Thursday, 17 September 2015

जगदीश चतुर्वेदी

जगदीश चतुर्वेदी

दोस्तों के दोस्त, अपनों के अपने, गैरों के भी अपने, घोर आशावादी, निराशावाद का कहीं नाम नहीं, असंगतियों में जीवन जीने वाले, विवादों को जन्म देते रहने वाले, विद्रोही तेवर से सजे, हिन्दी साहित्य की हर विधा से जुड़े, 1970 के दशक में अकविता आन्दोलन के प्रवर्तक, श्री जगदीश चतुर्वेदी के दो दिन पूर्व हुए निधन का समाचार मुझ तक आज पहुँचा। इस सम्बन्ध में प्रताप सहगल जी ने परसों ही फेसबुक पर सूचना दी लेकिन उनकी पोस्ट मेरी नज़रों से नहीं गुज़री। सोमवार का जनसत्ता भी मैंने नहीं देखा। कितनी अजीब बात कि मुझे सूचित किया मेरी तीस साल पुरानी सखी, एडवोकेट और कवयित्री, अमेरिका में जा बसी मोना गुलाटी ने, जो आजकल दिल्ली आई हुई है. मोना अकविता आन्दोलन में भी सक्रीय रही. जगदीश चतुर्वेदी जी की प्रमुख कृतियों में कनाट प्लेस, सूर्यपुत्र, पूर्वराग, इतिहासहंता, नए मसीहा का जन्म, अंधेरे का आदमी, अंतराल के दो छोर, कपास के फूल और पीली दोपहर शामिल हैं।

मुझे दो-तीन साल पहले पता चला था कि चतुर्वेदी जी अल्ज़ाइमर रोग (भूलने की बीमारी) से ग्रस्त हैं. तभी मैंने उन्हें फोन किया था तो उनकी पत्नी, भाभी जी से बात हुई थी. भाभी जी ने उन्हें फोन देते हुए कहा था, 'मणिका मोहिनी का फोन है. इन्हें जानते हो?' मुझे उनकी आवाज़ सुनाई दी थी, 'हाँ, हाँ, मणिका को क्यों नहीं जानता?' फिर उन्होंने मुझसे बात की थी तो मुझे ठीक ही लगे थे. भाभी जी ने बताया था कि कभी-कभी ठीक बात कर लेते हैं. पता चला कि भाभी जी भी दो साल पहले गुज़र गईं. स्थान की दूरियों के कारण सालों से मिलना नहीं हो पाया, वर्ना एक समय वह था कि जब हम बहुत सारे लेखक-मित्र पश्चिमी दिल्ली में आसपास रहते थे और रोज़ जमावड़े होते थे. धीरे-धीरे हम सबकी उम्र भी ढलने लगी और दिल के जोश भी. बस, स्मृति में हैं, सहस्रों मीठे-खट्टे लम्हे। चाह कर भी कल शाम उनके अंतिम संस्कार में नहीं जा पाऊँगी। चतुर्वेदी जी, यहीं से मेरा नमन और श्रद्धांजलि स्वीकार करें।

अंत में जगदीश चतुर्वेदी जी के कविता संग्रह 'नए मसीहा का जन्म' से एक छोटी कविता प्रस्तुत है..... 

मृत्यु

जिन वादियों से आया हूँ
उनमें थे फूल
बसंत
स्मृतियाँ
और बार-बार जीने की ज़िद.

अब जिस वादी में जाऊँगा
वहाँ होगा एक नीला विस्तार
अनत शान्ति
और तृष्णाओं का
मधुर अंत.




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