Saturday, 17 October 2015

इब्तिदा-ए-इश्क़ Kavita 243

इब्तिदा-ए-इश्क़

अभी तो इब्तिदा-ए-इश्क़ है, हँसता है क्या?
आगे-आगे देखिए फँसता है क्या?

तमाशे हो चुके पहले बहुत, अब फिर से होएँगे
ज़माना फिर से हँसेगा, ये किस्से फिर से रोएँगे।

दिनों को रौंद कर आगे बढ़े तो क्या बढ़े यारा
करेले नीम पर चढ़े तो चढ़े क्या चढ़े यारा।

कि अहसासों को रखो बन्द डिब्बे में हिफाज़त से
यह सरेआम नंगा न कभी होना शराफ़त से।

ये दिल का मामला यूँ राहे-सर बोला नहीं जाता
खुले चौराहे पर जज़्बात को खोला नहीं जाता।

ज़रा सी देर ठहरो बस अभी सब पर्दे उठेंगे
तमाशा तुम भी देखोगे, तमाशा हम भी देखेंगे।

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