शिव जी ने उस बच्चे हाथी का सिर उस पुतले की धड़ पर जोड़ दिया। इस तरह गणेश जी का चेहरा हाथी की तरह सूँड वाला हो गया. यह थी गणेश जी के जन्म की कथा.

अब गणेश जी को सर्वप्रथम पूजे जाने की कथा. गणेश जी ने जब आईने में अपनी सूरत देखी तो रोने लगे कि वे इस अजीब सूरत के साथ कैसे जीएँगे? बहुत मनाने पर भी जब वे न माने तो शिव जी ने उन्हें वरदान दिया, 'इस दुनिया में तुम सबसे पहले पूजे जाओगे, मुझसे भी पहले।' (महत्व सूरत का नहीं होता। यदि आप सम्मानित हैं, पूज्य हैं तो आपकी शक्ल-सूरत चाहे जैसी भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता।)

इति संपन्न गणेश जी की कथा. (नीचे दी गई गणेश जी की मूर्ति मेरे घर की शोभा बढ़ा रही है.)


Friday, 11 September 2015

28. एक भावचित्र : मन मूरख

28. एक भावचित्र : मन मूरख

मन को कैसे मारते हैं? कोई मन को मारने का तरीका बताए। मुझे अपने मन को मारना है। यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है।

इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख होता क्या है?

यह समझता है कि सुख वह होता है जो 'अपने' होते हैं।

ओफ़ ! इस मूरख को यही नहीं पता कि अपना तो कोई होता ही नहीं।

अपना कोई होता नहीं, तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन?

अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं. कहने का क्या है? कुछ भी कह लो, कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.

यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.

अरे मूरख, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार 

पर मन को मारते कैसे हैं? कोई मन को मारने का तरीका तो बताए।

मूरख, तू सबसे मुँह फेर कर चल. आगे बढ़. पीछे मुड़ कर मत देखना। आगे बढ़. और बढ़.

पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, मेरे अपने हैं.

आँखें बंद कर, कान बंद कर. मूरख, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.

फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा. क्या करूँ? क्या करूँ?

धड़ाम।


Tuesday, 8 September 2015

दहेज़

दहेज़

एक गंभीर बात की शुरुआत एक चुटकुले से......
एक बार सड़क पर कुछ लड़कियाँ जा रही थीं. लड़कों का भी एक समूह उन्हें परेशान करता हुआ, उनका रास्ता रोकता हुआ चल रहा था. लड़कियों को गुस्सा आया, एक लड़की ने कड़क कर कहा, 'ठीक से क्यों नहीं चलते? यह सड़क क्या आपके बाप की है?' एक हाजिरजवाब लड़के ने तुरंत उत्तर दिया, 'जी नहीं, सड़क तो आपके ही बाप की है, हमें तो सिर्फ दहेज में मिली है.'
इससे आप समझ सकते हैं कि दहेज लेना लड़कों के दिमाग में कितनी सहजता से और गहनता से घुसा बैठा है, जैसे वह उनका अधिकार हो.
आज के जागरूक माहौल में भी दहेज़-लोभी देखे जा सकते हैं. मैं कुछ अरसा पहले एक रिश्तेदार के यहाँ लड़की की शादी में गई थी. बहुत धूमधाम से संपन्न की जा रही उस शादी में जब बरात दरवाज़े पर आई तो दूल्हे की माँ ने कुछ असंगत सी मांग रखी, जिसे सुन कर ख़ुशी का माहौल एकदम गम में बदल गया. मैंने कहा, शादी यहीं ख़त्म कर दो लेकिन लड़की वालों ने कहा, 'नहीं, हम अपनी लड़की की ख़ुशी के लिए सब कुछ करेंगे।' कितना गलत था उनका वह सोचना कि लड़की की ख़ुशी के लिए …… खैर, मांग पूरी की गई, बाद में पता चला कि इन्हीं मांगों के कारण लड़की की ज़िन्दगी घिसट भर रही है.
ऐसी बात नहीं कि गलत लोगों के गलत होने का पता अचानक चलता है. शुरू से ही इस बात के संकेत मिलते रहते हैं कि किन्हीं लोगों की असलियत क्या है. बस हम उस ओर ध्यान नहीं देते। दहेज़ नाम की कुरीति आज भी फलफूल रही है. लड़कियों को ही मज़बूत होना पड़ेगा। याद है ना दिल्ली की वह निशा शर्मा, जिसने दहेज़ के लोभी वर और बरात को सिर्फ लौटाया ही नहीं था, मेहँदी रचे हाथों से पुलिस को फोन कर उन्हें जेल भी भिजवाया था?

Monday, 7 September 2015

Aurangzeb Road is now Dr. A P J Abdul Kalam Road

Aurangzeb Road is now Dr. A P J Abdul Kalam Road


दिल्ली अब वह पहले जैसी दिल्ली नहीं रही, उससे बेहतर और आकार में बड़ी हो गई है. ज़मीन के नीचे पार्किंग स्थल, बाजार, मेट्रो-प्लेटफॉर्म के रूप में तीन-चार लेयर्स, ज़मीन के ऊपर फ्लाईओवर्स और मेट्रो-मार्ग के रूप में एक-दो लेयर्स। क्षेत्रफल उतना ही है और जनसंख्या बढ़ती जा रही है तो बढ़ती आबादी के हिसाब से जगह का तो इंतज़ाम करना ही हुआ. इतनी सारी नई जगहों के लिए नए नाम रखने होंगे और नए नामों का चुनाव करना होगा। ये नाम हमारे वर्तमान समय से जुड़े हो सकते हैं.
अभी दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी (रोड) का नाम औरंगज़ेब रोड से बदल कर हमारे पूर्व राष्ट्रपति के नाम पर Dr. A P J Abdul kalam Road रखा गया है. आदरणीय अब्दुल कलाम जी के नाम पर रोड का नाम रखे जाने से किसे ख़ुशी नहीं होगी? प्रसिद्धि और लोकप्रियता के मामले में अब्दुल कलाम साहब का कोई सानी नहीं है.
वैसे मुग़ल बादशाह हमारे देश का स्वर्णिम इतिहास हैं. उनकी बनाई हुई इमारतें तथा उनके किसी भी अन्य योगदान को नकारा नहीं जा सकता। सारे ही मुग़ल बादशाह अपनी-अपनी जगह नेकनामी से जुड़े रहे, सिवाय औरंगज़ेब के. औरंगज़ेब, जिसने अपनी क्रूरता के झंडे गाड़े, मन्दिरों को तहस-नहस किया, हिन्दू और गुरू तेगबहादुर सहित सिखों का कत्लेआम किया, गैर-मुसलिम वर्ग पर जाज़िया (कर, टैक्स) लगाया, संगीत समेत हर प्रकार की कला का बहिष्कार किया, यहाँ तक कि अपने पिता शहंशाह को उनकी वृद्धावस्था में कारावास का दंड दिया और अपने भाई को मौत के घाट उतरा। औरंगज़ेब के कार्यकलापों को किसी का समर्थन नहीं मिल सकता। यह उसका अपना ही नकारवादी दमखम था कि नफरतों के बीच उसने अपना साम्राज्य खड़ा किया। हम औरंगज़ेब को इतिहास से तो खारिज नहीं कर सकते लेकिन उनके नाम को यादगार बनाने को समाप्त करने के इस कार्य की प्रशंसा ज़रूर कर सकते हैं.