Wednesday, 23 November 2016

Mental Block

Mental Block

इन दिनों दुखी हूँ। मेरे अपने दुःख तो ख़त्म हो गए, लोगों के दुःख मुझे पूरी-पूरी रात सोने नहीं देते। अब तक 'क्राइम पेट्रोल' और 'सावधान इंडिया' में देखा था। वो लड़कियां किस मिट्टी की बनी होती होंगी, जिनके साथ ऐसा होता होगा?

एक लड़की मेरी दुकान में नौकरी माँगने आई। उसके चेहरे पर पढ़े-लिखे होने का नूर था लेकिन बेहद उदासी भी थी। मातृ-पितृ विहीन। असहाय। मुस्कानरहित खाली आँखें। सहमी हुई सी। पगलाई हुई सी।

आज तक कोई चेहरा ऐसा नहीं निकला जिसे मैंने पढ़ा हो और मेरा पढ़ना गलत निकला हो। उसकी कहानी उसी दिन मेरे दिल और दिमाग़ में लिखी गई।

मैंने पूछा, 'बायोडाटा लाई हो?'

'नहीं, कल ले आऊँगी।'

'तुम्हारा नाम?'

'मुक्ता।' (नकली नाम)

'आगे?'

'आगे कुछ नहीं। बस इतना ही नाम है।'

मैंने कुछ समझा।

'मैं B Tech 4th year में हूँ, Electronics & Communications में। पर पढ़ाई छोड़ रही हूँ।'

'अरे, final year में क्यों छोड़ रही हो?'

'नहीं मैम, मैं पढ़ना नहीं चाहती। मुझसे पढ़ा ही नहीं जाता।मेरा कॉलेज उड़ीसा में है। मैं यहीं पास ही रहती हूँ, अपनी नानी और अंकल के साथ।'

'अंकल यानि मामा। तुम्हारे मामा क्या करते हैं?'

'नौकरी करते हैं पर मैं उन्हें मामा नहीं कहती, अंकल कहती हूँ।'

'अच्छा। उड़ीसा में तुम्हारे parents रहते हैं।'

'नहीं, मैं वहाँ हॉस्टल में रहती हूँ पर अब पढ़ाई छोड़ कर दिल्ली आ गई हूँ। And I am very much in need of a job. Can you help me?'

'कितनी salary expect करती हो?'

'No expectations, Ma'am, whatever, just whatever....'

'If I give you 5000/-?' मैंने यूँ ही बोल दिया।

'Its okay with me.'

उस लड़की की बेचारगी और चेहरे का सहमापन मुझे कुछ इस तरह द्रवित कर गया कि मैं मन ही मन कराह उठी। उसके वजूद में बहुत सारी कहानियाँ थीं जो मुझे विचलित कर गईं। I must do something for this girl.

संयोग से मेरा पुत्र भी उस समय मेरे साथ दुकान में बैठा था। उसने सारी बात सुनी और मुझे कुछ संकेत किया। मैं समझ गई, मुझसे कुछ कहना चाहता है। मैंने मुक्ता को दूर पड़ी कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। मैं और बॉबी अकेले हुए तो बॉबी बोला, 'आपने बहुत कम सैलरी बोल दी। इंजीनियर लड़की है, मॉम, कुछ तो ढंग की सैलरी दो।'

'बॉबी, इसके बिना कहे भी इसकी कहानी मुझे समझ आ रही है। मैं चाहती हूँ, यह लड़की अपनी पढ़ाई पूरी करे। इसके चेहरे पर भाव देखा? I just want to help her financially, emotionally, morally and what not.'

'I can understand your sentiments Mom, go ahead, do whatever you want. I am with you.'

(मेरे घर में यह बात अच्छी है (अन्य अनेक बातों के साथ), कि मेरे बच्चे मेरे किसी निर्णय में आपत्ति नहीं करते।)

मैंने उस लड़की को अगले दिन से काम पर आने के लिए कह दिया। साथ ही यह भी कहा कि 'तुम्हें 5 नहीं, ज़्यादा दूँगी।'

'No no, Ma'am, I am okay with 5. मुझे ज़्यादा क्या करने हैं?'

वह अगले दिन समय पर आ गई। जो समझाया, चुपचाप करने लगी। लंच टाइम में उसने अपना घर से लाया लंच खोला और दीवार की ओर मुँह करके बैठ गई। अरे, वह तो रो रही थी। उसके छुपाते-छुपाते भी मैंने उसके आँसू देख लिए। मैंने उसे गले से लगाया, कहा, 'मैं चाहती हूँ, तुम अपनी पढ़ाई पूरी करो। मैं तुम्हें पढ़ाऊंगी। मैं तुम्हें उड़ीसा भेजूँगी। ये सब बुरे दिन बीत जाएँगे।'

'आप तो मुझे जानती नहीं। आप क्यों मेरे लिए कुछ करेंगी?'

'किसने कहा, मैं तुम्हें नहीं जानती? मैं तुम्हें जानती हूँ, तुम बहुत प्यारी, भोली, बीस-बाइस साल की एक समझदार लड़की हो जो दूसरों के किए की सज़ा भोग रही हो। मैं तुम्हारा जीवन संवारूंगी। में तुम्हारी पढ़ाई पूरी करवाऊंगी। बोलो, कब जाना है उड़ीसा, अपने कॉलेज?'

'Thank you so much Ma'am, but I don't want to take any obligation. मुझे किसी का अहसान नहीं चाहिए। मुझे किसी के आसरे अब नहीं जीना। I want to build my own castle.'

'अहसान कैसा, मुक्ता, मैं तुम्हारी माँ जैसी हूँ। आज से तुम मुझे अपनी माँ समझो।'

'No Ma'am. मुझे पढ़ना ही नहीं है।'

कई बार अच्छा काम करना यानि पुण्य कमाना भी आपके हाथ में नहीं होता। आप किसी के लिए कुछ करना चाहें और वह ठुकरा दे, इससे दयनीय स्थिति और क्या हो सकती है। मैंने उसी दयनीय स्थिति में अपने को पाया और सोचा, मणिका, बड़ा महान बनने चली थी। उस छोटी सी लड़की ने तुझे कितना छोटा बना दिया।

'बस मैं यहाँ नौकरी करूँगी। आप मुझे छह हज़ार दे देना। कल आपके 'हाँ' करने के बाद मैंने तीन हज़ार का एक कमरा देखा है। मैं अकेले रहना चाहती हूँ।'

'अरे? पहले कुछ दिन नौकरी तो करके देख लो, निभती है या नहीं?'

'मुझे लगता है, यहाँ सब ठीक रहेगा। क्या मैं आपको 'आंटी' बुला सकती हूँ?'

'ज़रूर। अब शान्त होकर खाना खाओ और जो काम बताया है, वह करो।'

उसके पैदा होने के कुछ माह बाद उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी। उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। उसकी मासी ने उसे पाला। वह बहुत सालों तक मासी को माँ और मौसा को पापा समझती रही थी। नानी के बूढ़ा होने के कारण वह बाद में नानी और मामा के साथ रहने लगी।

मेरी दुकान में ड्राइवर समेत तीन लड़के काम करते हैं। हालाँकि मुझे ज़रूरत नहीं थी, फिर भी मैंने उस पर तरस खा कर उसे रख लिया था।

वह अगले दिन समय पर आई। लंच टाइम में जब मैं और वह अकेली थीं तो वह बोली, 'आंटी, बस मैं एक बात चाहती हूँ कि कोई मुझे हाथ नहीं लगाए। मुझे अच्छा नहीं लगता कि कोई मुझे छुए।'

'नहीं, नहीं, ये लड़के अच्छे हैं। वैसे भी ऐसे कोई किसी को नहीं छूता।'

'कल आपने मुझे छुआ था। मुझे किसी का भी छूना अच्छा नहीं लगता।'

'मैंने तुम्हें कब छुआ?' मुझ पर उसका यह इल्ज़ाम मुझे अजीब सा लगा।

'When you hugged me. जब आपने मुझे गले लगाया था।'

'ओह वह?' मैंने उसे Touch थेरेपी के फ़ायदे बताए (जो मैं कभी फेसबुक पर लिख चुकी हूँ) कि अपनों के स्पर्श से कैसे आदमी खुश रहता है।

'लेकिन आंटी, मैंने कई जगह से नौकरी इसीलिए छोड़ दी कि लोग मुझे छूते हैं। चाहे गलती से भी टच हो जाए, पर मैं सहन नहीं कर सकती।'

कुछ पल चुप रह कर मैंने फुसफुसाते स्वर में पूछा, 'तुम्हारे साथ किसी ने कभी कोई ज़बरदस्ती की क्या? कॉलेज में किसी लड़के ने?'

'मुझे नहीं मालूम। मुझे डर लगता है। मैं इसीलिए हॉस्टल नहीं जाना चाहती। मुझे हर जगह डर लगता है। इसीलिए मैं अकेले रहना चाहती हूँ।'

'तुम्हें किसी मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए।'

'मेरा इलाज चल रहा है। डॉक्टर मुझे नींद की गोली देते हैं। पर मुझे सोते हुए भी लगता है कि कोई मुझे छू रहा है। सब कहते हैं, मुझे वहम की बीमारी है।'

'तुम ठीक हो। नींद की गोली मत खाओ। तुम्हारी समस्या मनोवैज्ञानिक है, psychological है। मुझे अपने दिल का डर खुल कर बताओ। मैं तुम्हारा डर दूर करूँगी।'

'मैं कुछ नहीं बताऊँगी। तीन बार पुलिस बुला चुकी हूँ। उनसे कहा, मुझे किसी आश्रम में रखवा दो पर मेरी कोई नहीं सुनता। घरवाले कहते हैं, मुझे वहम है।'

'आश्रम में लड़कियां कौन सा सुरक्षित हैं। अच्छा यह बताओ, तुम मासी का घर छोड़ कर नानी मामा के पास क्यों आ गईं?'

'आप क्यों यह सब जानना चाहती हैं?'

'I feel for you, Mukta. I want to help you.'

'मेरी हेल्प इसी में है कि आप मेरी कहीं अच्छी नौकरी लगवा दें, तब तक मैं यहाँ काम करती रहूँ. I want to be independent.'

'यह दुनिया बड़ी खराब है। तुम बहुत छोटी हो। लगती और भी छोटी हो। मैं फ़िक्रमंद हूँ कि तुम्हारा क्या होगा?' मैंने कहा और फिर फुसफुसा कर पूछा, 'तुम्हारे मौसा ने तुम्हारे साथ कुछ किया क्या?'

'नहीं बताऊँगी।'

'तुम्हारे मामा ने तुम्हारे साथ कुछ किया क्या?'

'नहीं बताऊँगी।'

'बताने से तुम्हारे अंदर का डर निकलता पर कोई बात नहीं, मत बताओ,' कहते हुए मैंने फिर उसे गले से लगाना चाहा पर उसने मुझे यह कहते हुए झटक दिया, 'आंटी, आप मुझे फिर छू रही हैं।'

अगले दिन से वह नौकरी पर नहीं आई। यानि उसने नौकरी छोड़ दी। उसने बताया ही था कि जहाँ कोई उसे छुए, वहाँ वह नौकरी नहीं करती।

काश ! मेरे पास ऐसी सुविधा होती कि मैं ऐसी बेसहारा, शोषित लड़कियों को अपनी निगरानी में रख सकती। नेट पर ढूँढूँगी तो ऐसे NGO और नारी आश्रम का पता लगा लूँगी जो ऐसी लड़कियों को सुरक्षा दे सकें। मित्रों, आपको भी पता हो तो बताइए, नॉएडा के आसपास कोई ऐसी सुविधा।

(कहानी कितनी भी सच लगे, उसमें कल्पना का मिश्रण होता है।)

Wednesday, 5 October 2016

About Me

About Me

I am a Hindi Writer. I have restarted writing in August, 2012 after a gap of 12-13 years. In this blog, all my new writings are published which I have been writing since 1st August,'12. I had passed through a phase of absolute 'Vairaagya", living in this world, still not living in it. I also went through the agony of deadly disease Cancer during this period. Now I am completely cured, this is what Doctors say. I had either destroyed or forgotten many things of my past, (also pain of my past), thinking that I had ' left ' this world and I would never again ' wake up '. But God was having some thing else in his store for me. On HIS instructions, I woke up again. Literature is the only place where I could find shelter. I call it my Re-birth.

I have written few books, may be 16. Following are the details.......

1. Prem Prahaar (Poems)
2. Mera Marnaa (Poems)
3. Katghare mein (Poems)
4. Khatm Hone Ke Baad (Stories)
5. Abhi Talaash Jaari Hai (Stories)
6. Apna Apna Sach (Stories)
7. Anveshi (Stories)
8. Swapnadansh (Stories)
9. Ye Kahaniyaan (Collection of Stories)
10. Dhaai Aakhar Prem Ka (Stories)
11. Jag Ka Mujra (Stories)
12. Paru Ne kaha tha (Novellett)
13. Prasangvash (Essays)
14. Agyeya : Ek Moolyaankan (Edited)
15. Uska Bachpan (Naatya Roopantar)
16. Terah Kahaniyaan (Edited)

5 more books, written during August, 2012 to September, 2014 are ready for publication.

I published and edited a literary magazine Vaichariki Sankalan from August, 1986 to 1996-1998 (do not remember the month/year of last issue) with a gap of few years in between. I have to search if I have any copy of it with me.

I created (made) Audio Cassettes of Hindi Story Tellling in 1992. (I got the inspiration in Guyana). These audio cassettes consisted stories by Prem Chand, Sharat Chandra, Kamleshwar, and Manika Mohini (me). This venture was not welcomed in our country. After keeping them safe with me for long, I threw them all. Now I do not think, I have a copy of them. 

I wrote Dialogue of a Hindi Film, Sandhya Chhaya, directed by Jyoti Swaroop. The film was telecast on Doordarshan in February, 1994. I was a dialogue writer with the same Director, of few episodes of Tele Serial, Parvarish (old), telecast on Zee T V, some time between 1989-1993, I do not remember exact year.

I worked with Central Govt. on Gazetted post in Delhi, Mumbai and South America (Guyana - Georgetown in the High Commission of India on the post of Attache - Education and culture)

I am a Post Graduate from Delhi University. I left my Ph D (D U) in the middle. I also left B Ed (Jamia Milia) and second M A (Psychology) (D U) in the middle.

At present, I am residing in Noida. Apart from Writing, I am running a Retail Showroom of Handicrafts & Gifts, named Sankalan Art Gallery in Noida. I also have a Boutique, named Barkha's Boutique. My email ID is mohinimanika@gmail.com .

मैं जो रचनाएं आजकल लिख रही हूँ, चाहे मैंने उन्हें कहीं छपने के लिए भेजा हो परन्तु वे स्वान्तः सुखाय ही हैं. बीच-बीच में मैं मानसिक तौर पर वापस अपनी खोह में लौट जाती हूँ जहां कोई दूसरा नहीं है. न किसी लक्ष्य पर पहुँचने की इच्छा, न तैयारी. न किसी से मिलने की ललक, न ज़रूरत. मैं उस मुकाम पर हूँ, जहां मैं अपने आप में संतुष्ट हूँ. आप कह सकते हैं कि मैं मर चुकी हूँ. मुझे ख़ुशी होगी यदि सब मुझे मरा हुआ समझ लें तो.

But this is also true that now I feel, I am the happiest person on this earth. I want to live fully. Now I know the art of living happily, peacefully and successfully. But there is a saying, ' When you learn, how to live, you are too old to live.' I remember one couplet, I read somewhere recently, which fits my mood of these days......

ऐ फलक, चाहिए जी भर के नज़ारा हमको 
जाके आना नहीं दुनिया में दोबारा हमको।


मणिका मोहिनी

प्राक्कथन

प्राक्कथन

(मेरे सद्य प्रकाशित कहानी संग्रह 'कभी हम भी तुम भी थे आशना' का प्राक्कथन)

मेरी सर्जनात्मक साहित्य से जुड़ी 16 पुस्तकें 1996 तक प्रकाशित हो चुकी थीं. उसके बाद लगभग 15 वर्ष मैं नितांत अकेलेपन में रही, जिसे 'मैं वैराग्य' कहती हूँ. पुस्तकों से, लिखने-पढ़ने से, सामाजिक सम्मिलनों से एकदम दूर. इस दुनिया में रहते हुए भी इस दुनिया में नहीं. इस बीच मैं कैंसर नाम की अत्यंत भयंकर और शाही बीमारी के दौर से भी गुज़री. जीने की समस्त इच्छाएँ जब समाप्त हो जाएँ, कोई मोहमाया न रहे, लगे, सब जी लिया, कुछ और जीने को सेष नहीं है, हर राग से दूर, तो उसे वैराग्य ही कहेंगे ना?

मुझे अपने अतीत की बहुत सारी बातें भूल गईं, लोग भूल गए, कभी-कभी लगता, बस एक लकीर है, एक लक्ष्मण रेखा, जिसे पार किया तो सब समाप्त. दिमाग़ फ़ेल. लेकिन दिमाग़ फ़ेल होने से बच गया, बस खाली हो गया. या यूँ कहूँ कि ताज़ा भरने के लिए फ्रेश हो गया.

मुझे नियति पर घनघोर विश्वास है. चमत्कारों पर भी. तो यह नियति का ही खेल था कि अगस्त, 2012 में मेरे लेखक का पुनर्जन्म हुआ. भगवान के निर्देश से मरी हुई मैंने दोबारा जन्म लिया. सोई हुई मैं लंबी नींद से जागी। साहित्य मेरे लिए एकमात्र शरणस्थली रहा है, जहाँ मैंने पहले भी कई बार टूटते हुए शरण ली है.

पुनर्जन्म के बाद मैंने जो भी लिखा, स्वान्तः सुखाय लिखा. चाहे छपने के लिए कहीं भेजा हो, परंतु वे स्वान्तः सुखाय ही हैं. बीच-बीच में मानसिक तौर पर वापस अपनी खोह में लौट जाती हूँ, जहाँ कोई दूसरा नहीं है. न किसी लक्ष्य पर पहुँचने की इच्छा, न तैयारी. न किसी से मिलने की ललक, न ज़रूरत. मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ मैं अपने आप में संतुष हूँ. आप कह सकते हैं कि मैं मर चुकी हूँ.

पाँच-छह पुस्तकें छपने के लिए तैयार हैं, पर अभी भी जैसे अर्धनिद्रा में हूँ. उदासीनता का दौर है. आलस है. वैराग्य है. उत्साहहीनता है. एकाध बार कोशिश की थी प्रकाशक खोजने की लेकिन दिल और दिमाग़ में इतनी ताकत नहीं थी कि जी-जान से जुट जाती. इस पुस्तक के छपने के पीछे बहुत सालों पहले की लेखिका सखी कृष्णा अग्निहोत्री का स्नेह-सौहार्द्य काम आया, जिनके सहयोग से श्री अरविन्द बाजपेयी, अमन प्रकाशन, कानपुर ने बिना किसी शर्त के पुस्तक छापने के लिए सहमति दी. मैं इन दोनों की हृदय से आभारी हूँ. उन पाठकों की भी शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने पुस्तक रूप में आने से पूर्व इन कहानियों को पढ़ा और सराहा.

मणिका मोहिनी 

Tuesday, 27 September 2016

Two Liner

Two Liner

1.
मेंरे मरने के बाद भी मेरी आँखेँ खुली रहीं
न जाने किस खुशी का इंतज़ार था तमाम उम्र?

2.
मेरी कब्र को दो गज़ ज़मीन से ज़्यादा जगह देना
मुझे बेचैनी में करवटें बदलने की आदत है.

Wednesday, 7 September 2016

फ्री सेक्स

फ्री सेक्स

पत्रिका 'हंस' के सितंबर अंक में प्रकाशित विश्वदीपक के फ्रीसेक्स पर लिखे गए लेख ने एक बार फिर इस मुद्दे को उठाया है कि क्यों ना स्त्री को (पुरुष को भी) फ्री सेक्स यानि जिसके साथ मन चाहे, यौन सम्बन्ध बनाने की आज़ादी हो?

इसी वर्ष मई में यह मुद्दा इन्टरनेट पर उछला था जब ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा था, 'जिस सेक्स में स्वतंत्रता का अहसास नहीं है, वह रेप के बराबर है.' कविता की माँ लक्ष्मी कृष्णन ने भी अपनी बेटी के कथन से सहमति जताते हुए लिखा था कि हाँ, उन्होंने भी फ्री सेक्स का आनंद लिया है और कविता उस फ्रीसेक्स की ही उपज है. उनका मतलब यह था कि उन्होंने अपने पति के साथ स्वेच्छा से सम्बन्ध बनाया, उसी से कविता बेटी उत्पन्न हुई.

उस समय जो भी बहस हुई, उसमें कविता और उनकी माँ ने फ्रीसेक्स का अर्थ यह दिया कि पति के साथ अपनी इच्छा से सेक्स किया. यानि उन्हें फ्री सेक्स का सही अर्थ नहीं मालूम था.

पति के साथ सेक्स किया तो क्या अनोखा किया?

फ्री सेक्स का अर्थ है, जिस-तिस के साथ यौन सम्बन्ध बना लेना. One night stand की तरह.

उस समय मधुमती अधिकारी ने इस पर पोस्ट लिखी थी और मुझसे कहा था कि लोग फ्री सेक्स का अर्थ नहीं समझते, मैं इस पर कुछ लिखूँ। लेकिन मैं नहीं लिख पाई थी. आज फिर से इस विषय में पढ़ा तो सोचा, इस लेख के हवाले से ही कुछ लिखूँ।

यौन संबंधों की आज़ादी वैदिक काल से चली आ रही है. मराठी इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े की चर्चित पुस्तक 'भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' में कहा गया है.... 

तीनों लोकों की रचना करने वाले ब्रह्मा में अपनी बेटी सरस्वती के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित किया था.

यम और यमी नाम के भाई बहन एक दूसरे के साथ पति-पत्नी की तरह रहते थे.

पाराशर ऋषि ने सुगंधी नाम की मत्स्य कन्या के साथ खुले में सम्भोग किया था.

चन्द्रमा अपने गुरू बृहस्पति की पत्नी तारा के साथ पति की हैसियत से रहते थे.

द्रौपदी और कुंती की कथा किसे नहीं मालूम?

लेखक विश्वदीपक ने अपने लेख में प्रश्न किया है, 'अगर यमी की भाई के साथ सम्भोग करने की इच्छा गलत नहीं है तो फिर किसी भी दूसरी लड़की की अपनी पसंद के पुरुष के साथ सम्भोग करने की इच्छा कैसे गलत हो गई?'

वैदिक काल की इस जीवन शैली का समर्थन मैं नहीं करती. मैं नहीं कहती कि वह अनुकरणीय है. सगे, खून के रिश्तों में हुए इस घालमेल की बातें पढ़-सुन कर मेरे मन में वितृष्णा उपजती है. उस समय का युग और था. तब चाहे भगवान पैदा हुए हों जिनकी हर बात को हम सही ठहराने के तर्क ढूँढ लेते हैं लेकिन इस युग तक आते-आते हमने जो सभ्यता विकसित की है, उसमें इस प्रश्न की कोई गुंजाइश नहीं कि उन्होंने ऐसा किया तो हम क्यों नहीं कर सकते? आज पीछे लौट कर हम उनसे यह नहीं पूछ सकते कि जैसा हम कर रहे हैं, आप वैसा क्यों नहीं कर सकते?

हर युग की मान्यता अलग होती है. रिश्तों का सम्मान ज़रूरी है, उसमें घालमेल नहीं होना चाहिए,

हाँ, फ्री लोगों को गैरों के साथ फ्री सेक्स करने की आज़ादी होनी चाहिए. मैं फ्री सेक्स की समर्थक हूँ, लेकिन रिश्तों में गन्दगी की नहीं.

Sunday, 14 August 2016

एक लड़की

एक लड़की

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे बुझता चिराग़
जैसे आँखों में ख्वाब
जैसे बहका हो मन
जैसे तन में अगन
जैसे भटकी-भटकी
जैसे भीग रही हो बिन बरसात के।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे खेल रही है भीड़ में
जैसे खोज रही है भीड़ में
किसी का थामने को हाथ
हाय कोई तो दे उसका साथ
किसी को चुरा कर ले जाए
उड़ जाए बेहद्दी आकाश में।

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे डोल रही है कटी पतंग सी
ज़िन्दगी ऐसे जैसे मलंग सी
आदतें ऐसी जैसे लफंग सी
रास्तों की कमी नहीं
मंज़िल का पता नहीं
जाए तो जाए कहाँ अवसाद में?

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
जैसे हँसूँ उसके ऊपर
या कि रोऊँ उसके ऊपर
या कि लिखूँ गाथा उसकी
या कि छोड़ूँ उसका किस्सा
लिख-लिख कर बदनाम कहानी
उसने खुद को दी सौगात में।

Tuesday, 9 August 2016

कवयित्री शुभम श्री

कवयित्री शुभम श्री

एक कविता पर साहित्य जगत में हंगामा मचा है. कवयित्री शुभम श्री की कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' को इस वर्ष का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देने का निर्णय निर्णायक उदय प्रकाश के द्वारा लिया गया. चारों तरफ से जो विरोध के स्वर उठे तो उदय प्रकाश का स्पष्टीकरण वक्तव्य आया है जो नीचे प्रस्तुत है. कमाल यह है कि न युवा कवयित्री की कविता किसी को समझ (पसंद) आई, न निर्णायक का स्पष्टीकरण. मुझे भी नहीं. शायद आपको पसंद आए. कितनी बकवास कविता है, यह तो हम बाद में सोचेंगे, पर सवाल यह है कि यह कविता है भी या नहीं? पर पुरस्कृत है, इसलिए पढ़ लीजिए. 
पोएट्री मैनेजमेण्ट
कविता लिखना बोगस काम है ! अरे फ़ालतू है ! एकदम बेधन्धा का धन्धा ! पार्ट टाइम ! साला कुछ जुगाड़ लगता एमबीए-सेमबीए टाइप मज्जा आ जाता गुरु ! माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता सेंसेक्स लुढ़का चैनल पर चर्चा यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू? वित्त मन्त्री का बयान छोटे निवेशक भरोसा रखें आरबीआई फटाक रेपो रेट बढ़ा देगी मीडिया में हलचल समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है आपको क्या लगता है आम आदमी कैसे सामना करेगा इस संग्रह का ? अपने जवाब हमें एसएमएस करें अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी ! हर प्रोग्राम में ऐड आएगा रिलायंस डिजिटल पोएट्री लाइफ़ बनाए पोएटिक टाटा कविता हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे अरे वाह बहुत शानदार है किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है नहीं जी, इम्पोर्टेड है असली तो करोड़ों डॉलर की थी हमने डुप्लीकेट ले ली बच्चे निबन्ध लिखेंगे मैं बड़ी होकर एमपीए करना चाहती हूँ एलआईसी पोएट्री इंश्योरेंस आपका सपना हमारा भी है डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ़ पैट (पोएट्री एप्टीट्यूड टैस्ट) की परीक्षाओं में फिर लड़ियाँ अव्वल पैट आरक्षण में धाँधली के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला देश में आठ नए भारतीय काव्य संस्थानों पर मुहर तीन साल की उम्र में तीन हज़ार कविताएँ याद भारत का नन्हा अजूबा ईरान के रुख़ से चिन्तित अमेरिका फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त ये है ऑल इण्डिया रेडियो अब आप सुनें सीमा आनन्द से हिन्दी में समाचार नमस्कार आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली काव्य संकलन पैदा करेंगे भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी काआज तड़के निधन हो गया उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता समाचार समाप्त हुए आ गया आज का हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर युवाओं पर चढ़ा पोएट हेयरस्टाइल का बुखार कवियित्रियों से सीखें हृस्व दीर्घ के राज़ ३० वर्षीय एमपीए युवक के लिए घरेलू, कान्वेण्ट एजुकेटेड, संस्कारी वधू चाहिए २५ वर्षीय एमपीए गोरी, स्लिम, लम्बी कन्या के लिए योग्य वर सम्पर्क करें
गुरु मज़ा आ रहा है सुनाते रहो अपन तो हीरो हो जाएँगे जहाँ निकलेंगे वहीं ऑटोग्राफ़ जुल्म हो जाएगा गुरु चुप बे थर्ड डिविज़न एम० ए० एमपीए की फ़ीस कौन देगा? प्रूफ़ कर बैठ के ख़ाली पीली बकवास करता है !
अब निर्णायक का स्पष्टीकरण....
समकालीन युवा कविता का सबसे प्रतिष्ठित और बहुचर्चित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार इस बार युवा कवयित्री शुभमश्री, (जन्‍म 1991) की कविता 'पोएट्री मैनेजमेंट' को देने का निर्णय लिया गया है।

यह कविता नयी दिल्‍ली से प्रकाशित होने वली अनियतकालिक पत्रिका 'जलसा-4' में प्रकाशित हुई है।

बहुत कम उम्र और बहुत कम समय में शुभमश्री ने आज की कविता में अपनी बिल्‍कुल अलग पहचान बनाई है। कविता की चली आती प्रचलित भाषिक संरचनाओं, बनावटों, विन्‍यासों को ही किसी खेल की तरह उलटने-पलटने का निजी काम उन्‍होंने नहीं किया है बल्कि समाज, परिवार, राजनीति, अकादेमिकता आदि के बारे में बनी-बनाई रूढ़ और सर्वमान्‍य हो चुकी बौद्धिक अवधारणाओं के जंगल को अपनी बेलौस कविताओं की अचंभित कर देने वाली 'भाषा की भूल-भुलइया' में तहस-नहस कर डाला है। हमारे आज के समय में शुभमश्री एक असंदिग्‍ध प्रामाणिक विद्रोही (rebel) कवि हैं। सिर्फ पच्‍चीस वर्ष की आयु में इस दशक के पिछले कुछ वर्षों में उनके पास ऐसी अनगिनत कविताएं हैं, जिन्‍होंने राजनीति, मीडिया, संस्‍कृति में लगातार पुष्‍ट की जा रहीं तथा हमारी चेतना में संस्‍कारों की तरह बस चुकी धारणाओं, मान्‍यताओं, विचारों को किसी काग़ज़ी नीबू की तरह निचोड़ कर अनुत्‍तरित सवालों से भर देती हें। औश्र ऐसा वे कविता के भाषिक पाठ में प्रत्‍यक्ष दिखाई देने वाली किसी गंभीर बौद्धिक मुद्रा या भंगिमा के साथ नहीं करतीं, बल्कि वे इसे बच्‍चों के किसी सहज कौतुक भरे खेल के द्वारा इस तरह हासिल करती हैं कि हम हतप्रभ रह जाते हैं। इतना ही नहीं वे अब तक लिखी जा रही कविताओं के बारे में बनाये जाते मिथकों, धारणाओं और भांति-भांति के आलोचनात्‍मक प्रतिमानों द्वारा प्रतिष्ठित की जाती अवधारणाओं को भी इस तरह मासूम व्‍यंजनाओं, कूटोक्तियों से छिन्‍न-भिन्‍न कर देती हैं कि हमें आज के कई कवि और आलोचक जोकर या विदूषक लगने लगते हैं। उनकी एक कविता 'कविताएं चंद नंबरों की मोहताज हैं' की इन पंक्तियों के ज़रिए इसे समझा जा सकता है:

'भावुक होना शर्म की बात है आजकल और कविताओं को दिल से पढ़ना बेवकूफ़ी / शायद हमारा बचपना है या नादानी / कि साहित्‍य हमें जिंदगी लगता है और लिखे हुए शब्‍द सांस / कितना बड़ा मज़ाक है कि परीक्षाओं की तमाम औपचारिकताओं के बावजूद / हमें साहित्‍य साहित्‍य ही लगता है प्रश्‍नपत्र नहीं / खूबसूरती का हमारे आसपास बुना ये यूटोपिया टूटता भी तो नहीं... नागार्जुन-धूमिल-सर्वश्‍वर-रघुवीर सिर्फ आठ ंनबर के सवाल हैं।'

अपने भाषिक पाठ में बच्‍चों का खेल दिखाई देतीं शुभमश्री की कविताएं गहरी अंतर्दृष्टि और कलात्‍मक-मानवीय प्रतिबद्धता तथा निष्‍ठा से भरी मार्मिक डिस्‍टोपिया की बेचैन और प्रश्‍नाकुल कर देने वाली अप्रतिम कविताएं हैं।

शुभमश्री ने किसी कर्मकांड या रिचुअल की तरह रूढ़, खोखली, उकताहटों से भरी पिछले कुछ दशकों की हिंदी कविता के भविष्‍य के लिए नयी खिड़कियां ही नहीं खोली हैं बल्कि उसे जड़-मूल से बदल डाला है। जब कविता लिखना एक 'फालतू' का 'बोगस काम' या खाते-पीते चर्चित पेशेवरों के लिए 'पार्ट टाइम' का 'बेधंधे का धंधा' बन चुकीं थीं, शुभमश्री ने उसे फिर से अर्थसंपन्‍न कर दिया है।

उनकी कविताएं हमारे समय की विता के भूगोल में एक बहुप्रतीक्षित दुर्लभ आविष्‍कार की तरह अब हमेशा के लिए हैं।

उदय प्रकाश




Tuesday, 2 August 2016

Jyotsna Misra

Jyotsna Misra

मेरी फेसबुक मित्र ज्योत्स्ना मिश्रा (Jyotsna Misra) ने कल शाम मुझे यह सन्देश भेजा कि उनकी एक कविता वायरल हो रही है, बहुत लोगों के स्टेटस पर नज़र आ रही है, वे क्या करें?
मैं खुद इस साहित्य चोरी की Victim (पीड़ित) रही हूँ. मैं इसीलिए अपनी कविता-कहानी शेयर करने के लिए मना करती हूँ कि समयान्तर में किसी अन्य के नाम से कहीं की कहीं पहुँच जाएगी. आप ही बताएँ कि इस समस्या का समाधान क्या है? कुछ नासमझ लोग कहते हैं कि आपका लिखा बहुत कोगों तक पहुँच रहा है, आपको ख़ुशी होनी चाहिए. अजी जब हमारे लिखे के साथ हमारा नाम ही नहीं है, लिखे का श्रेय पोस्ट उड़ाने वाले ले रहे हैं तो क्या ख़ाक ख़ुशी होगी? अब नीचे पढ़िए....
Conversation started today
17:35
Jyotsna Misra
मनिका जी एक कमाल की बात आपको बताना चाहती हूँ मैने 11अप्रैल को अपनी एक कविता "औरतें अजीब होती हैं" फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी. मै कोई कवि नही एक गायनकोलाॅजिस्ट हूँ जिसे कभी कभार अपने मरीजों से किस्से कविताएँ मिल जाती हैं.
यह कविता मैने इन्डियन मेडिकल एसोसिएशन के महिला दिवस के समारोह के लिए लिखी थी और पढ़ी थी.
अब पता चल रहा है कि यह बहुत लोगों को पसंद आ रही है.
इसके सैकड़ों शेयर हो चुके हैं.
कविता कवि को पीछे छोड़ बहुत आगे निकल चुकी है.
कविता वायरल है. कवि का कोई नाम नहीं जानता।
गूगल आंटी भी कविता से परिचित हैं, कवि से नहीं।
यहाँ तक तो फिर भी गनीमत थी
पर कुछ अति उत्साहित महानुभावों ने इसे गुलजार साहब के माथे मढ़ दिया है.
कौन समझाये इन्हें कि गुलजार साहब इतना कच्चा नहीं लिखते।
बेचारे गुलजार साहब।
और बेचारी मैं.
आपकी मित्र सूची में शामिल ममता कश्यप जी ने भी इसे गुलजार की कह कर पोस्ट किया है.
डर है किसी दिन आपने भी इसे गुलजार की कह दिया तब तो ये अफवाह सच हो जायेगी।
क्या किया जाये ?
कुछ मदद करेंगीं क्या ?
कितनों से एतराज करूं? पता नहीं, कहाँ कहाँ घूम रही है?
क्राफ्ट के हिसाब से बहुत कच्ची है. मुझे अंदाज़ा ही नहीं लगा कि ऐसे उड़ जायेगी।
फेसबुक पर सर्च में "औरते अजीब होती हैं" डाल कर देखें। अनगिनत पोस्ट हैं.
किस किस को बताऊं? समझ नही आ रहा, कैसे इसे अपनी क्लेम करूं?
ममता कश्यप (Mamta Kashyap) जी ने 29 जुलाई को, गुलजार की है, ये क्या सोच कर लिख दिया?
ध्रुव जी ने भी लाइक मार दिया।
richasameer03 ने अपने पेज अपना अपना आसमान में इसे 14 अप्रैल को प्रकाशित किया है.
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मुझे पीड़ित लोगों से सच में हमदर्दी होती है. साथ ही ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए मेरा अंतर्मन मुझे उकसाता है. मेरी कविता की चोरी होने पर मेरा क्रोध सीमा पार कर जाता है. ज्योत्स्ना की भलमनसाहत देखिए, मुझे लिखती हैं, 'इसे चोरी कह कर मै कविता पसंद करने वालों का दिल नही दुखाना चाहती। बस कविता के साथ अपना नाम जुड़ा चाहती थी.' नीचे वह कविता दे रही हूँ और ज्योत्स्ना मिश्रा के चित्र भी.
औरतें अजीब होतीं हैं
लोग सच कहते हैं
औरतें अजीब होतीं है
रात भर सोती नहीं पूरा
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं
दरवाजों की कुंडिया
बच्चों की चादर
पति का मन
और जब जगाती सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं
हवा की तरह घूमतीं
घर बाहर
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती
आशायें
पुराने पुराने अजीब से गाने
गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद ये दूर हो कर ही
सब के करीब होतीं हैं
औरतें सच में अजीब होतीं हैं
कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर
देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध
कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर
ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे पेन्सिल किताब
बचपन में खोई गुडि़या
जवानी में खोए पलाश
मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी
छिपन छिपाइ के ठिकाने
वो छोटी बहन
छिप के कहीं रोती
सहेलियों से लिए दिये चुकाए हिसाब
बच्चों के मोजे,पेन्सिल किताब
खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो ?सो गयीं क्या
खाती रहती झिङकियाँ
न शौक से जीती ,न ठीक से मरती
कोई काम ढ़ंग से नहीं करती
कितनी बार देखी है
मेकअप लगाये,चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी
वो ब्यूटीशियन
वो भाभी ,वो दीदी
चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिखही जाती है
काॅरीडोर में
जल्दी जल्दी चलती
नाखूनों से सूखा आटा झाडते
सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल आई
वो लेडी डाॅक्टर
दिन अक्सर गुजरता है
शहादत में
रात फिर से सलीब होतीहै
सच है
औरतें बेहद अजीब होतीं हैं
सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में तितलियां संजोतीं हैं
और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फ़जा़एं सचमुच खिलखिलातीं हैं
तो ये सूखे कपड़ों ,अचार ,पापड़
बच्चों और सब दुनिया को
भीगने से बचाने को
दौड़ जातीं हैं
खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं
अनगिनत खाइयों पर
अनगिनत पुल पाट देतीं
ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों जंगलों में
नदी कीतरह बहती
कोंपल की तरह फूटती
जि़न्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या ?
ऐसा कोई करता है क्या
एक एक बूँद जोड़ कर
पूरी नदी बन जाती
समन्दर से मिलती तो
पर समन्दर न हो पाती
आँगन में बिखरा पडा़
किरची किरची चाँद
उठाकर जोड़ कर
जूड़े में खोंस लेती
शाम को क्षितिज के
माथे से टपकते
सुर्ख सूरज को उँगली से
पोंछ लेती
कौन कर सकता था
भला ऐसा /औरत के सिवा
फर्क है,अच्छे में बुरे में ,ये बताने के लिये
अदन के बाग का फल
खाती है खिलाती है
हव्वा आदम का अच्छा नसीब होती है
लेकिन फिर भी कितनी अजीब होती है
औरतें बेहद अजीब होती हैं
औरतें अजीब होतीं हैं
______ज्योत्स्ना

ज्योत्स्ना ने ये अंतिम शब्द लिख कर मेरा जैसे आभार व्यक्त किया.... 'अभी तक मै आपको एक celebrity की तरह फाॅलो करती थी, अब आपसे व्यक्तिगत रूप से interact कर रही हूँ. बहुत बड़ी बात है ये मेरे लिए.'



Sunday, 31 July 2016

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

ऐसे टाला मैंने विपत्ति को

मित्रों, आज मैंने सोचा, ज़रा खुद को ही सर्च करूँ. गूगल पर Manika Mohini टाइप करके सर्च किया तो भड़ास डॉट कॉम पर छपा अपना यह लेख देखा, जो 2013 में फेसबुक पर दिया था, लेकिन एक मित्र के इस सुझाव पर तुरंत हटा लिया था कि इस लेख से लोग तुम्हें ही बुरा कहेंगे. इस तुरंत जितनी देर में ही भड़ास ने इसे ले लिया. यह मेरे ब्लॉग में भी नहीं है. अब ब्लॉग में भी दे रही हूँ. मैंने इसे कोई शीर्षक नहीं दिया था, शीर्षक भड़ास ने दिया. आपके साथ शेयर कर रही हूँ. जब गूगल पर पब्लिक पढ़ रही है, तो आप मित्र क्यों नहीं पढ़ सकतेसकारात्मक रूप में लीजिएगा.


उस कामातुर मेहमान की मैंने यूं की मेहमानवाज़ी

Category विविध. Created on 04 December 2013  01.53
Written by मणिका मोहिनी 

Manika Mohini : मित्रों, रोज़ रेप की घटनाएं सुनने में आ रही हैं. इस सन्दर्भ में अपने निजी जीवन से जुडी एक घटना आप लोगों के साथ बांटना चाहती हूँ कि मैंने कैसे असामान्य परिस्थिति उत्पन्न होने पर प्रत्युत्पन्नमति से विपत्ति को टाला। हालांकि यह उदाहरण वर्तमान रेप के मामलों में बच कर निकलने में सहायक नहीं हो सकता लेकिन मेरी बात से शायद लड़कियों में कुछ जागरूकता या हौसला-अफजाई हो सके. मैंने एक लेखक के तौर पर अपना अनुभव बांटने के लिए अपने जीवन से जुडी इस घटना को अनावृत करने की हिम्मत जुटाई है. आशा है, आप इसे सकारात्मक रूप में लेंगे।
मैं शुरू से एकदम बिंदास किस्म की थी, जो जी में आए, करना, किसी से नहीं डरना, 'कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा', 'लड़कों की ऐसी की तैसी' टाइप। एक बार किसी कारणवश एक जान-पहचान का लड़का मेरे घर रात को ठहर गया कि उसका घर दूर होने से उसे रात में कोई वाहन नहीं मिल पाएगा, वह सुबह होते ही चला जाएगा। उस समय मेरा दो कमरे का घर था, जिसमें मैं और मेरा किशोर पुत्र रहते थे. मैंने उस मेहमान को बेड रूम में सो जाने के लिए कहा और मैं बालकनी में एक चारपाई पर बेटे के साथ सो गई. बालकनी की कुण्डी मैंने अपनी तरफ से लगा ली. आधी रात के बाद मैंने देखा कि वह मेहमान मेरी बालकनी का दरवाज़ा खटखट कर रहा है और बोल रहा है कि 'खोलो, खोलो, आओ ना.'

बालकनी के दरवाज़े में शीशा लगा हुआ था, इसलिए दोनों तरफ देखा जा सकता था. मैंने उसे कमरे में जाकर सो जाने के लिए कहा लेकिन वह दरवाज़ा खड़खड़ाता रहा और बोलता रहा, 'खोलो, आओ.' मैं पहले तो बहुत डर गई और समझ नहीं पाई कि क्या करूँ। आवाज़ सुन कर मेरा बच्चा बेटा कुनमुनाया लेकिन करवट बदल कर सो गया. अचानक मेरा दिमाग चला और मैंने उस मेहमान को बहुत कोमल आवाज़ में बड़े प्यार से कहा, 'ठीक है, तुम कमरे में जाकर बैठो, मैं आती हूँ.' उसे यकीन हो गया, वह चला गया. मैंने बालकनी का दरवाज़ा खोला और कमरे के दरवाज़े पर पहुंची। वह आराम से पलंग पर बैठा हुआ था, उसे पूरा यकीन था कि मेरे पास और कोई चारा नहीं है, मैं ज़रूर आऊंगी।

मैंने कमरे के बाहर खड़े होकर साहस जुटाया और कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया। मैंने सोचा, सुबह तक के लिए परेशानी ख़त्म हुई लेकिन उसके दिमाग पर फितूर सवार था. उसने अंदर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया। वह एक सरकारी आवासगृह था. मुझे डर लगा कि आसपास के लोगों ने सुन लिया तो बड़ी बदनामी होगी। मैं पहली मंज़िल का वह फ़्लैट बंद करके नीचे आई और उस आवासगृह के चौकीदार को लेकर वापस आई. चौकीदार ने कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसे पीटना शुरू किया। तब तक हल्ला-गुल्ला सुन कर मेरा छोटा-सा बेटा भी जाग गया था.

मैंने बेटे से कहा, 'डंडा ला.' उसे डंडा नहीं मिला, उसने रसोई से झाड़ू लाकर मेरे हाथ में दे दी और मैंने भी उस मेहमान की मेहमाननवाज़ी की. चौकीदार ने उसी समय उसे मेरे घर और आवासगृह से बाहर निकाला। इस प्रकार अपनी प्रत्युत्पन्नमति के कारण मैंने एक अनचाही सिचुएशन से निजात पाई. लेकिन मैंने उसे इतने पर ही नहीं छोड़ा, अगले दिन अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ मिल कर साहित्य और नाटक के सर्कल में उसकी नाकाबंदी की कि वह कहीं भी दिखा तो उसकी खैर नहीं। मित्रों, यह पुलिस-कोर्ट-कचहरी की चेतना तो अब कुछ वर्षों से जागी है. मैंने अपने से जुड़े बहुत सारे मामले खुद निबटाए हैं.

मुझे मालूम है, अब बहुत से लोग मुझे समझाएंगे कि मुझे उसे अपने घर में शरण ही नहीं देनी चाहिए थी. पर-उपदेश घनेरे। बंधुओं, हममें मुश्किलों से निबटने की हिम्मत है, इस भवसागर में डूबने थोड़े ही आए हैं. फिलहाल इतना ही.
क्रिएटिव राइटर मणिका मोहिनी के फेसबुक वॉल से.

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

Cancer Celebration (कैंसर उत्सव)

मैं सोचती हूँ, जो भी लोग कर्मशील है, अपने ध्येय के प्रति जागरूक एवं जुझारू हैं, वे अत्यंत जिजीविषा से भरे होते हैं. उन्हें लगता है कि वे जीवन में कुछ ख़ास करने के लिए आए है, जिसे पूरा करने के लिए उन्हें ज़िंदा रहना ही है. यही जीवन जीने की अदम्य लालसा उनके दुःख-दर्द को भी उत्सवी बना देती है.
मेरे परिवार में कैंसर से कई मौतें हो चुकी थीं, इसलिए 2007 में जब एक दिन ड्राइव करते हुए मेरा दायाँ हाथ स्टीयरिंग व्हील पर ही टिका रह गया, उठा ही नहीं तो मुझे तुरंत लगा कि हो न हो, इसकी वजह कैसर ही है. मैं अकेली धर्मशिला अस्पताल गई और डॉक्टर से कहा कि मेरी बाज़ू काट दो. मैं सोचती थी, अंग-भंग के बाद मुझे और तकलीफों से नहीं गुज़रना पड़ेगा। डॉक्टर ने कॉम्प्लिमेंट दिया, 'आप बहुत बहादुर है,' लेकिन फिर भी सारे टेस्ट करने को बोला।
अगले दिन बेटा रिपोर्ट लेने गया, टेस्ट पॉजिटिव थे, बेटे ने बताया कि रिपोर्ट देख कर वहीँ उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े. उसके अगले दिन ऑप्रेशन हुआ. बाज़ू नहीं कटा.
उसके बाद आठ बड़ी स्ट्रोंग कीमो लगीं, कीमो के दौरान मुँह में छाले, उल्टियाँ, सारा दिन बेहोशी. सिर पर हाथ लगाती तो बालों के गुच्छे हाथ में आ जाते. पार्लर से बाल काटने वाला घर बुलाया गया और पूरे सिर पर उस्तरा फिरवा दिया गया. सिर गंजा हो गया. लेकिन ज़रा सी हिम्मत होते ही खुद ड्राइव करके काम पर जाती थी, बेटे के मना करने के बावजूद।
उसके बाद पचास रेडियो थेरेपी, जल कर शरीर काला पड़ गया था. अभी भी हाथों पर जहाँ-तहाँ कालिख चिपटी हुई है. इतनी सुइयाँ घुपीं कि मैंने डॉक्टर से कहा कि कैंसर से मेरी मौत हो या न हो, इन इंजेक्शंस से ज़रूर हो जाएगी।
आखिरकार मैं ठीक हुई, 10 महीने बाद, डॉकटर के इस विश्वास के साथ कि "मौत तो सबकी होनी है लेकिन आपकी मौत कैंसर से नहीं होगी।"
काम पर जाना मैंने कभी नहीं छोड़ा. कई महीनों तक चलते हुए ऐसा लगता था, जैसे दो पतली लकड़ियों पर कोई कपड़ा झूल रहा हो. डॉक्टर ने बताया था कि कैंसर के बाद शरीर की हड्डियां कमज़ोर पड़ जाती हैं, इतनी कि गिरने का बहुत डर रहता है. और एक बार गिरे तो हिप बोन (Hip bone) या नी बोन (Knee bone) टूटना अवश्यम्भावी है. इसलिए बहुत एहतियात बरतनी पड़ती थी. उस समय से जो बेटे ने हाथ पकड़ कर चलना शुरू किया, आज तक नहीं छोड़ा. अपने काम के अलावा मैं कहीं अकेले नहीं जाती. हर समय बेटा या परिवार साथ होता है. इसलिए बरसों से कहीं अकेले जाने की आदत ही छूट गई.
ठीक होने के बाद घर में पूजा हुई, जश्न हुआ, एक बहुत बड़ी दावत हुई. रिश्तेदारों ने तोहफ़ों के साथ दुआएँ दी.
अब मैं इतनी चुस्त दुरुस्त हूँ, कि कोई कह ही नहीं सकता कि मुझे कभी यह शाही रोग कैंसर हुआ था.
बेटे की शुक्रगुज़ार हूँ कि वह मेरी पूरी बीमारी के दौरान 10 महीने मेरे पास घर पर ही रहा. बरखा ने भी पूरी सेवा की. तो…... दुःख आते जाते रहते हैं, हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।

Wednesday, 27 July 2016

भूमिका द्विवेदी का साक्षात्कार

भूमिका द्विवेदी का साक्षात्कार

अब साक्षात्कार लेने वालों ने पूछा तो बताना ही था। हाँ, किस तरह बताया जाए, यह अलग बात है। कह सकती थी कि इस बारे में कृपया अभी न पूछें। अभी मैं सदमे से उबर जाऊँ, उनका अंतिम क्रियाक्रम पूर्ण हो जाए, तब इस पर बात करेंगे। आर्थिक तंगी की बात करती है, खुद कमा नहीं सकती थी? लोगों से सहयोग (भीख) की अपेक्षा करने की बजाय खुद नौकरी करती। पढ़ी-लिखी है, उम्र भी 30 के आसपास होगी। कहीं नौकरी करके आर्थिक तंगी को दूर कर सकती थी।
यह साक्षात्कार 'जागरण' अखबार में छप चुका है। अख़बार ने इसे शीर्षक भी सोच-समझ कर दिया होगा। नीलाभ की शख्सियत एक लेखक, अनुवादक, पत्रकार की रही है, अतः उनकी युवा लेखिका पत्नी द्वारा दिया गया वक्तव्य महत्वपूर्ण है।
जी, विरासत उन्हें ही मिलेगी लेकिन पति की मृत्यु के दो दिन बाद ही पत्नी ऐसे वक्तव्य दे और मृत्यु के अगले दिन ही फेसबुक पर आ जाए तो दुखद आश्चर्य होता है। विचार का मुद्दा यह है।


Monday, 25 July 2016

भूमिका द्विवेदी की कविता

भूमिका द्विवेदी की कविता

आप चाहे तीसरी पत्नी थीं, पर आपका तो पहला पति था। पति की मृत्यु के दूसरे ही दिन कोई दर्द भरी कविता बेशक लिख ले लेकिन उस कविता को लेकर फेसबुक पर कैसे आ सकता है? क्या इसे फेसबुक का चस्का कहेंगे? जो भी हो, ऐसे लोगों पर एक धिक्कार तो बनता ही है, जो मरने वाले के उठाले तक सब्र नहीं कर सके और फेसबुक पर पतिव्रता नारी के रूप में वाहवाही लूटने आ गए कि भई, एक दिन पहले ही मरे पति का कितना सोग मना रही है। Bhumika pyari, kuchh din to ruk jaati. (Neelabh died on 23 July at 5am, cremated around 5pm same day. This poem was posted on 24 July at 11.33am.· 

अब नहीं मिलेंगे मेरी तकिया पर अधकचरे
अधरंगे बाल तुम्हारे,
अब नहीं देख सकूंगी, प्रेमी करतब
और बवाल सारे
अब नहीं सहला पाऊंगी माथा तुम्हारा
कभी बुखार से तपता
तो कभी शीतल जल जैसा
अब नहीं नहलाऊंगी तुम्हें
कुर्सी पर बिठाकर
चिढ़ाकर
दुलराकर
चन्दन वाले तुम्हारे प्रिय साबुन से..
नहीं पुकारोगे तुम अब बार बार
"मेरी जान एक गिलास ठंडा पानी दे दो,
बाथरूम तक पंहुचा दो मेरी प्यारी"
नीचे सीढ़ियों तक तुम्हारी कार आते ही मोहल्लेवाले अब नहीं बतायेंगे मुझे,
"भाभी अंकलजी आ गये,
लिवा लाईये उन्हें"
"दीदी अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये.." कामवाली बाईयाँ भी हरकारा नहीं देंगी इस तरह.
अब दवा खिलाने नहीं आऊंगी तुम्हें,
ना करवाऊंगी अल्ट्रासाउन्ड, ना डौपलर, ना सिटी स्कैन, ना ब्लड, न यूरिन, न, खंखार का टेस्ट तुम्हारा बार बार.
अब गिड़गिड़ाऊंगी भी नहीं कि खाना खा लो, देखो दवा का टाइम हो गया है."
अब नहीं सुनाओगे तुम मुझे मेरी पसंद की कविता,
ना गढ़ोगे शेर और जुमले मुझ पर
ना खींचोगे मेरी फोटो, ना फ़्रेम करवाओगे उनपर
न सजाओगे मुझे कहीं ले जाने के लिये.
अब तो बस
हवा में तैरेंगी खूब सारी बातें तुम्हारीतुम्हें शून्य से भी ना जानने वाले
लगायेंगे तोहमतें मुझपर
अब तो सिर्फ़ कड़वी ज़बान
कड़वे झूठ सुनकर
रोती रहूंगी
तुम्हारा प्रेम याद करके अकेले उसी कमरे में
जहां बैठते थे तुम और हम
और खूब शिक़वे
खूब ठहाके
खूब फ़िकरे
और थोड़ी सी आत्मीयता भी
सहलायेगी मेरा मन
मेरा एकदम-से अकेला हुआ मन
तुम थोड़ा और रुकते
तो मजबूत बना जाते मुझे
तुम्हें तो अपनी दिवंगत पत्नी
और यारों से मिलने की जल्दी पड़ी थी.
तुम क्यूं इतनी जल्दी
हाथ छोड़ गये मेरा.
इतनी भी क्या जल्दी थी जी......



नीलाभ अश्क : मृत्यु 22 जुलाई

नीलाभ अश्क
निरंकुश बवाल, जी का जंजाल
मृत्यु 23 जुलाई.

'लागा चुनरी में दाग' शीर्षक से मैंने हाल ही में कुछ लेखकों के संस्मरण लिखे थे, उसी श्रृंखला में यह लेख 8 अप्रैल, '16 को लिखा और पोस्ट किया था, जो नीलाभ ने भी पढ़ा था. यह लेख कुछ परिवर्तन के साथ यहाँ पुनः दे रही हूँ.

इस चुनरी में दाग़ क्या, यह तो पूरी दाग़-दगीली है. नीलाभ के बारे में कुछ लिखना, मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के समान है. आ बैल, मुझे मार. मेरी हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी।

मैं नीलाभ के बारे में क्या जानती हूँ? मुझे नहीं ध्यान कि मैं नीलाभ से कभी मिली होऊं. वे जब अपने दिल्ली के किस्से बयान करते थे तो मैं हैरान होती थी कि वे दिल्ली में रहते थे. हाँ, हमारी बात फोन पर अवश्य हुई थी, वह भी पिछले एक वर्ष के दौरान ही. शायद दो-तीन वर्ष वे मेरे फेसबुक मित्र भी रहे. जो मैं उनके बारे में जानती हूँ, वह सारा जगत जानता है. मैं अकेली इस बात का श्रेय नहीं ले सकती कि मैं उनके बारे में कुछ ख़ास जानती हूँ. उनका हर आम और ख़ास चौराहे पर सजा हुआ है. न न, किसी दूसरे ने यह सत्कार्य करने की ज़हमत नहीं उठाई, उन्होंने खुद सजाया है.

मैंने इनका नाम सुना उपेंद्र नाथ अश्क के पुत्र के रूप में. उपेंद्र नाथ अश्क जी लेखन के साथ-साथ पुस्तक-प्रकाशन का काम भी करते थे. उनके प्रकाशन व्यवसाय का नाम था, नीलाभ प्रकाशन। नीलाभ उनके पुत्र का नाम है. जैसे आमतौर पर लोग अपने बच्चों के नाम पर अपने व्यवसाय का, घर का नाम रख देते हैं, वैसे ही नीलाभ प्रकाशन नाम रखा गया, यह उन्होंने मुझे इसी रूप में बताया भी था कि उन्होंने अपने बेटे के नाम पर प्रकाशन का नाम रखा है. उन्होंने मेरा एक कहानी संग्रह प्रकाशित किया था, जो उन्होंने मुझसे खुद माँगा था, नई लेखिका होने के नाते। उपेंद्र नाथ अश्क जी ही इस सिलसिले में मुझसे मिले भी थे, किसी काम से दिल्ली आए होंगे, शायद किसी गेस्ट हाउस या होटल में ठहरे थे, वहीँ मुझे मिलने के लिए बुलाया था. उन्होंने मुझे रॉयल्टी स्वरूप एक मनीऑर्डर भी भेजा था, जो बहुत ही थोड़ी राशि का था, टोकन अमाउंट की तरह. मैं उसे पाकर बहुत खुश हुई थी, इसलिए भी कि उस समय मेरे दिन बहुत कड़की में गुज़र रहे थे. तब तक मैंने नीलाभ का नाम इतना भर सुना था कि अश्क जी के बेटे का नाम नीलाभ है.

पिता का व्यवसाय, सम्पत्ति पुत्र को विरासत के रूप में मिलती है, लेकिन पिता के निर्णय, चुनाव. उनके अपने जीवन में किए गए कार्य, इन सब को पुत्र अपना नहीं कह सकता. इसलिए जब नीलाभ ने यह कहा कि उन्होंने मेरा कहानी संग्रह छापने का गुनाह किया है, तो मुझे हैरानी हुई थी. वे बाइज़्ज़त इस गुनाह से बरी हों. यह यदि गुनाह था तो इस गुनाह के हकदार उनके पिताश्री थे, वे नहीं.

नीलाभ ने उस संग्रह की कहानियाँ लगभग एक वर्ष पहले ही पढ़ी थीं और उन पर एक बेहद खूबसूरत टिप्पणी की थी (जो फेसबुक पर छपी थी) कि 'मणिका मोहिनी की कहानियाँ समय से आगे की कहानियाँ हैं, इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित होना चाहिए.' मेरी कहानियों के प्रति नीलाभ जी की इस राय की मैं ह्रदय से आभारी हूँ. नीलाभ यदि अपने पिता के व्यवसाय के प्रति संवेदनशील होते और इसे अच्छा काम समझते तो इस रिटायरमेंट की अवस्था में इसे पुनः शुरू कर सकते थे. उनके पास एक युवा बीवी थी इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए. फिर मेरे उस संग्रह का दूसरा संस्करण छापने का गुनाह करते। तब खुल कर कन्फेशन करते कि यह गुनाह किया है.

चाहे कोई मुझसे दुश्मनी करे, मैं लम्बे अर्से तक उसके लिए अपने मन में वैमनस्य नहीं रख पाती, नीलाभ के कुछ प्रेम पत्र (क्षमा कीजिए, हम गालियों को भी प्रेम पत्र कहते हैं) मेरे फोन के मैसेज बॉक्स में सुरक्षित हैं. मुझसे दुश्मनी इसलिए नहीं होती क्योंकि मैं हर बात के पीछे व्यक्ति का मनोविज्ञान समझने की कोशिश करती हूँ. 

मैंने नीलाभ का मनोविज्ञान यह समझा है कि वे मन के भीतर बहुत अकेले थे. उन्हें दूर-दूर तक कोई अपना नज़र नहीं आता था. उन्होंने जीवन में बहुत खोया, पाया कुछ नहीं. जिसे लोग उनके द्वारा 'पाना' समझ रहे हैं, वह मृगतृष्णा है. न वे किसी से प्यार करते थे, न कोई उनसे प्यार करता था. न वे किसी के अपने थे, न कोई उनका अपना था. मैंने सुना था कि वे पक्के शराबी थे. शराब पीकर प्यार नहीं किया जाता, सेक्स किया जाता है. हैविंग सेक्स और मेकिंग लव में बहुत बड़ा फर्क होता है. सब वक़्त-कटी का मामला था. वे बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाते थे और उसे बुद्धि से समझने की कोशिश नहीं करते थे. उनका क्रोध उनकी बुद्धि से आगे चलता था. अपने क्रोध के कारण उन्होंने बहुत से लोगों से रिश्ते बिगाड़े।वैसे भी उन्हें बना के रखना नहीं आता था. उनके जीवन में अनन्त समस्याएँ थीं, पर उनकी समस्याओं में उनसे सही सलाह-मश्वरा करने वाला उनका कोई मित्र / मित्राणी या तो नहीं था या वे किसी की सुनते नहीं थे. उनका एक सौभाग्य था कि कम से कम दुनिया-दिखावे के लिए एक रिश्ता उनके पास था.

यह दुखद स्थिति थी कि इतना अकेलापन झेल कर भी उन्हें जीना नहीं आया. बहुतों को नहीं आता. यह जीवन जीना भी एक कला है जो सबको नहीं आती. उन्होंने यौवन गुज़ारा 'ज़िन्दगी के भी मज़े और मौत से गाफिल नहीं' अंदाज़ में. अंत समय के लिए कुछ बचा कर नहीं रखा, 'जिसने दिया है तन को, देगा वही कफ़न को' अंदाज़ में. 70 साल की उम्र के किसी व्यक्ति को रोज़ी-रोटी कमाने के लिए खटना पड़े तो यह दुखद स्थिति है. उनकी तीसरी युवा बीवी, स्त्री की आज़ादी की पक्षधर, भी उन पर आश्रित थी. पता नहीं क्यों? (उनकी मृत्यु के अगले दिन फेसबुक पर प्रकाशित उनकी पत्नी की कविता से पता चला कि कामवाली बाइयाँ हरकारा देती थीं, 'दीदी, अंकल जी फ़िर बाहर, वौशरूम, फ़्रिज के पास, दरवाज़े पर, आलमारी के पीछे गिर गये हैं, किसी को बुलाईये, इन्हीं उठाईये..' ओह, यह पढ़ कर तो दिल दहल उठा. पत्नी के घर में होते हुए भी उन्हें सहारा देकर वॉशरुम, फ्रिज, दरवाज़े, अलमारी के पास ले जाने वाला भी कोई नहीं था. चाहे किसी ने कितने भी ज़ुल्म किए हों, उसकी असहाय अवस्था में उस पर थोड़ा तो तरस खाओ. ये दो-दो, चार-चार शादियां करने वाले ऐसी ही बुरी मौत मरते हैं. अगर इस भले आदमी का अंतिम वक़्त सुकून भरा होता तो वह दो क्या, एक भी माफीनामा नहीं लिखता. उसका ज़मीर नहीं जागा था, मौत की भयंकरता उससे हाथ जुड़वा रही थी.

जीवंत रचनाएँ लिखने वाले एक लेखक की अपनी ज़िन्दगी की कहानी इतनी मरी हुई होगी, मुझे विश्वास न था. नीलाभ के जीवन की कहानी आकर्षित भी करती है और उदास भी. एक बौद्धिक, प्रतिभाशाली, उम्रदराज़ पुरुष, किसी ने भी उसे प्रेम नहीं किया। कई बार वह मुझे victim (सताया हुआ) लगता है, तो कई बार शातिर, और कई बार मूर्ख. अनेक बार ख्याल आया है कि क्या प्रतिभाशाली व्यक्ति इतना नादान भी होता है जो अपने से जुड़े स्वार्थी तत्वों को पहचान नहीं पाता? आखिर उसकी कौन सी दुर्बलता उसे 'झूठ' से जुड़े रहने के लिए विवश करती है? क्या उसकी आत्मा इतनी भी जागृत नहीं हुई होती कि उसे वफ़ा और बेवफ़ा की पहचान करना सिखा सके? क्या जीवन के हादसों ने उसे भीतर से इतना खोखला कर दिया होता है कि उसमें अकेले, बिना सहारे के खड़े होने की ताकत नहीं होती? वह खुद भी लोगों की आस्तीन में साँप था और अपनी आस्तीन में साँप पालने का भी शौकीन था? ऐसा व्यक्ति मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए अच्छा ऑब्जेक्ट हो सकता है. बहुत से लोग अस्पताली तजुर्बों के लिए मृत्यु-उपरान्त अपना शरीर दान करने की वसीयत लिख देते हैं. क्यों नहीं ऐसे विश्रृंखलित दिमाग के लोग जीवित रहते अपना मस्तिष्क मनोवैज्ञानिक अध्ययन के लिए दान कर देते? आखिर पता तो चलता कि एक प्रतिभाशाली, बुद्धिमान व्यक्ति इतनी विश्रृंखलता का शिकार कैसे हो जाता है?

सिर्फ एक सन्दर्भ पर टिप्पणी करना चाहूँगी। उन्होंने खुलेआम फेसबुक पर स्वीकारा (सन्दर्भ पोस्ट 30 मार्च) कि वे एक 30-35 वर्षीय कन्या के साथ हमबिस्तर हुए. फिर बताया कि वह उनके घर से कुछ सामान उठा कर ले गई, जिसकी उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की. प्यारे भाई, अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ सोओगे तो क्या मुफ्त में सोओगे? इसीलिए कहती हूँ, सब तमाशबीन थे. तुम्हें खुद उसे कुछ दे-दिला के विदा करना चाहिए था, ताकि शान से कह सकते, 'आय हैव पेड फॉर इट.' बातें तो और भी हैं, लेकिन पंगा कौन ले? इतना पंगा लेने की ही हिम्मत कर ली, यह क्या कम है?

मैं दूसरों की मूर्खताओं, गलतियों, तदुत्पन्न दुखों एवं असंगतियों के बारे में व्यर्थ चिंतित रहती हूँ, खासकर उनके बारे में जो परिवार का भ्रम देते हुए दो जानलेवा दुश्मनों की भाँति साथ रहते हैं. न जाने कब, एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंप दें? संभल के भाई, संभल के,

मैंने अपने पहले के लेख में नीलाभ से कहा था....
अपने चेहरे पे मुस्कानों को सजाते चलिए
ज़िन्दगी जंग है बस यूँ ही निभाते चलिए।
सो ज़िन्दगी की जंग में नीलाभ जीते या हारे, इसकी गणना करने वाली मैं कौन?


Tuesday, 12 July 2016

मेरा पुत्र

मेरा पुत्र

एक बार एक गैर-साहित्यिक व्यक्ति ने मेरी कविताओं के बारे में एक अच्छी टिप्पणी की (जो मुझे अच्छी लगी) कि 'आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।'

मेरा पुत्र, कंप्यूटर इंजीनियर मनीष मोहन. इन्हें बचपन में कुछ-कुछ लिखने का शौक था और अपनी 13-14 वर्ष की आयु में मुझे बिना बताए अंग्रेजी पत्रिका 'टार्गेट' में अपनी छोटी-मोटी रचनाएं भेजी थीं जो छपने पर मुझे दिखाई थीं. फिर शायद 14-15 वर्ष की आयु में 'इण्डिया टुडे' में किसी राजनीतिक विषय पर इनकी एक लम्बी प्रतिक्रिया छपी थी, जिसे पढ़ कर बहुत लोग हैरान रह गए थे. फिर 15 वर्ष की आयु में एक अंग्रेजी कहानी लिखी, जिसका हश्र यह हुआ कि बरसों बाद उसे थोड़ा संवार कर हिन्दी में मैंने अपने नाम कर लिया. अपनी किशोरावस्था में ही ये चित्रकारी भी किया करते थे और कागज़ पर पेन या पेन्सिल से किसी भी व्यक्ति का चेहरा हूबहू उतार दिया करते थे। (काश मैं वो चित्रकारी संभाल कर रख पाती). मैं खुश थी कि शायद यह लेखक या कलाकार बन कर अपनी माँ की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाएं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इन्होने मुझे तसल्ली दी, 'माँ, मैं जो सौफ़टवेअर बनाता हूँ, वह भी बहुत रचनात्मक होता है.' तो मित्रों, यही वह गैर-साहित्यिक व्यक्ति हैं जिन्होंने मेरी कविताओं के बारे में यह टिप्पणी की, 'माँ, आप कविताओं में कहानियाँ लिखती हैं।' वाह, कितनी खूबसूरत बात, कविता के रस से भरी, कहानी की रोचकता से भरी। इस गैर-साहित्यिक पुत्र पर साहित्यिक माँ कैसे न मर जाए खुदा....

Sunday, 19 June 2016

किस्सा एक

किस्सा एक

(मुझे पिछले महीनों मे चार अंजान महिलाओं ने संपर्क किया, मेरे मैसेज बॉक्स मे, अपने प्रेमी / पति की बेवफाई के किससे बताने के लिए, यह हवाला देकर कि वे पुरुष मेरे बहुत गहरे मित्र हैं, यह उन्होंने फेसबुक पर कमेट्स से जाना है. किस्से मजेदार हैं, इसलिए मज़ा अाप भी लीजिए.)

फेसबुक पर एक युवक मेरा अच्छा मित्र है. 'अच्छा' इन अर्थों मे कि बहुत पहले कभी उसने मुझसे कुछ सलाह-मशवरा किया था. उसके बाद से वह मेरा बहुत अादर करने लगा. मैं भी उसे भोला बच्चा समझती हूँ. मैं फेसबुक पर उसकी पोस्ट मे उसके उत्तरोत्तर विकास को देख कर खुश हूँ. वह एक धीर-गम्भीर प्रकृति का युवक है, ज़रा भी छिछला, ओछा नहीं. बिना मिले भी यहाँ पोस्ट के माध्यम से मै इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि वह एक शरीफ़ लड़का है, सत्चरित्र, छल-छद्म से कोसों दूर, कैरियर बनाने के लिए संघर्षरत, लेकिन मन मे बहुत अकेला है. ऐसे मे सच्चे साथी की चाह किसे नहीं होती?

हाल ही मे एक महिला मेरी मित्र बनी। उसने मित्र बनने के तीन महीने के भीतर ही मुझे मैसेज किया, 'मैडम, फेसबुक पर एक लड़का महिलाओं से दोस्ती कर उन्हें इमोशनली ब्लैकमेल करता है. अाप उस के बारे मे फेसबुक पर लिखिए.'

मैने उससे पूछा, 'अाप अपना पूरा अनुभव बताएँ कि किसने अापके साथ क्या किया। और मुझसे कैसा सहयोग चाहती हैं?'

'मै सिर्फ यह चाहती हूँ कि अाप इस लड़के को बेनकाब करें.'

'किसी को बेनकाब करना यानी बदनाम करना मेरे लेखन का उद्देश्य नहीं. मै अापको समस्या का हल बताने की कोशिश कर सकती हूँ, अाप मुझे पूरी बात विस्तार से बताएँ।' मैने कहा.

फिर उसने अपने बारे मे जो बताया, उसका सार यह.... वह एक सिंगल महिला है, फेसबुक पर इस लड़के से दोस्ती हुई, जो एक महीने की बातचीत मे प्रेम-प्यार की बातों तक पहुँच गई. फिर उसने लड़के का जो हुलिया और परिचय बताया, उससे मुझे अंदाज़ क्या, विश्वास हो गया कि हो, न हो, यह यही लड़का है, जो मेरा मित्र है. मैने महिला से पूछा, 'अापने कैसे मुझे इस योग्य समझा कि मुझे अपनी व्यक्तिगत बात बताएँ?'

'एक तो अाप इस लड़के को अच्छी तरह जानती हैं. दूसरे, अाप बहुत अच्छा लिखती हैं, बुराई को बिन्दास तरीके से उजागर करती हैं. मै चाहती हूँ, अाप ऐसे लड़कों का पर्दाफ़ाश करें.' उसके यह कहने से मुझे ऐसा लगा, जैसे उसका मकसद इस लड़के को बदनाम करना है.

असल मे सिंगल महिलाएँ (शायद सिंगल पुरुष भी) तरसी-भटकी होती हैं और मिलने वाले हर पुरुष मे उन्हें अपना स्वप्न-पुरुष नज़र अाता है. वे लड़कों पर बहुत जल्दी डुल जाती हैं, और मनचाहा न मिलने पर हिंसक हो उठती हैं, इस अाक्रोश के साथ कि लो, यह भी गया हाथ से.

मैने उस महिला का प्रोफाइल खोल कर देखा. वह उस मेरे मित्र लड़के से अाठ साल बड़ी थी. मैने महिला से पूछा, 'क्या वह लड़का अापसे उम्र मे कई साल छोटा है?'

'जी हाँ, पर उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैने बस दोस्ती करनी थी. उसकी बातें मुझे अच्छी लगती थी.'

'फिर टूटा कैसे? क्या उस  तोड़ा?'

'नहीं जी, देखिए, उसने अभी भी मुझे ये मैसेज भेजे हैं.' महिला ने लड़के के 4 मैसेज मुझे कॉपी-पेस्ट किए, जिसमे लड़के ने अनुरोध किया था कि मुझे छोड़ कर मत जाओ.

मैने कहा, 'इन मैसेज से लड़के की वफ़ादारी पता चलती है. इनसे लड़के का कोई भी बुरा रूप उभर कर सामने नही अाता. इनसे पता चलता है कि तुम्हारी ओर से दोस्ती खत्म की गई है?'

'यही समझ लीजिए. वह अन्य लड़कियों की पोस्ट लाइक करता था, मेरे मना करने के बावजूद लड़कियों की पोस्ट पर कर्मेंट करता था, वह बड़ा फ़्लर्ट था. इसलिए मैने अब उसे ब्लॉक कर दिया है.'

'क्या तुम कभी उससे मिलीं?'

'मिली तो नहीं, हाँ, कहीं जाते हुए उसके शहर से गुज़र रही थी, तब वह पाँच मिनट के लिए मिलने अाया था. अरे दीदी, उसकी पर्सनैलिटी तो कुछ भी नहीं है, एकदम साधारण है, फेसबुक पर बड़ा इम्प्रेसिव लगता था.'

ओह तो यह बात है. लड़का पसंद नहीं अाया.

फिर मैने उस महिला की इजाज़त लेकर उससे कुछ सवाल किए, मसलन, अाप सिंगल हैं तो नौकरी करती हैं या बिज़नेस? क्या अकेली रहती हैं? बच्चे हैं? अादि-अादि. उसने कहा, 'मेरा एक दोस्त है जो मेरा पैसे से पूरा ख्याल रखता है, मेरी हर ज़रूरत का.'

मुझे उसकी पूरी कहानी समझ अा चुकी थी. मैने उसे डाँटने के अंदाज़ मे लिखा, 'एक अादमी अापका पैसे से ख्याल रख रहा है, अगर उसे अापकी इस दोस्ती का पता चले तो क्या वह अापसे नाराज़ नहीं होगा? अाप खुद किसी के साथ हैं, और उस लड़के को अपना गुलाम बनाना चाहती हैं कि इसकी पोस्ट लाइक न करो, उसकी पोस्ट पर कमेंट न करो? अाप खुद बेवफ़ा हैं और उस लड़के की झूठी बेवफ़ाई का प्रचार कर रही हैं? क्यों? मुझे अापकी बातों से वह लड़का कतई वैसा नहीं लगा, जैसा अापने उसका चित्र खींचा है.'

उसकी अक्ल शायद थोड़ी ठिकाने अाई, बोली, 'दीदी, अाप सही कह रही हैं, वह गलत नहीं है, बस, हमारी नहीं बनी, किसी का कसूर नहीं था....'

'नहीं, तुम्हारा कसूर था, तुमने एक प्रेमी रखते हुए भी उस लड़के को बरगलाया, फिर उस पर ऐसे अधिकार जमाया जैसे वह तुम्हारा एकमात्र प्रेमी हो. तुम गलत हो, एकदम गलत. मै तुम्हें अनफ्रेंड कर रही हूँ. पर तुम्हारी पोस्ट पर नज़र रखूँगी कि तुम और किस-किस को दोस्ती की ग़लतफ़हमी दे रही हो.'

'नहीं दीदी, अब मै किसी से बात नहीं करूँगी। अपने सही कहा, गलत मै ही थी.'

अब उसका अकाउंट शायद डीऐक्टिवेटेड है. मैने अपने युवा मित्र से बस उसका नाम लिया कि उसने सारा किस्सा ज्यों का त्यों बयान कर दिया. मैने उसे संभल कर रहने की सलाह दी. और क्या कह सकती थी?



इति संपन्न किस्सा एक.