Wednesday, 14 October 2015

मैं तेरे सदके Kavita 242

मैं तेरे सदके

कि जीतने का हुनर सच में हुनर होता है
कि हारने की कला कोई कम कमाल नहीं
बेईमानियाँ भी सब के बस की बात नहीं
मैं तेरे हुनर के सदके, मैं तेरी कला के सदके
मेरी इस बात पर अब तू भी फ़रमा दे बज़ा।

कभी तो तू मेरी तकलीफ को महसूस कर
कभी तो हो तुझे मलाल, तूने क्यों जगाए
वही ख्वाब जो आँखों में मेरी थे ही नहीं
कभी तो तू यूँ पछताए कि जैसे पाप किया
मेरे मासूम दिल को तोड़ने की पाए सज़ा।

दिल में उठती है कसक अब भी इसी बात की
तूने क्यों झूठ को सच कह-कह कर पेश किया
वो सारे शब्द मेरे इर्द-गिर्द ठहर गए
सनातन प्रश्न का कोई कहीं जवाब नहीं
क्यों आता है जज़्बातों से खेलने में मज़ा?

कभी तो कर भरोसा मेरी इस दीवानगी पर
कभी तो रख मुझे अपनी ग़ज़ल के मायनों में
कि तेरा नाम मेरे हाथ में लिखा तो नहीं
पर ज़रा देर को सुस्ता लूँ तेरे साए में
क्या पता छीन कर ले जाए कब मुझको कज़ा।

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