Wednesday, 4 November 2015

वीरानी है Kavita 244

वीरानी है

कल जिनका नाम गर्व से लेते थे
आज उनका नाम लेते शर्म आती है।

वक़्त हटा देता है आवरण
नज़र आने लगता है
संबंधों का ओछापन और खोखलापन।

अँधेरे में जो पल भर को चमका था
काँच का टुकड़ा था
चुभ रहा है।

जितना ऊँचा चढ़े
उतनी ऊँचाई से ही तो गिरना था
तब न गिरने का पता था, न चोट का।

आँख जब खुलती है
तलाशती है चुल्लू भर पानी
डूब मरने के लिए।

कल जो महल की शानो शौकत थी
आज खंडहर की सायं सायं वीरानी है।

No comments:

Post a Comment