Saturday, 26 December 2015

एक पागल मिला था Kavita 248

एक पागल मिला था

एक पागल मिला था
जीवन के मायने समझा गया
मुझे सयाना बना गया।

आँख में सपने नहीं थे
अपनों में अपने नहीं थे
भ्रमजाल बिछा गया।

सत्य का बोलबाला नहीं
असत्य का मुँह काला नहीं
नए मुहावरे सुना गया।

एक अकेला वही ज्ञानी
उस्तादी में न कोई सानी
रोने की कला सिखा गया।

मैं उसकी दीवानी हुई
मस्त मस्त मस्तानी हुई
क्या से क्या बना गया।

Thursday, 24 December 2015

या कोई प्रीत है? Kavita 247

या कोई प्रीत है?


मैंने कुछ कहा नहीं पर उसने सुन लिया
उसने कुछ कहा नहीं और मैंने सुन लिया
न कोई शब्द हैं, अर्थ का भी पता नहीं
कोई तो बताए हमें यह कैसी रीत है?

जिसका था इंतज़ार, वही नहीं आया था
महफ़िल में रौनकों का वही सरमाया था
पाँव में मेहँदी लगी या हाथों में हथकड़ी?
पता नहीं किससे और क्यों भयभीत है?

कौन बुलाए उसे? और क्यों बुलाए भी?
हवा में बहती हुई धुन न सुन पाए भी
क्या उसे नहीं पता किसको उसका इंतज़ार?
मौसम में घुल रहा निमंत्रण संगीत है.

यूँ मैं जहाँ जाती हूँ, वहीँ आ जाता है
गुपचुप-गुपचुप कुछ तो बतियाता है
मुझसे ही बात करे, और किसी से भी नहीं
पता नहीं यूँ ही है या कोई प्रीत है?