Saturday, 21 November 2015

लिखूँगी अब Kavita 246

लिखूँगी अब

उसने मुझे मेरे अकेलेपन से निकाला
और फिर से भीड़ में फेंक गया।
उससे शुरू, उस पर ख़त्म
यह आधी-अधूरी कहानी
लिखूँगी अब।

मैंने अपने आँसू
मुस्कुराहटों से ढक कर रखे हैं
उसका प्यार था या वक़्त की मार
अपनी नाकामयाबी पर
हँसूँगी अब।

उसका होना तो होना था ही
उसका न होना भी होने जैसा
चुभती है जो हर पल
इस कसक को संभाल कर
रखूँगी अब।

कभी लगता है, सब कुछ था
कभी कुछ भी नहीं
असमंजस में घिरी हुई
अपनी ही बद्दुआओं में
मरूँगी अब।

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