Friday, 11 September 2015

28. एक भावचित्र : मन मूरख

28. एक भावचित्र : मन मूरख

मन को कैसे मारते हैं? कोई मन को मारने का तरीका बताए। मुझे अपने मन को मारना है। यह हर पल स्वयं को सुखी समझ कर उछलता-फुदकता रहता है।

इस मूरख को यही नहीं पता कि सुख होता क्या है?

यह समझता है कि सुख वह होता है जो 'अपने' होते हैं।

ओफ़ ! इस मूरख को यही नहीं पता कि अपना तो कोई होता ही नहीं।

अपना कोई होता नहीं, तो जो हमारे साथ रहते हैं, रोज़ मिलते-जुलते हैं, कहते हैं, हम तुम्हारे हैं, वो कौन?

अरे मूरख, वो सिर्फ संयोग से साथ हैं. कहने का क्या है? कुछ भी कह लो, कहने में झूठ, सच एक ही अंदाज़ से बोला जाता है.

यह झूठ क्या होता है? मुझे लगता है, जो होता है, सब सच होता है.

अरे मूरख, तुझे यदि सब सच लगता है तो तू वाकई अपने मन को मार 

पर मन को मारते कैसे हैं? कोई मन को मारने का तरीका तो बताए।

मूरख, तू सबसे मुँह फेर कर चल. आगे बढ़. पीछे मुड़ कर मत देखना। आगे बढ़. और बढ़.

पर आगे भी लोग हैं जो कहते हैं, मेरे अपने हैं.

आँखें बंद कर, कान बंद कर. मूरख, किसी की न सुन कुछ, किसी से न कह कुछ.

फिर भी, मन है कि मर ही नहीं रहा. क्या करूँ? क्या करूँ?

धड़ाम।


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