Saturday, 26 December 2015

एक पागल मिला था Kavita 248

एक पागल मिला था

एक पागल मिला था
जीवन के मायने समझा गया
मुझे सयाना बना गया।

आँख में सपने नहीं थे
अपनों में अपने नहीं थे
भ्रमजाल बिछा गया।

सत्य का बोलबाला नहीं
असत्य का मुँह काला नहीं
नए मुहावरे सुना गया।

एक अकेला वही ज्ञानी
उस्तादी में न कोई सानी
रोने की कला सिखा गया।

मैं उसकी दीवानी हुई
मस्त मस्त मस्तानी हुई
क्या से क्या बना गया।

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