Saturday, 17 October 2015

इब्तिदा-ए-इश्क़ Kavita 243

इब्तिदा-ए-इश्क़

अभी तो इब्तिदा-ए-इश्क़ है, हँसता है क्या?
आगे-आगे देखिए फँसता है क्या?

तमाशे हो चुके पहले बहुत, अब फिर से होएँगे
ज़माना फिर से हँसेगा, ये किस्से फिर से रोएँगे।

दिनों को रौंद कर आगे बढ़े तो क्या बढ़े यारा
करेले नीम पर चढ़े तो चढ़े क्या चढ़े यारा।

कि अहसासों को रखो बन्द डिब्बे में हिफाज़त से
यह सरेआम नंगा न कभी होना शराफ़त से।

ये दिल का मामला यूँ राहे-सर बोला नहीं जाता
खुले चौराहे पर जज़्बात को खोला नहीं जाता।

ज़रा सी देर ठहरो बस अभी सब पर्दे उठेंगे
तमाशा तुम भी देखोगे, तमाशा हम भी देखेंगे।

Wednesday, 14 October 2015

मैं तेरे सदके Kavita 242

मैं तेरे सदके

कि जीतने का हुनर सच में हुनर होता है
कि हारने की कला कोई कम कमाल नहीं
बेईमानियाँ भी सब के बस की बात नहीं
मैं तेरे हुनर के सदके, मैं तेरी कला के सदके
मेरी इस बात पर अब तू भी फ़रमा दे बज़ा।

कभी तो तू मेरी तकलीफ को महसूस कर
कभी तो हो तुझे मलाल, तूने क्यों जगाए
वही ख्वाब जो आँखों में मेरी थे ही नहीं
कभी तो तू यूँ पछताए कि जैसे पाप किया
मेरे मासूम दिल को तोड़ने की पाए सज़ा।

दिल में उठती है कसक अब भी इसी बात की
तूने क्यों झूठ को सच कह-कह कर पेश किया
वो सारे शब्द मेरे इर्द-गिर्द ठहर गए
सनातन प्रश्न का कोई कहीं जवाब नहीं
क्यों आता है जज़्बातों से खेलने में मज़ा?

कभी तो कर भरोसा मेरी इस दीवानगी पर
कभी तो रख मुझे अपनी ग़ज़ल के मायनों में
कि तेरा नाम मेरे हाथ में लिखा तो नहीं
पर ज़रा देर को सुस्ता लूँ तेरे साए में
क्या पता छीन कर ले जाए कब मुझको कज़ा।

Wednesday, 7 October 2015

त्राहि माम त्राहि माम Kavita 241

त्राहि माम त्राहि माम
मैं अपने आप में जकड़ गई हूँ
खुद के भी खोलने से नहीं खुल रही हूँ
अनेक ताले लगे हैं मेरी चेतना के द्वार पर
अनेक ग्रंथियों में कसा है मेरा अन्तस्तल
हीनता, ग्लानि, अपराधबोध
धीमे ज़हर की तरह फैल रहे हैं मेरी रगों में.

मैं अपनी वसीयत लिख रही हूँ
पर अपने ही लिखे को समझ नहीं रही हूँ.

मैं अपनी कुंठाओं की विरासत
किसके नाम लिखूँ?
मैं अपनी उम्र भर की आँसुओं की कमाई
किसे सौंपूँ?
टूटे हुए सपनों की किरचों के ख़ज़ाने
किसके हवाले करूँ?

मुझे क्यों नहीं आ रहा समझ
वह सब जो मुझे समझना चाहिए?

मेरे सामने हर वक़्त आईना क्यों रहता है?
क्यों मैं अपनी सूरत देख कर घबरा जाती हूँ?
मैं हर घड़ी किससे छुप रही हूँ?
अरे ! यह तो मैं खुद से ही छुप रही हूँ.
क्या कोई खुद से भी डरता है?
कौन है मेरे भीतर जो मुझे डरा रहा है?
कौन है मेरे भीतर जो मेरा शत्रु है?
मैं खुद अपनी भी नहीं हुई
तो और किसकी होऊँगी?

रक्षाम देहि रक्षाम देहि।
त्राहि माम त्राहि माम.