Tuesday, 8 September 2015

दहेज़

दहेज़

एक गंभीर बात की शुरुआत एक चुटकुले से......
एक बार सड़क पर कुछ लड़कियाँ जा रही थीं. लड़कों का भी एक समूह उन्हें परेशान करता हुआ, उनका रास्ता रोकता हुआ चल रहा था. लड़कियों को गुस्सा आया, एक लड़की ने कड़क कर कहा, 'ठीक से क्यों नहीं चलते? यह सड़क क्या आपके बाप की है?' एक हाजिरजवाब लड़के ने तुरंत उत्तर दिया, 'जी नहीं, सड़क तो आपके ही बाप की है, हमें तो सिर्फ दहेज में मिली है.'
इससे आप समझ सकते हैं कि दहेज लेना लड़कों के दिमाग में कितनी सहजता से और गहनता से घुसा बैठा है, जैसे वह उनका अधिकार हो.
आज के जागरूक माहौल में भी दहेज़-लोभी देखे जा सकते हैं. मैं कुछ अरसा पहले एक रिश्तेदार के यहाँ लड़की की शादी में गई थी. बहुत धूमधाम से संपन्न की जा रही उस शादी में जब बरात दरवाज़े पर आई तो दूल्हे की माँ ने कुछ असंगत सी मांग रखी, जिसे सुन कर ख़ुशी का माहौल एकदम गम में बदल गया. मैंने कहा, शादी यहीं ख़त्म कर दो लेकिन लड़की वालों ने कहा, 'नहीं, हम अपनी लड़की की ख़ुशी के लिए सब कुछ करेंगे।' कितना गलत था उनका वह सोचना कि लड़की की ख़ुशी के लिए …… खैर, मांग पूरी की गई, बाद में पता चला कि इन्हीं मांगों के कारण लड़की की ज़िन्दगी घिसट भर रही है.
ऐसी बात नहीं कि गलत लोगों के गलत होने का पता अचानक चलता है. शुरू से ही इस बात के संकेत मिलते रहते हैं कि किन्हीं लोगों की असलियत क्या है. बस हम उस ओर ध्यान नहीं देते। दहेज़ नाम की कुरीति आज भी फलफूल रही है. लड़कियों को ही मज़बूत होना पड़ेगा। याद है ना दिल्ली की वह निशा शर्मा, जिसने दहेज़ के लोभी वर और बरात को सिर्फ लौटाया ही नहीं था, मेहँदी रचे हाथों से पुलिस को फोन कर उन्हें जेल भी भिजवाया था?

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