Saturday, 21 November 2015

लिखूँगी अब Kavita 246

लिखूँगी अब

उसने मुझे मेरे अकेलेपन से निकाला
और फिर से भीड़ में फेंक गया।
उससे शुरू, उस पर ख़त्म
यह आधी-अधूरी कहानी
लिखूँगी अब।

मैंने अपने आँसू
मुस्कुराहटों से ढक कर रखे हैं
उसका प्यार था या वक़्त की मार
अपनी नाकामयाबी पर
हँसूँगी अब।

उसका होना तो होना था ही
उसका न होना भी होने जैसा
चुभती है जो हर पल
इस कसक को संभाल कर
रखूँगी अब।

कभी लगता है, सब कुछ था
कभी कुछ भी नहीं
असमंजस में घिरी हुई
अपनी ही बद्दुआओं में
मरूँगी अब।

Thursday, 12 November 2015

29. एक भावचित्र : जीवन का सुखद सांध्यकाल

29. एक भावचित्र : जीवन का सुखद सांध्यकाल
(जीवन के सांध्यकाल में सुखी व्यक्ति का प्रलाप)

जीवन के सांध्यकाल में सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि हम अपनी मर्ज़ी का जीवन नहीं जी पाते। न, न, ऐसा नहीं कि सांध्यकाल में इतना अँधेरा छा चुका होता है कि हममें सामर्थ्य नहीं होती। बल्कि इसलिए कि हमारे अपने हमें बहुत प्यार करते हैं, हमारा बहुत ख्याल रखते हैं। वास्तविकता यह होती है कि उनके विचार में हम शक्तिहीन हो चुके होते हैं। ऐसा वे सोचते हैं जबकि यह सत्य नहीं भी हो सकता। उनका प्यार हमारे लिए कभी-कभी बेड़ियाँ बन जाता है। हम उड़ना चाहते हैं, हमारे अपनों को लगता है, हमारे पंख कमज़ोर हो चुके हैं या हो रहे हैं। वे हमें अपनी बाहों में समेट कर उड़ते हैं ताकि हम उड़ने का आनंद ले सकें। वे हर वक़्त बुढ़ापे की लाठी बन कर हमारा हाथ थामे रहते हैं कि कहीं हम लड़खड़ा न जाएँ। हम अपने को गौरवशाली तो महसूस करते हैं पर सोने के पिंजरे में कैद पंछी जैसा भी। किराये के मददगारों की मदद संगत लगती है लेकिन अपनों का हर पल हमारी मदद को आगे आना हमें इस अहसास के बीच छोड़ जाता है कि अब हम ख़त्म हो रहे हैं, या यह हमारे ख़त्म होने की शुरुआत है। हमारे अपने हमें सुनते हैं यानि हमारी हर बात ध्यान से सुनते हैं। जब हम बोलते हैं तो हमें लगता है, अपने को सारा उँड़ेल दें। कितना कुछ भरा है भीतर, जो खाली ही नहीं होता। पर अचानक अहसास होता है, हमारे अपनों में लिहाजदारी है हमें सुनने की। वर्ना उनके किस मतलब की हैं हमारी बातें? अब हमारे होने का भी क्या मतलब रहा उनके लिए?  यह सोच कर हमारे भीतर कहीं गहरी चुप्पी उतर जाती है। हमें खुद लगने लगता है, यह हमारे ख़त्म होने की शुरुआत है। हम खुद को कोसते हुए एक आत्महंता दौर से गुज़रने लगते हैं.


सिलसिला Kavita 245

सिलसिला

एक-दूसरे की लांछना का सिलसिला राजनीति है.
एक-दूसरे पर मर-मिटने का सिलसिला प्रेम-प्रीति है.
एक-दूसरे से जलने का सिलसिला रिश्तेदारी है.
एक-दूसरे से उम्मीदों का सिलसिला दुनियादारी है.
एक-दूसरे से बेहतरी का सिलसिला विकास है.
एक-दूसरे को मात देने का सिलसिला विनाश है.
एक-दूसरे से माँगने का सिलसिला अंधभक्ति है.
एक-दूसरे से कोई नहीं सिलसिला आत्मशक्ति है.

Wednesday, 4 November 2015

वीरानी है Kavita 244

वीरानी है

कल जिनका नाम गर्व से लेते थे
आज उनका नाम लेते शर्म आती है।

वक़्त हटा देता है आवरण
नज़र आने लगता है
संबंधों का ओछापन और खोखलापन।

अँधेरे में जो पल भर को चमका था
काँच का टुकड़ा था
चुभ रहा है।

जितना ऊँचा चढ़े
उतनी ऊँचाई से ही तो गिरना था
तब न गिरने का पता था, न चोट का।

आँख जब खुलती है
तलाशती है चुल्लू भर पानी
डूब मरने के लिए।

कल जो महल की शानो शौकत थी
आज खंडहर की सायं सायं वीरानी है।