Tuesday, 12 January 2016

30 एक भावचित्र : यह कविता है

30. एक भावचित्र : यह कविता है
अचानक यह ख्याल आया है कि मैं तो इतनी खुश हूँ ही नहीं, जितनी दिखती हूँ। न ही इतनी सुखी हूँ, जितनी नज़र आती हूँ। न इतनी चंचला, जितनी छलकी पड़ती हूँ. बस यह अहसास होते ही मैं टटोल रही हूँ अपना अन्तस्तल कि जो मैं हूँ नहीं, वह मैं दिखती क्यों हूँ? शायद मैं बहुत घबराई हुई हूँ। या शायद बहुत परेशान हूँ। या शायद भीतर से मरी हुई हूँ। पर यह सही है कि मैं वह नहीं हूँ, जो दिखती हूँ। यह कैसी उदासी है, जो जब-तब छा जाती है मुझ पर? लिखना चाहती हूँ कविता और लिखा जाता है गद्य। लिखना चाहती हूँ कहानी और लिखा जाता है निबंध। इससे बड़ी और क्या पहचान होगी मेरी विश्रृंखलता की? छटपटाता है मन और पता नहीं चलता, क्यों? ढूँढता रहता है मन और पता नहीं चलता, क्या? जीना चाहता है मन और पता नहीं चलता, किस लिए? यह टूटापन आज की विरासत है। कल से फिर वही सिलसिला खोखली हँसी का, खुश होने का वहम देती चुलबुलाहट का, मर्सिया की धुन में लिपटे जीवन-राग का।


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