Tuesday, 12 January 2016

30 एक भावचित्र : यह कविता है

30. एक भावचित्र : यह कविता है
अचानक यह ख्याल आया है कि मैं तो इतनी खुश हूँ ही नहीं, जितनी दिखती हूँ। न ही इतनी सुखी हूँ, जितनी नज़र आती हूँ। न इतनी चंचला, जितनी छलकी पड़ती हूँ. बस यह अहसास होते ही मैं टटोल रही हूँ अपना अन्तस्तल कि जो मैं हूँ नहीं, वह मैं दिखती क्यों हूँ? शायद मैं बहुत घबराई हुई हूँ। या शायद बहुत परेशान हूँ। या शायद भीतर से मरी हुई हूँ। पर यह सही है कि मैं वह नहीं हूँ, जो दिखती हूँ। यह कैसी उदासी है, जो जब-तब छा जाती है मुझ पर? लिखना चाहती हूँ कविता और लिखा जाता है गद्य। लिखना चाहती हूँ कहानी और लिखा जाता है निबंध। इससे बड़ी और क्या पहचान होगी मेरी विश्रृंखलता की? छटपटाता है मन और पता नहीं चलता, क्यों? ढूँढता रहता है मन और पता नहीं चलता, क्या? जीना चाहता है मन और पता नहीं चलता, किस लिए? यह टूटापन आज की विरासत है। कल से फिर वही सिलसिला खोखली हँसी का, खुश होने का वहम देती चुलबुलाहट का, मर्सिया की धुन में लिपटे जीवन-राग का।


Monday, 4 January 2016

मेरे मित्र

मेरे मित्र

आज नए साल में मैं अपने उन सभी मित्रों को याद कर रही हूँ जिनका स्नेह मुझे मिला और जिनके स्नेह की छाँह तले मैंने अपने जीवन के गर्दिश भरे दिन गुज़ारे। आज वो सब पता नहीं कहाँ हैं. आज मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मुझे नापसंद करने वाले कुछ दिलजले ज़रूर हो सकते हैं। पर जी, मेरे मित्रों का जवाब नहीं था। सिर्फ एक किस्सा सुनाना चाहती हूँ जो मेरी इस बात की गवाही देगा।
मैं अपने पुत्र का जन्मदिन अवश्य मनाती थी। वह चाहे हमेशा हॉस्टल में रहा, पढ़ा, लेकिन उसका जन्मदिन गर्मी की छुट्टियों में पड़ने के कारण उस दिन वह मेरे पास होता था। सारे मित्रों को मालूम रहता था और उस दिन आने के लिए पहले से ही पूछताछ शुरू हो जाती थी। तो हुआ यह कि एक बार मैंने जन्मदिन पर किसी को भी न बुलाने का फैसला किया। क्यों किया, आज याद नहीं, शायद उदासी रही होगी। तो उस वर्ष उस दिन अपने आप एक मित्र आए, 'कहाँ है बॉबी?' एक सहेली आई केक लेकर। एक अन्य मित्र आए हाथ में कुछ पकडे हुए। फिर एक और। फिर एक और। फिर एक और।
'तुमने इस बार मनाया क्यों नहीं?'
'बस ऐसे ही।'
'अब ऐसा करो कि जल्दी से मटर-चावल बना लो। हमें कुछ तो खिलाओगी?'
मैं हैरान। बॉबी खुश। मित्र-मित्राणि आपसी गप्पों में मग्न।
अंत में जब केक काटा जा रहा था, एक प्रिय सखी का प्रवेश हुआ। आक्रोश में तनी हुई, 'अच्छा, सब को बुलाया, मुझे ही नहीं बुलाया?'
'किसी को नहीं बुलाया यार, सब अपने आप आए है।'
'झूठ। केक भी है, समोसे और गुलाबजामुन भी हैं, पुलाव भी है। मणिका, तूने मुझे भूलने की हिम्मत कैसे की?'
'कोई समझाओ इसे। मैंने सिर्फ पुलाव बनाया है। बाकी चीज़ें ये सब लोग लाए हैं। एक तू ही है जो खाली हाथ आई है।'
उसने पर्स से लिफाफा निकाला और बॉबी को पकड़ाते हुए बोली, 'खबरदार, जो मम्मी को दिया तो।'
तो ऐसे दोस्तों पर कौन ना मर जाए खुदा, पत्थर भी मारते है फूलों में लपेट कर।


आत्म मंथन

आत्म मंथन

कभी सोचा है, हमारी ये इन्द्रियाँ हमें खुद से मिलने देने में कितनी बड़ी बाधा हैं? कान हर घड़ी शोर को सुनते हैं. आँखें बाहरी दृश्यों में रमी रहती हैं. नासिका को सुगंध की आदत. मन चंचल चलायमान। मस्तिष्क को निर्देश देने से फुर्सत नहीं। ठीक है, ये इन्द्रियाँ अपने सारे कर्तव्य निभाएँ लेकिन कभी-कभी खुद से मिलना भी बहुत ज़रूरी है, इसीलिए मेडिटेशन, साधना आदि के उपाय बताए जाते हैं ताकि सब तरफ से अपना ध्यान समेट कर आत्मकेंद्रित किया जाए और अपने भीतर झाँका जाए कि वहाँ सब कुछ ठीकठाक चल रहा है या नहीं? समय-समय पर आत्म-मंथन बहुत ज़रूरी है.

रात मैंने आत्म मंथन किया तो पता चला कि मेरे भीतर तो बहुत सारे अवांछित तत्व साधिकार जमे बैठे हैं. इन सब का सफाया ज़रूरी है. कौन जाने, जब वांछित तत्व आए तो भीतर भीड़ देख कर बाहर से बाहर वापस लौट जाए. सफाई करने की कला सीखने के साथ यह कला भी सीखनी होगी कि मन के दरवाज़े बंद रखे जाएँ, हर किसी के लिए न खोल दिए जाएँ। मन की आँखें खोल, मितवा, मन की आँखें खोल.



Saturday, 2 January 2016

भावों का कोलाज : एक अधूरी कहानी

भावों का कोलाज : एक अधूरी कहानी

मेरी कहानी 'शब्दों के प्रवाह' और 'तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे' के कुछ संवाद / अंश, कुछ कविताओं के अंश, इधर-उधर से कुछ गीत उठा कर एक अलग तरह का कोलाज बनाया है. बस यूँ ही रोमैंटिक होते हुए....

हँस-हँस कर जीने का ज़माना याद आया
आँखों को फिर रोने का बहाना याद आया
आज फिर उसकी कहानी याद आई
आज फिर उसका फ़साना याद आया.

(इंटरनेट का बेताज बादशाह और नौसिखियानी थी.
वह जंगल का राजा था, मैं महलों की रानी थी.)

'सिन्डी, तुझे यह किसी ने बताया या नहीं?'
'क्या?'
'कि तू गज़ब है, गज़ब?'
'बताया ना।'
'किसने?'
'तुमने अभी बताया।'

वो खिलखिलाना तुम्हारा मुझे फिर याद आया
मेरे दिल पर पड़ा फिर से किसी ग़म का साया।
मैं गज़ब हूँ तो क्या, तुम भी थे गज़ब कम नहीं
किस तरह बिन बात की बातों में मुझे उलझाया।

'इस बार, लगता है, तुमसे मिलने के बाद मैं वापस नहीं लौट पाऊँगा.'

(पिया बसन्ती रे, काहे सताए, आजा.)

'क्यों? क्या मैं तुम्हारे पाँवों में बेड़ियाँ डाल दूँगी?'
'पाँवों में तो नहीं, मन में बेड़ियाँ ज़रूर डाल दोगी. मुझे लगता है क़ि तुम मेरे सारे निश्चय, सारे नियम, तप, सब भंग करने वाली हो. सच बताओ, कहीं मेरा अपहरण करने का तुम्हारा कोई इरादा तो नहीं?'
'शट अप. जस्ट शट अप.'

वो जाने के लिए आना भी कोई आना था?
कभी न लौटने वाले को फ़िज़ूल चाहना था
तप, नियम, निश्चय तुम्हारे सब दुरुस्त थे
कुछ नहीं, बस मेरा दिल टूटने का बहाना था.

'तुम कितने सुन्दर हो, तन से, मन से. तुम कहाँ, मैं कहाँ?'
'ओह, कितना मीठा गुनगुनाती हो तुम..... लिसेन माय प्रिंसेस, तुम देखने की चीज़ नहीं हो, महसूस करने की चीज़ हो......'
'यानि मैं चीज़ हूँ?'
'देखो, मुझे शब्दों के जाल में न उलझाओ, मेरी शब्द-विशेषज्ञा..... योर हार्ट इज सो ब्यूटीफुल, योर ब्रेन इज सो ब्यूटीफुल. मुझे आने दो वहाँ, मैं तुम्हारा 'तुम' होना भुला दूँगा।'

(आओगे जब तुम साजना, अँगना फूल खिलेंगे।
बरसेगा सावन झूम-झूम के, दो दिल ऐसे मिलेंगे।)

'तुमने सचमुच मुझे हिप्नोटाइज़ किया हुआ है. हर जगह, हर घडी सिर्फ तुम ही तुम. तुमसे अतिरिक्त तो मैं कुछ सोच ही नहीं पाती.'

(लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल.)

'अच्छा? तो मैं हर घडी, हर जगह कहाँ-कहाँ घूम रहा हूँ तुम्हारे साथ?..... ओ माय डांसिंग क्वीन, ऐसी बातें करके तुम यहाँ मेरा जीना दुश्वार कर दोगी...... अच्छा बताओ, अगर तुम मुझे हिप्नोटाइज़ करोगी तो क्या करोगी?'
'मैं......? मैं तुमसे कहूँगी कि अपनी आँखें बंद करो और मुझे देखो.'
'ओह सिन्ड्रेला, माय सिन्डी, यू आर सो ब्यूटीफुल...... माय आइज़ आर क्लोज्ड एंड आय'म सीइंग यू.'

(मेरा बैरागी मन डोल गया, देखी जो अदा तेरी मस्ताना।)

'देखो, तुम इस तरह के नामों से मुझे न बुलाया करो. मुझे शर्म आती है.'
'ओह हो, मेरी भारतीय कन्या.... '

कैसे बौराए-पगलाए से थे वे दिन.. शब्दों में कितनी ताकत होती है. शब्द किसी भी हथियार से ज्यादा घायल कर सकते हैं और किसी भी मरहम से ज्यादा दवा का काम कर सकते हैं. केवल शब्द, शब्द और सिर्फ शब्द. शब्दों में छुपे हैं केवल सपने, सपने और सिर्फ सपने...... 

'हमारा यह स्वनिर्मित संसार कितना अच्छा है. किसी बाहर वाले का दखल नहीं.'
'सच सिन्डी, यह स्वप्नलोक अद्भुद है. अपनी पसंद के चरित्रों का निर्माण करो, अपनी पसंद के रूपाकार गढ़ो और उनके साथ रहो.'
'हाँ, बाहर अपनी पसंद के लोग नहीं मिलते, अपनी पसंद के लोगों की रचना हम अपने स्वप्नलोक में करते हैं और उनके साथ पूरी ज़िन्दगी जीते हैं, पूरी शिद्दत के साथ. हम कभी साक्षात नहीं मिलेंगे, वरना हमारा यह स्वप्नलोक टूट जाएगा, बिखर जाएगा.'
'हाँ सिन्ड्रेला, हम केवल अपने सपनों की दुनिया में मिलेंगे, मिलते रहेंगे. यहाँ हमारा अपना शासन चलता है. किसी को हमारे प्यार के बारे में कुछ नहीं पता. हम एकदम सुरक्षित हैं.'

(कहाँ ले चले हो, बता दो मुसाफ़िर
सितारों से आगे, ये कैसा जहाँ है?
समझ में न आए, ये दुनिया कहाँ है?)

'देख लेना, जब मैं मरूँगी तो मेरी आँखें खुली रहेंगी। मन में प्यास अधूरी रह जाए तो मरते समय आँखें खुली रहती हैं.'
'न, न, मरने की बात न कर. तुझसे पहले मैं मरूँगा।'
'मैं तुमसे बड़ी हूँ तो मैं ही मरूँगी न तुमसे पहले?'
'नहीं सिन्डी, मैं तुझसे पहले मरूँगा और अगले जन्म में तुझसे पहले पैदा होऊँगा। इस तरह अगले जन्म में हम मिलेंगे सही उम्र में.'
'सच?'
'हाँ, सच. इस जन्म में तुझे पैदा होने की बहुत जल्दी थी ना. अब मरने की जल्दी मत करना. हमें-तुम्हें मिलना है, अगले जन्म में. और फिर हर जन्म में.'

(ओह माय यंगेस्ट लवर, मैं इंतज़ार करूँगी, इंतज़ार करूँगी, इंतज़ार करूँगी।।।।।)
(हाय राम ! यह मैं क्या कह गई? नहीं नहीं, तुम जियो हज़ारों साल...... )

एक अधूरी कहानी।