Wednesday, 7 October 2015

त्राहि माम त्राहि माम Kavita 241

त्राहि माम त्राहि माम
मैं अपने आप में जकड़ गई हूँ
खुद के भी खोलने से नहीं खुल रही हूँ
अनेक ताले लगे हैं मेरी चेतना के द्वार पर
अनेक ग्रंथियों में कसा है मेरा अन्तस्तल
हीनता, ग्लानि, अपराधबोध
धीमे ज़हर की तरह फैल रहे हैं मेरी रगों में.

मैं अपनी वसीयत लिख रही हूँ
पर अपने ही लिखे को समझ नहीं रही हूँ.

मैं अपनी कुंठाओं की विरासत
किसके नाम लिखूँ?
मैं अपनी उम्र भर की आँसुओं की कमाई
किसे सौंपूँ?
टूटे हुए सपनों की किरचों के ख़ज़ाने
किसके हवाले करूँ?

मुझे क्यों नहीं आ रहा समझ
वह सब जो मुझे समझना चाहिए?

मेरे सामने हर वक़्त आईना क्यों रहता है?
क्यों मैं अपनी सूरत देख कर घबरा जाती हूँ?
मैं हर घड़ी किससे छुप रही हूँ?
अरे ! यह तो मैं खुद से ही छुप रही हूँ.
क्या कोई खुद से भी डरता है?
कौन है मेरे भीतर जो मुझे डरा रहा है?
कौन है मेरे भीतर जो मेरा शत्रु है?
मैं खुद अपनी भी नहीं हुई
तो और किसकी होऊँगी?

रक्षाम देहि रक्षाम देहि।
त्राहि माम त्राहि माम.

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