Thursday, 24 December 2015

या कोई प्रीत है? Kavita 247

या कोई प्रीत है?


मैंने कुछ कहा नहीं पर उसने सुन लिया
उसने कुछ कहा नहीं और मैंने सुन लिया
न कोई शब्द हैं, अर्थ का भी पता नहीं
कोई तो बताए हमें यह कैसी रीत है?

जिसका था इंतज़ार, वही नहीं आया था
महफ़िल में रौनकों का वही सरमाया था
पाँव में मेहँदी लगी या हाथों में हथकड़ी?
पता नहीं किससे और क्यों भयभीत है?

कौन बुलाए उसे? और क्यों बुलाए भी?
हवा में बहती हुई धुन न सुन पाए भी
क्या उसे नहीं पता किसको उसका इंतज़ार?
मौसम में घुल रहा निमंत्रण संगीत है.

यूँ मैं जहाँ जाती हूँ, वहीँ आ जाता है
गुपचुप-गुपचुप कुछ तो बतियाता है
मुझसे ही बात करे, और किसी से भी नहीं
पता नहीं यूँ ही है या कोई प्रीत है?

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