Monday, 28 September 2015

काश ! Kavita 240

काश !

जिनके साथ लगाते हैं महफ़िलें
जिनकी जिजीविषा लुभाती है हमें
जिनकी बातों का रस आप्लावित कर देता है
क्यों वे छूट जाते हैं हमसे?

क्या सिर्फ बहती गंगा में नहाते हैं हम?
क्यों नहीं दूर तक जाते हैं हम?

संभाल कर रखना समझदारी होती है
चाहे चीज़ें हों या रिश्ते
खो देने पर ढूँढते रहते हैं हम
उन उन उन्हीं को.

क्यों नहीं अपनी पसंद को संभाल पाते हैं हम?
क्यों बाद में आँसू बहाते हैं हम?

रंगीनियाँ कभी चकाचौंध करती हैं
सपनों में बुनी जाती है ज़िन्दगी
चारों ओर बिखरी रहती है सुगंध
उत्सव-गान बजते हैं कानों में.

क्यों नहीं खुशबुओं को सहेज पाते हैं हम?
क्यों अपने जीवन में खुद आग लगाते हैं हम?

काश हम समझदार पैदा हुआ करते !
काश जीने के रास्ते साफ़ हुआ करते !

2 comments:

  1. अंतर्द्वंद का सुन्दर निरूपण

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